देश के प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक पद पर डॉ. त्रिलोचन महापात्रा की नियुक्ति का मामला विवादों में घिर गया है. आरटीआई से मिली जानकारी से इस नियुक्ति को लेकर कई खुलासे हुए हैं.
तो क्या प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात बड़े अफसरों में नियमों की अनदेखी कर अपने चहेते लोगों को ऊंचे पदों पर नियुक्त करने की होड़ लगी है. ताजा विवाद भारत सरकार में सचिव-कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर के महानिदेशक पद पर डॉ. त्रिलोचन महापात्र की नियुक्ति से जुड़ा है. जिसमें कैबिनेट सेक्रेट्री की अगुवाई में प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से गठित सर्च कम सेलेक्शन कमेटी पर नियमों की अनदेखी और योग्यता को दरकिनार कर नियुक्ति देने का आरोप लगा है.
आरटीआई के अन्तर्गत पीएमओ से मांगी गई जानकारी के बाद ये खुलासा सामने आया है कि आईसीएआर के महानिदेशक पद के लिए जो अर्हताएं विज्ञापन में तय की गईं, उसकी खुली अनदेखी कर ऐसे व्यक्ति की महानिदेशक और सचिव पद पर नियुक्ति को हरी झंडी दे दी गई जिसने विज्ञापित पद के लिए न तो आवेदन ही किया और ना ही उनका किसी जानी मानी शख्सियत ने तय समय-सीमा के भीतर नामांकन ही किया.
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने दिसंबर 2015 में सचिव-कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा और महानिदेशक-आईसीएआर के लिए रोजगार समाचार के जरिए विज्ञापन प्रकाशित कर आवेदन और नामांकन मांगे. विज्ञापन के मुताबिक, आवेदनकर्ता के लिए कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में असाधारण कार्य के साथ 25 साल का न्यूनतम अनुभव मांगा गया जिसमें से कम से कम 5 साल का अनुभव कृषि अनुसंधान प्रबंधन के क्षेत्र में होने की अनिवार्य शर्त रखी गई.
विज्ञापन के बाद महानिदेशक-आईसीएआर के चयन की प्रक्रिया सर्च कम सेलेक्शन कमेटी ने शुरु की जिसकी अगुवाई बतौर चेयरमैन कैबिनेट सेक्रेट्री पीके सिन्हा ने की और प्रधानमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव पीके मिश्रा के साथ 5 सदस्य- पी.बलराम, डॉ. टी रामासामी, डॉ. वीएल चोपड़ा और डॉ. पीएल गौतम कमेटी में नियुक्त किए गए.
सर्च कम सेलेक्शन कमेटी को आवेदन की आखिरी तारीख 18 जनवरी 2016 तक कुल 36 कृषि वैज्ञानिकों के आवेदन मिले जिसमें से अनुभव और वरिष्ठता क्रम में 8 वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों सर्वश्री डॉ. एसके पाटिल, डॉ. आरके सिंह, डॉ. एके श्रीवास्तव, डॉ. एनएस राठौर, डॉ. एके सिंह, डॉ. डीपी बिरादर, डॉ. के अलगूसुंदरम और डॉ. एस. अयप्पन-पूर्व डीजी-आईसीएआर के नाम शामिल थे.
आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, सर्च कम सेलेक्शन कमेटी की ओर से सचिव-कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा और महानिदेशक-भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पद पर नियुक्त किए गए डॉ. त्रिलोचन महापात्रा ने न तो आवेदन ही किया और ना ही उनका नाम ही किसी ख्यातलब्ध व्यक्ति ने अंतिम इंटरव्यू के लिए तय समय सीमा के भीतर नामित किया. आरटीआई के जरिए सभी आवेदकों और अंतिम साक्षात्कार के लिए चयनित 8 नामों में डॉ. त्रिलोचन महापात्र का नाम कहीं भी सामने नहीं आया है.
