छत्तीसगढ़ में दूध की खपत में आई कमी, दाम में गिरावट

छत्तीसगढ़ में 40 रुपये प्रति लीटर में भी डेरी उद्योग वाले किसानों से दूध खरीदने को राजी नहीं है. राज्य में गो पालक किसानों के लिए राज्य सरकार का दुग्ध महासंघ एक मात्र सहारा था. लेकिन उसने भी दूध के बाजार के सामने घुटने टेक दिए हैं.

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छत्तीसगढ़ में दूध की बिक्री में गिरावट छत्तीसगढ़ में दूध की बिक्री में गिरावट

मोनिका गुप्ता / सुनील नामदेव

  • रायपुर,
  • 28 जुलाई 2018,
  • अपडेटेड 6:50 PM IST

छत्तीसगढ़ में  एक तरफ दूध की नदियां बह रही हैं, वहीं दूसरी ओर गो पालक किसान संकट में है. दूध को लेकर राज्य के किसान डिमांड और सप्लाई के गणित में ऐसे फंसे हैं कि उनका जीवन यापन संकट में पड़ गया है. दूध की खपत नहीं होने से उसके दाम रोजाना घट रहे हैं. अभी तक उत्तम किस्म का दूध 50 से 60 रुपये प्रति लीटर तक बिकता था. लेकिन अब दाम में गिरावट जारी है.

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दुग्ध संघ ने बीते पांच महीने से अपनी खराब आर्थिक स्थिति के चलते किसानों का भुगतान नहीं किया है. यही नहीं सरकार के सहकारी दुग्ध संघ में पांच लाख किलों दूध जाम हो गया है.  भारी नुकसान से बचने के लिए इसका पाउडर बना दिया गया. इसके बावजूद चार महीने से दूध पाउडर के भी खरीददार नहीं मिल पाए. गो उत्पादकों के मुताबिक, दूध के खराब होने के अंदेशे के चलते उसे सस्ते दामों में बेचना उनकी मजबूरी हो गई है.

बता दें कि राज्य में प्रतिदिन 1.30 लाख से लेकर 1.40 लाख लीटर रोजाना दूध का उत्पादन होता है. लेकिन 60 से 65 हजार लीटर ही दूध बिक पाता है. शेष का पाउडर बनाया जाता है. सरकारी दुग्ध संघ के मुताबिक, राज्य में लोगों को दूध पीने की आदत नहीं है. इसलिए यह समस्या आ रही है. फिलहाल गो पालक किसान अपने अच्छे दिन के लिए आंदोलन की राह पर हैं. इस मामले को लेकर कांग्रेस ने बीजेपी को घेरा है. कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी गाय को लेकर सिर्फ राजनीति कर रही है. लेकिन गाय के दूध के वितरण और बिक्री को लेकर उसकी कोई योजना नहीं है. यहां तक की पिछले पांच महीने के लंबित भुगतान की अदायगी के लिए गो पालक किसान रोजाना दुग्ध संघ के दफ्तर का चक्कर काट रहे हैं. लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है.

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छत्तीसगढ़ में छोटे बड़े लगभग डेढ़ लाख गो पालक किसान दूध बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं. इनमें से 50 हजार से ज्यादा किसान सीधे तौर पर सहकारी दुग्ध महासंघ से जुड़े हुए हैं. दुग्ध महासंघ पर गो पालक किसानों की करोड़ों की अदायगी है. लेकिन उसकी तिजोरी खाली है. किसानों की दलील है कि उनके पांच माह से लंबित भुगतान के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए.  

राज्य सहकारी दुग्ध महासंघ के अध्यक्ष रसिक परमार के मुताबिक, सरकार की योजनाओं के अच्छे परिणाम सामने आने से दुग्ध उत्पादन लगातार बढ़ा है. लेकिन इसकी खपत में उत्पादन की तुलना में वृद्धि नहीं हो पाई. इसके चलते खराब हालात बने हैं. उनकी यह भी दलील है कि राज्य के लोगों में दूध पीने की आदत नहीं है. यहां लोग चाय ज्यादा पीते हैं. इसलिए दूध की खपत में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई.

दूसरी ओर गो पालक संघ के संरक्षक वीरेंद्र पांडे के मुताबिक, दुग्ध वितरण और उसकी बिक्री की योजना के फेल होने के चलते गो पलकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी को गाय से तो प्रेम है, लेकिन दूध से नफरत. इसलिए दूध की बिक्री की कारगर योजना अब तक नहीं बन पाई. उन्होंने कहा कि गो पालकों  के लंबित भुगतान की जल्द अदायगी नहीं की गई तो गायों पर संकट आ खड़ा होगा.   

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फिलहाल दुग्ध के दामों में आ रही भारी गिरावट से गौ पालक सकते में है. दूसरी ओर कांग्रेस गौ पालकों की समस्याओं को लेकर राजनैतक मैदान में कूदने की तैयारी में है.  

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