भारत के दक्षिणी राज्यों आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में माओवादियों के फन उठाने और हमलावर होने का खतरा फिर से बढऩे लगा है. आंध्र प्रदेश के विभाजन से पहले करीब एक दशक तक खामोश रहने के बाद वामपंथी अतिवादी छत्तीसगढ़ से इन दोनों राज्यों की ओर बढ़ रहे हैं. हाल के कुछ हफ्तों में माओवादियों के कम से कम 500 कैडर इन दो राज्यों में घुस चुके हैं और उन्होंने साफ संकेत दिए हैं कि वे जब चाहें यहां हमले कर सकते हैं.
11 दिसंबर को विशाखापत्तनम जिले की अराकू घाटी में चिलपाड़ा गांव में माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच जमकर गोलीबारी हुई थी. मुठभेड़ के बाद सुरक्षा बलों ने 15 किट बैग बरामद किए, जिनसे पता चलता है कि ये हथियारबंद गिरोह राज्य में सक्रिय होकर अपने पैर पसार रहे हैं. सुरक्षा बलों ने ओडिशा पुलिस और विशाखापत्तनम से हेलिकॉप्टर के जरिए लाए गए प्रशिक्षित कुत्तों की मदद से तलाश अभियान शुरू किया, लेकिन वे वहां से भाग चुके माओवादियों का पता लगाने में नाकाम रहे.
महत्वपूर्ण बात यह है कि 1997 के बाद से अराकू घाटी में माओवादियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ की यह पहली घटना है. चिलापाड़ा की सीमा ओडिशा के कोरापुट जिले में पोटांगी इलाके से लगती है. यह इलाका घने जंगलों वाला है, जहां उग्रवादी आराम से छिपने की जगह पा जाते हैं.
पिछले साल अक्तूबर और नवंबर में माओवादियों ने 'पुलिस की ज्यादतियों' के विरोध में आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी टीडीपी कार्यकर्ताओं और तेलंगाना में सत्ताधारी टीआरएस के सदस्यों का अपहरण कर लिया था. हालांकि कुछ दिन बाद उन्हें बिना कोई चोट पहुंचाए छोड़ दिया गया. उन्होंने चेतावनी दी कि हर माओवादी की हत्या के बदले सत्ताधारी पार्टी के दो नेताओं को मौत के घाट उतार दिया जाएगा.
आंध्र प्रदेश और ओडिशा की सीमा पर सक्रिय माओवादियों ने विशाखापत्तनम जिले में कोठागुड़ा गांव से टीडीपी के तीन कार्यकर्ताओं को पकड़ लिया और उन्हें सीमा पर चित्रकोंडा के जंगलों में ले जाकर नौ दिन तक बंधक बनाए रखा. दूसरे गुट ने तेलंगाना में खम्माम जिले के भद्राचलम क्षेत्र के जंगलों में टीआरएस के छह समर्थकों को बंधक बनाकर रखा. उन्हें तीन दिन बाद 21 नवंबर को रिहा किया गया.
छत्तीसगढ़ के साथ खम्माम की 300 किमी की सीमा लगती है. इस दूरदराज के इलाके में एक तरह से समानांतर सरकार चलाने वाले उग्रवादी हाल के महीनों में 20 से ज्यादा वाहनों में आग लगा चुके हैं ताकि वहां नई सड़कों को खोलने से रोका जा सके. छत्तीसगढ़ और ओडिशा के दक्षिणी इलाकों में उन्हें काबू में रखने में सुरक्षा बलों की असफलता के कारण दक्षिण के इन राज्यों में माओवादियों की मौजूदगी बढ़ती जा रही है.
विशाखापत्तनम जिले में उनके बढ़ते प्रभाव को लेकर आंध्र प्रदेश विशेष रूप से चिंतित है. इस इलाके में माओवादी राज्य के विशेष बल ग्रेहाउंड के अलावा सीआरपीएफ और बीएसएफ को चकमा देकर एक जगह से दूसरी जगह पर आते-जाते रहते हैं. ये विद्रोही फिर से संगठित होकर उन इलाकों में घूमते रहते हैं जहां सीमा पर सुरक्षा में कमी है या वे कंधमाल और ओडिशा के पश्चिमी जिलों की तरफ चले गए हैं.
खुफिया सूत्रों की मानें तो इन विद्रोहियों के साथ जल्दी ही कई और मुठभेड़ें हो सकती हैं. सुरक्षा बलों को चिंता है कि अराकू घाटी में मुठभेड़ के बाद अपहरण की कुछ और घटनाएं हो सकती हैं. सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को बता दिया गया है कि वे पर्याप्त सुरक्षा के बिना दूरदराज के गांवों में कदम न रखें. सरकार की उन इलाकों में करीब 40 सड़कें बनाने की योजना है, जिन्हें माओवादियों की शरणस्थली माना जाता है.
इस इलाके में माओवादियों के पास सूचनाओं के लिए एक भरोसेमंद नेटवर्क है. पूर्वी गोदावरी जिले का आदिवासी क्षेत्र इस इलाके में शामिल है. आंध्र प्रदेश और ओडिशा की सीमा पर स्थित इस पहाड़ी और जंगली इलाके में कोई भी पुलिस स्टेशन नहीं है. माओवादी उग्रवादी जब हमला करते हैं तो उन्हें रोकने के लिए सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती पर्याप्त नहीं होती है. इसीलिए आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जे.वी. रामुडु ने विजाग आदिवासी इलाके में अतिरिक्त केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की मांग की है. उन्होंने माओवादियों के खिलाफ कम समय में तेजी से कार्रवाई करने के लिए गहन तलाशी के वास्ते अपनी ग्रेहाउंड बल का इस्तेमाल करने के लिए कहा है. वे चाहते हैं कि इस त्वरित कार्रवाई के दौरान सीआरपीएफ और दूसरे सुरक्षा बल उन उग्रवादियों पर निगरानी बनाए रखें.