डॉ. त्रिलोचन महापात्र का नाम अंतिम साक्षात्कार के लिए चयनित 8 नामों के बाद आखिर कैसे सर्च कम सेलेक्शन कमेटी के सामने आया, इसी मुद्दे पर सवाल खड़े हैं. आरटीआई एक्टिविस्ट जयसिंह चौहान के मुताबिक, डॉ. त्रिलोचन महापात्र पद के लिए अनिवार्य 25 साल का अनुभव नहीं रखते थे. आरटीआई से मिली जानकारी से पता चलता है कि विज्ञापित पद के इंटरव्यू के समय उनका बतौर कृषि वैज्ञानिक कुल अनुभव 25 साल तो दूर 23 साल भी पूरा नहीं हुआ था और 5 साल का कृषि अनुसंधान प्रबंधन का न्यूनतम अऩुभव भी उनके पास नहीं था.
जाहिर तौर पर पद के लिए जरुरी अर्हता वो पूरी नहीं करते थे, इसीलिए उन्होंने आवेदन भी नहीं भेजा, बावजूद इसके उनका नाम पीएमओ की ओर से गठित कमेटी ने चयनित कर लिया तो ये नियमों और योग्यता यानी आवश्यक मेरिट की खुली अवहेलना है.
आरटीआई से मिली जानकारी में डॉ. त्रिलोचन महापात्रा के बारे में जो जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक, कटक-ओडिशा के रहने वाले डॉ. त्रिलोचन महापात्रा ने 1992 में पीएचडी करने के बाद प्लांट बायोटेक्नॉलॉजी के साइंटिस्ट के तौर पर आईएआरआई-नई दिल्ली से करियर शुरू किया. 1999 में उनका प्रमोशन सिनियर साइंटिस्ट के पद पर हुआ और साल 2005 में वो प्रिंसिपल साइंटिस्ट बनाए गए.
2012 में यूपीए सरकार के वक्त त्रिलोचन महापात्रा को कटक में सीआरआरआई यानी भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान के निदेशक पद पर नियुक्ति मिली. पिछले साल अगस्त 2015 में आईएआरआई यानी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में निदेशक पद पर वो नियुक्त किए गया और महज 6 महीने के भीतर उन्हें देश में कृषि शिक्षा और अनुसंधान को दिशा देने वाले सबसे प्रतिष्ठित केंद्र का अगुवा नियुक्त कर दिया गया.
आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, पीएमओ की ओर से गठित सर्च कम सेलेक्शन कमेटी ने जो 8 वैज्ञानिक अंतिम रूप से साक्षात्कार के लिए चयनित किए थे, उनमें शीर्ष पर डॉ. नरेंद्र सिंह राठौर का नाम था और उनका कुल अनुभव 34 साल से ज्यादा था, कृषि अनुसंधान प्रबंधन के क्षेत्र में उनके पास 11 साल से ज्यादा का अनुभव था.
दूसरे नंबर पर डॉ. संजय के पाटिल के पास भी 29 साल का अनुभव था और कृषि अनुसंधान प्रबंधन में 8 साल से ज्यादा का अनुभव था. तीसरे नंबर पर डॉ. एस अयप्पन का नाम था जो आईसीएआर के उस वक्त के डीजी थे जिनका अनुभव 38 साल से ज्यादा का था, हालांकि डॉ. अयप्पन इंटरव्यू में शामिल नहीं हुए. चौथे नंबर पर डॉ. अशोक कुमार सिंह के पास 28 साल से ज्यादा का अनुभव था तो पांचवें नंबर पर प्रो. एके श्रीवास्तव के पास भी 28 साल का अनुभव, छठे नंबर पर डॉ. राजकुमार सिंह के पास 28 साल का अनुभव तो सातवें नंबर पर डॉ. डीपी बिरादर के पास 31 साल का अनुभव और 8वें नंबर पर डॉ. के. अलगूसुंदरम के पास भी 29 साल का अनुभव आरटीआई की जानकारी में सामने आया है.
जाहिर तौर पर पीएमओ की ओर से गठित सर्च कम सेलेक्शन कमेटी पर सवाल उठने लाजिमी हैं कि आखिर कैसे इतने वरिष्ठ वैज्ञानिकों की वरिष्ठता को दरकिनार कर उन्होने ऐसे शख्स को आईसीएआर का डीजी और कृषि अनुसंधान का सचिव नियुक्त कर दिया जिसके पास ना तो अनिवार्य और वांछित योग्यता ही है और ना ही जिसने उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए आवेदन किया और ना ही जिसका नाम ही देश के किसी वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक ने सर्च कम सेलेक्शन कमेटी के सामने निर्धारित समयसीमा के भीतर नामित किया.
राकेश उपाध्याय