गया के सबसे बड़े अस्पताल में घूमते हैं जानवर, बदहाली की देखें तस्वीर

अस्पताल के प्रबंधक संतोष कुमार कहते हैं कि जरा सी बारिश हो जाए तो बाहर के पूरे इलाके में बाढ़ आ जाती है. कई साल और महीनों से प्रशासन को इस बारे में लिखते रहे हैं लेकिन चिट्ठियां कहां गईं कोई नहीं जानता. 

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गया के अस्पताल की हालत खराब (फोटो- आशुतोष मिश्रा) गया के अस्पताल की हालत खराब (फोटो- आशुतोष मिश्रा)

आशुतोष मिश्रा

  • पटना,
  • 25 जून 2019,
  • अपडेटेड 2:14 PM IST

बिहार में चमकी बुखार और लू का कहर जारी है. राज्य में अब तक 150 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और ये आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है. अकेले गया में लू से अब तक 39 लोगों की मौत हो चुकी है. सबसे ज्यादा मौतें यहां के अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज में हुई है. ये जिले का सबसे बड़ा अस्पताल है, जिस पर पूरे मगध मंडल के हजारों लाखों मरीजों की जिम्मेदारी है. सिर्फ गया ही नहीं बल्कि झारखंड के चतरा जैसे इलाकों से भी मरीज यहां इलाज कराने आते हैं. लू लगने वाले मरीजों को इसी अस्पताल में इलाज के लिए लाया जाता है. लोगों को इलाज देने वाला गया का मगध मेडिकल कॉलेज कितना स्वस्थ है इसका अंदाजा आप यहां की तस्वीरों को देखकर लगा सकते हैं. 

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अस्पताल के प्रबंधक संतोष कुमार कहते हैं कि जरा सी बारिश हो जाए तो बाहर के पूरे इलाके में बाढ़ आ जाती है. कई साल और महीनों से प्रशासन को इस बारे में लिखते रहे हैं लेकिन चिट्ठियां कहां गईं कोई नहीं जानता. 

इस अस्पताल में सिर्फ दो इमरजेंसी वार्ड हैं. बेड के नाम पर दो कमरों में 20 बेड भी नहीं हैं. अस्पताल का गलियारा जो आमतौर पर आने-जाने के काम में इस्तेमाल होता है वह भी इमरजेंसी वार्ड में बदल चुका है. अस्पताल प्रशासन कहता है हर किसी को बेड मिलता है.

'ओपीडी में  जानवर'

वार्ड में जाने से पहले ओपीडी को देखें तो यहां जानवरों का घूमना आम बात है. हालांकि अस्पताल प्रबंधक संतोष कुमार कहते हैं कि सब कुछ ठीक है. महिलाओं के इलाज के लिए बनाया गया महिला वार्ड दिखने में किसी भूत बंगले से कम नहीं है. इसकी स्थिति इतनी बदहाल है कि यहां मरीज नहीं मानों कैदियों को रखा जाता है. छत की दीवारें टूट रही हैं. बरसात में छत से झरना बहता है.

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बदहाली का किस्सा यहीं तक सीमित नहीं है. गया के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में महिलाओं के लिए शौचालय ही नहीं है. महिला वार्ड के बाहर जो शौचालय बना था वह जाम होने के चलते हैं अब बंद है. बाहर सार्वजनिक शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है.

यहां पर साफ-सफाई का भी बुरा हाल है. यहां के सिक्योरिटी गार्ड के मुताबिक सारा कचरा मरीजों के परिवार का है जो जहां तहां फेंक देते हैं. संतोष कुमार कहते हैं कि हर रोज सफाई होती है लेकिन मरीजों के परिवारवाले सुनते नहीं हैं और गंदगी फैलाते हैं. अपनी जिम्मेदारी का ठीकरा मरीजों और उनके परिवार के साथ छोड़कर अस्पताल प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा लिया.

गया में लू के कारण 39 लोगों की मौत हो गई. यहां अस्पताल के कमरों में एयर कंडीशन तो छोड़ दें कूलर भी नहीं हैं. किसी मरीज के परिवार ने यहां तक कहा कि यहां के पंखे भी बंद हो जाते हैं. जो बड़ा पंखा लगा है उससे हवा इतनी नहीं कि मरीजों को आराम मिल सके.

वार्ड के बाहर नोटिस बोर्ड लगाया गया है जिसमें दावा किया गया है कि रविवार से शनिवार तक वार्ड के हर बेड की चादर बदली जाएगी जिसका रंग अलग- अलग होगा. मरीज के परिजनों के मुताबिक यहां कई दिनों तक चादर नहीं बदली जाती. वहीं संतोष कुमार कहते हैं अस्पताल में कपड़े धोने वाली मशीन कुछ सप्ताह से बंद है. जल्दी ही उसे ठीक करवा लेंगे.  

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डॉक्टरों की भी है कमी

इस अस्पताल में 330 डॉक्टरों की जरूरत है लेकिन फिलहाल 230 डॉक्टर काम कर रहे हैं. यहां 370 नर्सों की जरूरत है, लेकिन 250 काम कर रही हैं.  सुविधाओं के अभाव के बावजूद डॉक्टर यहां अपना फर्ज निभा रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं का महत्व ना समझने वाली सरकार को अपनी जनता की कितनी परवाह है उसका साक्षी गया का हॉस्पिटल है.

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