380 एकड़ में फैला हुआ गुरुग्राम के अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क का अस्तित्व खतरे में है. गुरुग्राम के ग्रीन लंग के नाम से जाने वाले इस पार्क को बनाने में गुरुग्राम के आम नागरिकों और लोकल एनजीओ को 7 साल लग गए, लेकिन अब इस खूबसूरत अरावली हैबिटैट के बीचो-बीच गुरुग्राम मानेसर एक्सप्रेसवे को ले जाने का प्रस्ताव रखा गया है, जिसका काम नवंबर से शुरू करने की तैयारी है.
ये बायोडायवर्सिटी पार्क अरावली के बेल्ट पर बसा हुआ है जिस पर 7 साल पहले खनन माफियाओं का राज था जिसके कारण यहां जमीन पूरी तरह खोखली और बंजर हो गई थी. लेकिन लोगों ने दिन-रात मेहनत कर कॉर्पोरेट और गुरुग्राम म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की मदद से इस उजाड़ जगह को अरावली की वनस्पतियों और पेड़ों से भर दिया.
ये जंगल अब 400 अलग-अलग किस्म के पेड़-पौधों और पक्षियों की करीब 182 स्पीशीज का घर है, जहां जंगली सियार और रेप्टाइल्स भी रहते हैं. इस पार्क में तीन तरीके के ट्रैक बनाए गए हैं, रनिंग ट्रैक, वॉकिंग ट्रैक और साइकिलिंग ट्रैक जिसका इस्तेमाल यहां रोजाना सुबह शाम आने वाले लोग करते हैं, लेकिन कुछ ही महीनों में हाईवे के निर्माण के चलते यह तबाह हो जाएगा.
गुरुग्राम पूरी तरह से हाई राइजिंग सोसाइटीज और बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों का कंक्रीट शहर बन चुका है. यहां शहर में हरे भरे क्षेत्र न के बराबर हैं. इस बीच हाईवे प्रोजेक्ट में पार्क का करीब 25 एकड़ क्षेत्र लेने की तैयारी है जिस पर इस पार्क को तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले बोटानिस्ट विजय धस्माना का मानना है कि क्योंकि ये एक्सप्रेस-वे इस जंगल के बीचो-बीच से निकालने की तैयारी है. इसका सीधा असर यहां के पक्षियों और वनस्पतियों पर पड़ेगा और ज्यादातर प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी.
गुरुग्राम में जहां पानी की समस्या हर दिन गहरी होती जा रही है, ऐसे हालातों में ये पार्क साल भर में करीब-करीब 28-28 लाख करोड़ टन पानी ग्राउंड लेवल तक पहुंचाता है. इस जंगल का खुद का नेचुरल वॉटर रिजर्वॉयर भी है और सबसे अच्छी बात ये है कि यहां के पेड़-पौधों को ज्यादा देख भाल या पानी की जरूरत भी नहीं पड़ती.
ये गुरुग्राम के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करते हैं, शुद्ध हवा प्रदान करते हैं और ग्राउंड लेवल पर पानी की मात्रा को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं. लेकिन पार्क में एक्सप्रेस-वे बनने के बाद यहां से रोजाना गुजरने वाली गाड़ियों के धुएं के कारण कुछ भी नहीं बचेगा. हमने इस बाबत सरकारी विभागों से सम्पर्क किया पर किसी ने भी इस पर हमें कोई जवाब नहीं दिया. ऐसे में विकास के नाम पर कट रहे पेड़ों और उजाड़ दिए जा रहे जंगलों की भरपाई कैसे होगी ये एक बड़ा सवाल है.
अजीत तिवारी / स्मिता ओझा