बेस्ट बिजनेस स्कूलः उत्कृष्टता का कारोबार

जब कुछ भी स्थायी नहीं है, बी-स्कूलों में भी शिखर पर उलटफेर स्वाभाविक है. लेकिन यह उन्हें छात्रों को महामारी के बाद की दुनिया के लिए तैयार करने से रोक नहीं रहा.

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थोड़ा मनोरंजन आइआइएम-ए कैंपस में गीत-संगीत का आयोजन थोड़ा मनोरंजन आइआइएम-ए कैंपस में गीत-संगीत का आयोजन

कौशिक डेका

  • नई दिल्ली,
  • 14 नवंबर 2021,
  • अपडेटेड 2:03 PM IST
उत्कृष्टता का कारोबार

तुम्हारा खेल सबसे कमजोर तब होता है जब तुम आगे होते हो.’’ यह बात ऑस्ट्रेलियाई टेनिस हस्ती रॉड लेवर ने कही थी. यह इंडिया टुडे ग्रुप की सालाना बी-स्कूल रैंकिंग के 2021 संस्करण में देखे गए सबसे बड़े उलटफेर को भी बयान करती है.

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प्रमुख मार्केट रिसर्च एजेंसी मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट (एमडीआरए) की ओर से तैयार इस साल की रैंकिंग में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट कलकत्ता (आइआइएम-सी) ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद (आइआइएम-ए) को शीर्ष पायदान से बेदखल कर दिया. 2016 में गुणात्मक सुधार के लिए अध्ययन की पद्धति में बदलाव किए जाने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है.

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अपनी अव्वल स्थिति बनाए रखने में आइआइएम-ए ने जो 'कमजोरी’ दिखाई, वह देश के प्रमुख प्रबंधन संस्थानों के बीच गहन प्रतिस्पर्धा की तरफ ही इशारा करती है. आइआइएम-ए ने पांच में से तीन—पढ़ने-सीखने का अनुभव, रहने का अनुभव और चयन प्रक्रिया, संचालन और सांचा-ढांचा—मानदंडों पर शीर्ष स्थान हासिल किया, तो आइआइएम-सी बाकी दो में नंबर एक थी, जो हैं प्लेसमेंट परफॉर्मेंस और भविष्य का नजरिया. इसी भविष्य का नजरिया मानदंड में मिले ऊंचे अंकों ने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को कुल अंकों में मात्र 0.1 अंक से बेदखल करने और पहली बार दूसरी पायदान से छलांग लगाकर शीर्ष पर आने में आइआइएम-सी की मदद की.

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यह बारीक फर्क इस हकीकत को प्रमुखता से बताता है कि आत्मसंतोष या स्थायित्व की कोई गुंजाइश नहीं है और यह बात भारतीय बिजनेस स्कूलों की इस सबसे भरोसेमंद रैंकिंग में अक्सर सामने आई है. शीर्ष संस्थानों में एक नया संस्थान दाखिल हुआ है और वह है इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट लखनऊ (आइआइएम-एल), जिसने रैंकिंग में 2016 के बाद पहली बार हिस्सा लिया. अलबत्ता शीर्ष 10 में सरकारी संस्थाओं के दबदबा सरीखे कुछ निश्चित रुझान बदले नहीं हैं. रैंकिंग में शीर्ष 10 में सात सरकारी बिजनेस स्कूल हैं.

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औसत वेतन के लिहाज से भी सरकारी स्कूलों ने निजी स्कूलों से बेहतर प्रदर्शन किया. शीर्ष 100 में आए सरकारी प्रबंधन कॉलेजों के छात्रों को मिले औसत घरेलू सालाना वेतन में बीते पांच साल में 40 फीसद से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है, जबकि उनके मुकाबले शीर्ष 100 में आए निजी बिजनेस स्कूलों के छात्रों के लिए यह बढ़ोतरी 28 फीसद ही है.

