बहुत मोहित करने वाला दृश्य है. सफेद कपड़ों में बड़े सलीके से अपनी लटों को सुलझाए हुए नाटे कद के प्रोफेसर और भगवा वस्त्र पहने योगी फुसफुसाकर बातें कर रहे हैं. हम पूछते हैं, ''तो यह संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का विचार किसका था?'' बाबा रामदेव पलटकर जवाब देते हैं, ''हम सबका.'' जाहिर है कि एच.आर. नागेंद्र के साथ चल रही उनकी खुसुर-फुसुर के बीच इस तरह टोका जाना उन्हें पसंद नहीं आया. दोनों दिल्ली में इंडिया टुडे के आयोजन बॉडी रॉक्स में आए हैं. यह उस घटना से सिर्फ एक दिन पहले की बात है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 35,985 लोगों की भीड़ का नेतृत्व करते हुए राजपथ पर योग किया और लगभग सभी 21 आसन किए. उन्होंने भारत की 7,000 वर्ष पुरानी परंपरा पर अपने प्रभुत्व की मुहर लगाते हुए दिल्ली के राजपथ को योगपथ में तब्दील कर दिया. बाबा कहते हैं, ''योग में अहंकार नहीं है, मैं नहीं है.''
नागेंद्र की वैज्ञानिक योग्यता (इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ साइंस, बेंगलूरू से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट और नासा से पोस्ट डॉक्टरेट) प्रभावित करने वाली है. अब वे आयुष मंत्रालय (आयुर्वेद, योग, नेचुरोपैथी, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी) की ओर से शुरू किए गए 'योग टास्क फोर्स' के चेयरमैन हैं. 21 जून के वृहद योग आयोजन के बाद क्या हुआ, इस पर उन्हें और उनके सहयोगियों को सितंबर अंत तक अपनी रिपोर्ट देनी है. इस रिपोर्ट के बाद ही आगे की योजनाओं की रूपरेखा तैयार होगी कि स्कूलों में योग की शिक्षा कैसे दी जाए, इस क्षेत्र में नौकरियों के अवसर कैसे पैदा किए जाएं और कैसे एक नई जीवन शैली विकसित की जाए. इसके लिए विभिन्न मंत्रालयों के बीच सहयोग की जरूरत होगी. क्या योग स्कूलों में शारीरिक प्रशिक्षण पाठयक्रम का हिस्सा होगा? यह मुद्दा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आता है. यह भी मानव संसाधन विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के अधीन होगा कि क्या सैन्य और अद्र्धसैनिक बलों को भी योग का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए? एक प्रस्ताव यह भी है कि स्वैच्छिक संगठनों को भी योग केंद्रों का नेटवर्क बनाने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने पहले ही छठी से दसवीं कक्षा तक के लिए एनसीईआरटी के बनाए योग पाठयक्रम की घोषणा कर दी है. इसके अलावा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षण परिषद ने शिक्षकों के लिए डिप्लोमा, बीएड और एमएड कार्यक्रम में योग प्रशिक्षण को भी शामिल किया है.
लेकिन जर्मनों जैसी बारीक शुद्धता और सोवियतों जैसी विशालता के बावजूद यह अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पवनमुक्तासन (एक आसन, जिसमें खास तरह की गर्म हवा का निष्कासन होता है) से ज्यादा बड़ा कुछ कर पाएगा? इसके पहले प्रधानमंत्री का स्वच्छ भारत अभियान भी बहुत बड़ी महत्वाकांक्षाओं के साथ शुरू हुआ था, लेकिन अभी तक उसका नतीजा कुछ नहीं निकला. रिपोर्ट कहती है, मुमकिन है प्रधानमंत्री कार्यालय शौचालय बनवाने तक ही सीमित रह जाए.
मुक्त बाजार में योग अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा है. तकरीबन 2 करोड़ अमेरिकी स्वेच्छा से योग करते हैं. योग का वैश्विक बाजार लगभग 27 अरब डॉलर का है, जिसके सितारे स्टिंग, ग्वयनेथ पाल्ट्रो और मैडोना जैसे लोग हैं. भारत में उतने ही योग स्कूल हैं, जितने कि गुरु. योग के नियमन को लेकर सबके अपने-अपने विचार हैं. सरकार ने जिनके कार्यकर्ताओं को साथ लेकर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का इतना सफलतापूर्वक आयोजन किया, उस आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर का मानना है कि गुणवत्ता को नियंत्रित करने की जरूरत है. वहीं ईशा फाउंडेशन के सद्गुरु जग्गी वासुदेव मानते हैं कि बाजार की शक्तियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.
