दिल्ली: राज्यसभा सांसद को अयोग्य घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज, HC ने याचिकाकर्ता पर लगाया जुर्माना

दिल्ली हाईकोर्ट ने उस याचिका का खारिज कर दिया है, जिसमें याचिकाकर्ता ने राज्यसभा सांसद और BCI के चेयरमैन मनन मिश्रा को राज्यसभा सदस्यता से अयोग्य घोषित करने की मांग की थी. अदालत ने याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है और चार हफ्ते में जुर्माने की राशि दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का निर्देश दिया है.

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दिल्ली हाई कोर्ट. (फाइल फोटो) दिल्ली हाई कोर्ट. (फाइल फोटो)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 10 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 6:25 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने राज्यसभा सांसद और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को राज्यसभा सदस्यता से अयोग्य घोषित की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है. साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है. 

जस्टिस संजीव नरूला की एकल जज पीठ ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता अमित कुमार दिवाकर को  चार हफ्ते में 25 हजार रुपये दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा करने का आदेश दिया है.

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पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरा, क्योंकि न तो वो प्रभावित है और न ही कानूनी तौर पर अर्जी दाखिल करने के लिए उपयुक्त व्यक्ति यानी उसका कोई लोकस नहीं है. लिहाजा इस याचिका में कोई दम नहीं है. इस तरीके से याचिका दाखिल करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है. इसलिए याचिकाकर्ता पर 25,000 रुपए का जुर्माना लगाया गया है. अदालत ने अपने आदेश में यह राशि चार हफ्ते के अंदर दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का निर्देश दिया.

संविधान में अलग है नियम

हाईकोर्ट ने कहा कि संसद से किसी सदस्य को अयोग्य घोषित करने के लिए संविधान ने उचित प्रावधान किया है. एक रिट याचिका में किसी संसद सदस्य को अयोग्य करार देने का आदेश कोर्ट कैसे दे सकता है?. हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 102 (1) के तहत केवल अनुमानों के आधार पर अयोग्यता अपने आप नहीं हो जाती है. संविधान के दायरे में इसकी पड़ताल होती है, तब अयोग्यता होती है. इसके लिए चुनाव याचिका दायर करनी होती है.

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याचिकाकर्ता ने दिए ये तर्क

दिवाकर ने अर्जी में कहा कि बीसीआई अध्यक्ष के रूप में मिश्रा की भूमिका संसद सदस्य के रूप में उनकी स्थिति से टकराती है, क्योंकि ये लाभ के पद के दायरे में है. उन्होंने तर्क दिया कि बीसीआई अध्यक्ष पद से जुड़ी वैधानिक और वित्तीय शक्तियां "लाभ का पद" धारण करने के बराबर हैं, जिससे मिश्रा को संसद की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है. दिवाकर ने "लाभ के पद" पर पंडित ठाकुर दास भार्गव समिति की रिपोर्ट (1955) का हवाला दिया, जिसमें अधिकार प्रभाव और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर अयोग्यता पर जोर दिया गया था.

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