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निवेश पर प्रतिफल (आरओआइ) इस फर्फ को और तीखा कर देता है. आरओआइ संस्थान के कैंपस प्लेसमेंट से अर्जित औसत वेतन में वसूल की गई फीस का भाग देकर निकाला जाता है. निजी संस्थानों के 0.80 के मुकाबले सरकारी संस्थानों का आरओआइ 1.42 है.

इसके अलावा भौगोलिक असमानताएं भी हैं. आइआइएम-सी की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली एक बात यह है कि पूर्वी क्षेत्र के संस्थान लगातार सबसे ज्यादा औसत वेतन दर्ज करते रहे हैं, इसके बावजूद कि इस क्षेत्र में बाकी तीनों के मुकाबले बहुत ही कम बिजनेस स्कूल हैं. वैसे पूर्वी क्षेत्र के संस्थान ज्यादा कोर्स फीस वसूलते हैं, पर उनका आरओआइ भी बाकी देश के मुकाबले कहीं ज्यादा है. इंडिया टुडे-एमडीआरए की बिजनेस स्कूलों की रैंकिंग में ऐसी और भी कई गहरी बातें मिलेंगी, खासकर जब वे संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर पढ़ाई की गुणवत्ता और पैसा वसूल पढ़ाई तक, सबकुछ का जायजा लेते हैं.

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इतने वर्षों के दौरान छात्रों के लिए ज्यादा मूल्यवान होने की कोशिश में सर्वे का दायरा भी बढ़ा है. यह सबसे व्यापक अध्ययन भी है, जिसमें 305 बिजनेस स्कूलों की रैंकिंग की गई है, जो पिछले साल के 293 स्कूलों की तादाद से ज्यादा हैं. ज्यादा अहम बात यह कि यह महामारी की मार से त्रस्त दुनिया में प्रबंधन की शिक्षा में आए बदलावों की व्यापक झांकी पेश करता है. पिछले साल से जारी एक चिंताजनक रुझान सरकारी और निजी दोनों प्रबंधन संस्थानों में आंत्रप्रेन्यौर बनना चुनने वाले छात्रों के प्रतिशत में अचानक आई गिरावट है. 

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कोविड-19 ने विभिन्न दूसरी शिक्षा संस्थाओं की तरह भारत के बिजनेस स्कूलों में भी शिक्षा चक्र और प्रशिक्षण में जबरदस्त उथल-पुथल मचाई है. लेकिन साथ ही, इस संकट ने बुनियादी ढांचे, शिक्षाशास्त्र और शोध के लिहाज से नवाचार का मौका भी दिया है. शीर्ष कंपनियां उभरती विश्व व्यवस्था के हिसाब से ढलने के लिए अपने बिजनेस मॉडल नए सिरे से गढ़ रही हैं.

उन्हें ऐसे मानवबल की तलाश है जो इन मॉडल को चला सकें. ज्यादातर बी-स्कूल इस जरूरत को पूरा करने के लिए आगे आ रहे हैं. महामारी के बाद टेक्नोलॉजी से जुड़े नवाचारों के जरिए कक्षाओं में ढांचागत बदलाव लाने के अलावा बिजनेस स्कूल नए और तेजी से विकसित हो रहे कारोबारी माहौल के लिए नया पाठ्यक्रम ला रहे हैं. 

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कई उद्योगों ने खुद को कारोबार करने के डिजिटल ढांचे में ढाल लिया है. ऐसे में आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआइ) और मशीन लर्निंग सरीखी डिजिटल टेक्नोलॉजी की अहमियत कई गुना बढ़ गई है. प्रबंधन संस्थानों ने या तो इन पर कोर्स मॉड्यूल शुरू किए हैं या इन्हें पाठ्यक्रम में मिला लिया है. भविष्य में इन संस्थानों का गुणात्मक मूल्यांकन बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि वे महामारी के बाद की दुनिया में सिखाने-पढ़ाने के लिए कितनी तेजी से कमर कसते हैं. 

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