भारत में बहुत कम ही सरकारी आयोजन सफल हुए हैं. केबल टेलीविजन, आइटी और यहां तक कि दूरसंचार क्रांति में भी सरकारी हाथ बहुत थोड़ा-सा ही है. अनुमान है कि अभी भारत को दस लाख योग शिक्षकों की आवश्यकता है, लेकिन क्या बाजार की ताकतें इसे पूरा करने के लिए काफी होंगी? ऐसा नहीं है कि भारत ने इस दिशा में उठाए गए मजबूत कदम पहले नहीं देखे. 70 के दशक में धीरेंद्र ब्रह्मचारी टेलीविजन पर नियमित रूप से योग की शिक्षा देते थे. यह वही वक्त था, जब दिल्ली सरकार के स्कूलों में योग अनिवार्य था. लेकिन यह लंबे समय तक नहीं चल पाया. पश्चिम में एक शारीरिक व्यायाम के रूप में योगकी लोकप्रियता का बहुत कम श्रेय सरकारों को जाता है.
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव भी कोई नई बात नहीं है और न ही आयुष मंत्रालय नया है. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव सबसे पहले 2001 में पोर्चुगीज योग कन्फेडरेशन की ओर से पेश किया गया था. 2011 में श्री श्री रविशंकर ने बेंगलूरू में आर्ट ऑफ लिविंग के आयोजन में इसका प्रस्ताव दिया था. भारतीय चिकित्सा और होमियोपैथी विभाग की शुरुआत मार्च, 1995 में हुई थी. नवंबर, 2003 में इस विभाग का नाम बदलकर आयुष विभाग कर दिया गया. मोदी की बुद्धिमत्ता इस बात में है कि उन्होंने इस मौके को किस तरह अपने पक्ष में खड़ा कर लिया. साथ ही योग को उसकी प्राचीन हिंदू जड़ों से आगे ले आए. ओ३म का उच्चारण और सूर्य नमस्कार को योग से अलग करके मोदी यह साबित करना चाहते हैं कि वे अल्पसंख्यकों की आवाज को भी अनसुना नहीं कर रहे हैं. इसके अलावा आर्ट ऑफ लिविंग समेत सभी चोटी के योग स्कूल नई दिल्ली में इस आयोजन में शामिल हुए और योग दिवस पर 35 मिनट के प्रोटोकॉल में हिस्सा लिया. जैसा कि श्री श्री रविशंकर कहते हैं कि यह ''अपने आप में बहुत बड़ी उपलद्ब्रिध है'' जैसे कि ''कोई वृहदाकार दैत्य अचानक जाग उठा हो.''
पश्चिम में योग का सबसे ज्यादा प्रचलित रूप आसन योग है. अमेरिकन इंस्टीटयूट ऑफ वैदिक स्टडीज के निदेशक डेविड फ्रॉले का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मानक स्थापित करके भारत इस दिशा में काफी सहयोग कर सकता है. श्रीपद नाईक कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस तो सिर्फ शुरुआत है. वे कहते हैं, ''हम योग को सुदूर गांवों तक ले जाना चाहते हैं और उसके लिए हमें समुचित ढांचे, सुविधाओं और रिसर्च की जरूरत है.'' वहीं श्री श्री रविशंकर मानते हैं कि सिर्फ राज्याश्रय से ही कोई शास्त्र फल-फूल सकता है.
लेकिन भारत के साथ हमेशा यह समस्या रही है कि महान योजनाओं के नतीजे हमेशा उतने महान नहीं हुए हैं. क्या सरकार राष्ट्र को शीर्षासन करने के लिए बाध्य करेगी या शवासन की मुद्रा में चली जाएगी? हम सांस रोके इंतजार कर रहे हैं.
(साथ में संतोष कुमार और वरुण पी. आनंद)
कावेरी बामजई