शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा. शहीद के आश्रितों को सरकार द्वारा हरसंभव सुविधा देने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन देवघर के सारठ स्थित बाभनगामा निवासी शहीद गणेश चंद्र पांडेय के आश्रित उनके पुत्र लक्ष्मण पांडेय 17 वर्षों बाद भी सरकारी दावों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं.
दरअसल, गणेश चंद्र पांडेय (आर्मी नं-1582209P) आतंकी हमले में जम्मू कश्मीर में शहीद हो गए थे. 27 अक्टूबर 2004 को जब आतंकियों के साथ मुठभेड़ हुई थी, उस दौरान उनकी पोस्टिंग जम्मू कश्मीर के नामथियल, बड़गांव (श्रीनगर) में थी. उनके शहीद होने के बाद उनके पुत्र लक्ष्मण कुमार पांडेय को अनुकंपा के आधार पर नौकरी दिए जाने की जो पहल शुरू हुई थी, उसे 17 साल बीत जाने के बाद भी मुकाम तक नहीं पहुंचाया जा सका है. इसके लिए जारी सरकारी कोरम अब भी प्रक्रियाधीन है.
विधानसभा के शीतकालीन सत्र में उठाया मुद्दा
सारठ के विधायक और पूर्व मंत्री रणधीर सिंह ने एक बार फिर विधानसभा के चालू शीतकालीन सत्र में सरकार से लक्ष्मण पांडेय को अनुकंपा के आधार पर नौकरी दिए जाने का मुद्दा उठाया है. मामले में गृह, कारा व आपदा प्रबंधन विभाग ने बताया कि लक्ष्मण को अनुकंपा के आधार पर तृतीय वर्ग के पद पर नियुक्ति दी जानी है. इसके लिए देवघर उपायुक्त से प्राप्त प्रस्ताव पर निर्णय लिया जाना है. फिलहाल यह प्रक्रिया चल रही है. रणधीर सिंह ने कहा कि शहीद गणेश चंद्र पांडेय आतंकियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए थे. ऐसे वीर शहीद के परिजन को अब तक नौकरी नहीं दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है.
स्थानीय विधायक रणधीर सिंह ने बताया कि पिछली सरकार में जब वह मंत्री थे, तब भी उनके द्वारा शहीद गणेश पांडेय के पुत्र को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी दिए जाने का मुद्दा उठाया जाता रहा, लेकिन तब भी अधिकारियों की उदासीनता के कारण यह मामला सरकारी फाइल में दबा रह गया. विधायक ने शहीद के आश्रित के साथ 17 वर्षों से हो रहे अन्याय को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए वर्तमान सरकार से मामले पर तुरंत संज्ञान लेने का आग्रह
किया है.
कई सवालों के जवाबों का इंतजार
दुखद बात ये है कि 2004 के बाद कई सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन एक शहीद के बेटे को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का मामला अभी भी अटक कर रह गया है. प्रश्नकर्ता रणधीर सिंह भी खुद रघुवर सरकार में कृषि मंत्री थे, तब मामला का समाधान क्यों नहीं हुआ. वैसे अधिकारी जो फ़ाइल दबाकर बैठे हैं या विलंब पे विलंब कर रहे हैं, उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई. कई सवाल हैं, जिनके जवाब का इंतज़ार शहीद के परिजन को होगा.
सत्यजीत कुमार / धनंजय भारती