उधर अपने समर्थन का आधार व्यापक बनाने के लिए माओवादियों ने इस इलाके में 1,212 हेक्टेयर के जंगल में बॉक्साइट के खनन के खिलाफ अपना प्रचार फिर से तेज कर दिया है. सिर्फ आदिवासी सलाहकार परिषद, जो एक वैधानिक संस्था है, को ही संविधान के पांचवें अनुच्छेद के तहत अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में खनन की अनुमति देने का अधिकार प्राप्त है. लेकिन विरोध के बाद टीडीपी सरकार ने विशाखापत्तनम जिले के चिंतापल्ली इलाके में खनन करने की अनुमति देने के अपने आदेश पर रोक लगा दी है.
देश में 298.3 करोड़ टन के कुल राष्ट्रीय खनिज का करीब 21 प्रतिशत हिस्सा इसी राज्य में है और इसे सबसे उत्कृष्ट किस्म का खनिज माना जाता है. खुफिया विश्लेषकों के मुताबिक, ये माओवादी चंद्रबाबू नायडू सरकार को खतरा मानते हैं और वे किसी बड़े हमले की तैयारी कर रहे हैं. उग्रवादियों ने 2003 में नायडू के पहले के कार्यकाल के दौरान उन पर जानलेवा हमला किया था लेकिन वे बाल-बाल बच गए थे. लेकिन नायडू इस बार माओवादियों को धूल चटाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं, क्योंकि उन्हें इस बात का पूरा एहसास है कि माओवादियों का प्रभाव बढऩे से आंध्र प्रदेश में निवेश की संभावना कमजोर पड़ सकती है.
उधर तेलंगाना में भी माओवादियों की गतिविधियां इतनी ही चिंताजनक हैं. टीआरएस, जिसने विभाजन से पहले माओवादी एजेंडे को अपने एजेंडे के तौर पर बल दिया था, ने सत्ता में आने के बाद पूरी तरह यू-टर्न ले लिया है. वह माओवादियों की हिंसा को दबाने के लिए पूरी तरह दृढ़ है. डीजीपी अनुराग शर्मा कहते हैं, ''वे हमारे संविधान में विश्वास नहीं रखते हैं. इसलिए हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके लिए कोई स्थान नहीं है. हम उन्हें अपनी विचारधारा और पैर फैलाने की इजाजत बिल्कुल नहीं देंगे.''
लेकिन तेलंगाना के विधायक, खासकर जो टीआरएस से संबंध रखते हैं, निशाने पर हैं. खुफिया सूत्र मानते हैं कि खतरा कभी भी हो सकता है क्योंकि 15 सितंबर को वारंगल जिले में माओवादियों के दो प्रमुख कैडरों के मारे जाने के बाद वे बदले की कार्रवाई कर सकते हैं. यही वजह है कि राज्य के पर्यटन और आदिवासी कल्याण मंत्री अजमीरा चंदूलाल अनुसूचित जनजाति के अपने निर्वाचन क्षेत्र का दौरा कभी-कभार ही करते हैं.
उग्रवादियों के नेता तेलंगाना से ही निकलते हैं, हालांकि सामान्य कार्यकर्ता आम तौर पर छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के आदिवासियों के बीच से होते हैं. फिर भी 30 अक्तूबर को एक दशक में पहली बार माओवादियों ने 25 वर्षीय अतराम बल्लार शा को मार डाला, जो आदिलाबाद जिले का आदिवासी ग्रेजुएट था. उस पर पुलिस का मुखबिर होने का आरोप था. इस वारदात को एक हथियारबंद गिरोह का काम माना जा रहा है, जो महाराष्ट्र की सीमा पर सक्रिय है. जिले में कावल बाघ रिजर्व बाघों से ज्यादा माओवादी उग्रवादियों के लिए सुरक्षित स्थान बन चुका है.
राज्य में कई जगहों पर माओवादियों ने अपना आधार बढ़ाने के उद्देश्य से नए कैडरों की भर्ती के लिए पोस्टर लगा रखे हैं. वे बड़े पैमाने पर छात्रों को भी भर्ती कर रहे हैं. पिछले दो दशकों में इस तरह का यह उनका पहला भर्ती अभियान है. बढ़ता सामाजिक विभाजन इस काम में उनके लिए मददगार साबित हो रहा है. जमीन से संबंधित विवाद, जाति और आर्थिक आधार पर गांव में भेदभाव के अलावा आपसी रंजिश के कारण भी इन उग्रवादियों को आसानी से नए कैडर मिल जाते हैं.
पुलिस को भी इस बात की जानकारी है. इसलिए माओवादियों की तरह वे भी दूरदराज के गांवों में सूचना का अपना नेटवर्क बनाने के लिए युवा आदिवासियों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं. विडंबना है कि बेचारे आदिवासी माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच गोलीबारी में बेवजह मारे जाते हैं.
विश्लेषक प्रोफेसर जी. हरगोपाल कहते हैं, ''बंगारू तेलंगाना बनाने का वादा पूरा करने में टीआरएस सरकार की विफलता के कारण गांव के युवा राज्य में उग्रवाद की तरफ बढ़ जाते हैं. सरकार को लोगों की समस्याओं की तरफ ध्यान देना चाहिए और उनकी समस्या का समाधान करना चाहिए. उसे उन लोगों की बात भी सुननी चाहिए जो वादों को पूरा न किए जाने से नाराज हैं.'' अगर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सरकारें इन समस्याओं की तरफ ध्यान नहीं देंगी तो माओवादी समस्या बढ़ती ही जाएगी.
अमरनाथ के. मेनन