दिल्ली एनसीआर में इन दिनों जैमिनी सर्कस लगा हुआ है. कभी सर्कस की अनोखी दुनिया बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी पर इन दिनों मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में मशगूल बच्चे और युवा सर्कस में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते जिसका खामियाजा सर्कस में काम करने वाले कलाकारों को उठाना पड़ता है.
एक जमाने में सर्कस लोगों के मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय साधन होता था. रस्सी पर करतब दिखाती लड़कियां, आंखों में पट्टी बांधे चाकुओं का खेल और लोगों को हर हाल में हंसाने की कोशिश करते जोकर. ये वो दौर था जब लोग सर्कस में ये सब देखने के लिए मोटी रकम चुकाने को तैयार रहते थे. पर अब बदलती और एडवांस होती टेक्नोलॉजी की रेस में सर्कस कहीं पीछे छूट गया है और कलाकार भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं.
जैमिनी सर्कस के मैनेजर कृष्णा का कहना है, 'सर्कस एकमात्र ऐसा मनोरंजन था जिसका लुफ्त पूरे परिवार के साथ उठाया जाता था. बच्चे बूढ़े और जवान सभी के लिए सर्कस की दुनिया अनोखी होती थी लेकिन धीरे-धीरे इस पारिवारिक मनोरंजन की जगह सिनेमा टेलीविजन और मोबाइल इंटरनेट ने ले ली और रही-सही कसर सरकार की उदासीनता और बढ़ती महंगाई ने पूरी कर दी. जैसे-तैसे कर के कुछ ही सर्कस कंपनियां बची हैं जो अपनी बेबसी और बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर हैं.'
सर्कस के घटते क्रेज के चलते इस व्यवसाय से जुड़े ज्यादातर लोगों ने विकल्प तलाश लिए और जो बच गए वो अधिकतर खाली पड़ी कुर्सियों को ही अपना हुनर दिखाने को मजबूर हैं. इसी सर्कस में जोकर बन कर 20 साल गुजार चुके राहुल कहता है, 'आखिर क्यों लोगो का सर्कस के प्रति मोहभंग हो गया, ये एक बहस का विषय है पर आज भी इसी के सहारे अपनी जीविका चलाने को मजबूर परिवार तालियों की आवाज सुनने की उम्मीद लिए सर्कस दिखाए जा रहे है. मेरा तो कद इतना छोटा है मैं चाह कर भी कोई और काम नहीं कर सकता. सरकार के लिए भी मरे के समान हैं, इसके अलावा कुछ कभी किया ही नही अब क्या कहा जाए.'
मायूस चेहरे खाली कुर्सियों के बीच अपने हुनर के बदले लोगों की शाबाशी तलाशते इसी जज्बे के साथ जी रहे हैं कि 'The show must go on' पर मौजूदा हालात देखते हुए लगता नहीं कि ये भी ज्यादा दिन इनके हौसलों को बांधे रख पाएगा. घर चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है जो अब सर्कस में नही है. दोष चाहे हमारे बदले आधुनिक समाज का हो या सरकार की अनदेखी का, आज का कड़वा सच यह है कि हम दूसरे देशों में सर्कस देखने के लिए लाखों रुपये खर्च कर सकते हैं पर हमारे खुद के देश मे बर्बाद होते हुनर की हमें कोई परवाह नहीं.
स्मिता ओझा