कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में सबसे ज्यादा परेशानी इस वायरस की लगातार बदल रही प्रकृति से हो रही है. वायरस कैसे मानव के शरीर में प्रवेश कर रहा है इसकी कोई ठोस जानकारी वैज्ञानिकों के पास भी नहीं है. इस वायरस ने आम आदमी के अलावा बचाव के बेहद सुरक्षित तौर तरीके अपना रहे डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को भी अपनी चपेट में लिया है. वैज्ञानिकों ने जब वायरस के ऐसे संक्रमण फैलाने के कारण खोजे तो कई तथ्य उभर कर सामने आए हैं. जैसे कि कोरोना संक्रमण से पीड़ित व्यक्ति की रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद भी उसमें वायरस ऐक्टिव रह सकता है. ऐसे मरीज दूसरों को संक्रमित करने की क्षमता रखते है. इसके अलावा आइसोलेशन में आने वाला नया मरीज भी दूसरे ठीक हो रहे मरीजों को दोबारा संक्रमित करने की आशंका पैदा करता है. इससे आइसोलेशन वार्ड में पहले से भर्ती मरीजों के इलाज पर की गई मेहनत पर पानी फिर जाता है.
यही नहीं वैज्ञानिकों की जांच में यह भी तथ्य सामने आया है कि कोविड की दो लगातार जांच निगेटिव आने के बाद अन्य बीमारियों से पीड़ित मरीज सामान्य वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाता है. कई बार ऐसे मरीजों की रिपोर्ट तो दो बार निगेटिव आती है लेकिन उनमें वायरस कमजोर हालत में लेकिन ऐक्टिव रहता है. यही मरीज दूसरे सामान्य मरीजों को या फिर डॉक्टर को कोरोना वायरस से संक्रमित कर देता है. आगरा में कोरोना संक्रमण का विस्फोट होने के बाद यहां के एस.एन. मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने भी वायरस के स्वभाव में इसी तरह की प्रकृति का अनुभव किया था.
इसके बाद मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार तैयार की गई ‘स्टार’ पद्धति के आधार पर इलाज की प्रक्रिया अपनाने की तैयारी शुरू की है. कोविड-19 के इलाज में पहली बार इस यह प्रकिया यूपी में अपनाई जाएगी. स्टार यानी ‘स्टेप डाउन-अप ट्रांजिशनल एक्सलरेटेड रिकवरी वार्ड ’ की इलाज प्रक्रिया में दो तरह के वार्ड बनाए जाते हैं. ‘अप’ में कोरोना वायरस से संक्रमित होकर आने वाले लोगों के लिए जनरल वार्ड, पुराने रोगियों के लिए नॉन-वेंटीलेटर वार्ड, जबकि ‘डाउन’ निगेटिव रिपोर्ट आने के बाद संक्रमित को रखा जाएगा. दूसरी बीमारी से पीड़ित गंभीर और अति गंभीर मरीजों का इलाज संबंधित वार्डों में नहीं किया जाएगा. इसके लिए अलग वार्ड की व्यवस्था की जाएगी जिसमें वे दूसरे मरीजों के साथ भर्ती न हों.
आगरा में एस.एन. मेडिकल कॉलेज में एल-2 श्रेणी का कोविड अस्पताल बनाया गया है. यह बाल रोग विभाग में बना अस्पताल 100 बिस्तरों वाला है. आगरा के एल-1 स्तर के कोविड अस्पताल में अभी 41 मरीज भर्ती हैं और एल-3 लेवल के कोविड अस्पताल में भी 100 बिस्तर मौजूद हैं. ऐसे में शासन कोई अन्य अस्पताल खोलने के मूड में नहीं है. ऐसे में एस.एन. मेडिकल कॉलेज की दूसरी यूनिट में ‘स्टार डाउन’ वार्ड बनाने का निर्णय लिया गया है. यहां 50 बिस्तरों की व्यवस्था की जा रही है जहां कोविड-1 अस्पताल से ठीक होने वाले मरीजों को रखा जाएगा. एस. एन. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एस. एन. कालरा बताते हैं, “स्टार पद्धति संक्रमण रोकने के लिए एक कारगर पद्धति है. आगरा में डॉक्टर, पैरामेडिकल कर्मचारियों के संक्रमित होने के बाद किए गए गहन अध्ययन के बाद यह पद्धति अपनाई गई है.” इस तरह आगरा का एस.एन. मेडिकल कॉलेज सूबे का पहला मेडिकल कॉलेज होगा जहां ‘स्टार’ पद्धति से कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जाएगा.
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आशीष मिश्र