75वां स्वतंत्रता दिवस विशेषांक-पथ प्रवर्तक/ कला, संगीत, नृत्य
पंडित कुमार गंधर्व (1924-1992)
पंडित विश्व मोहन भट्ट
कुछ संगीतकार ऐसे होते हैं जो सदी में एक बार जन्म लेते हैं. पंडित कुमार गंधर्व ऐसे ही रहनुमा थे. कुमार जी बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा से संपन्न थे. उन्होंने जाने-माने गुरु बी.आर. देवधर से संगीत की शिक्षा ली और फिर घराना संगीत परंपरा तोड़कर खुद अपनी निजी शैली और मुहावरा विकसित किया.
कम उम्र में तपेदिक से उबरने के बाद वे और ज्यादा ऊर्जा और नए सांगीतिक विचारों के साथ उभरकर आए.
वे एक किस्म के विद्रोही थे जिन्होंने लोकसंगीत और भजनों के साथ प्रयोग किए. उनके नवाचार और रागों की गैर-रूढ़िगत व्याख्या ने आलोचना को न्यौता दिया, पर वह उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में नए रागों की रचना से रोक नहीं पाई.
दूसरे संगीतकारों के विपरीत, वे अपनी संगीत रचनाओं से आपको महज 15 मिनट में मंत्रमुग्ध कर सकते थे.
कुमार जी की आवाज अनूठी और बांधने वाली थी. इसने राग की पारंपरिक प्रस्तुति के तरीके को नई इबारत दी. राग की कल्पना और उन्हें प्रस्तुत करने की उनकी कला अभूतपूर्व थी—संगीत के हर सुर की उनकी व्याख्या प्रेक्षकों के लिए आंख खोल देने वाली होती.
उनके भजन और सुरीली लोक धुनें सुनिए, वे जिंदगी भर आपका पीछा नहीं छोड़ेंगी. असल में, वे खुद अपने कंसर्ट बहुत ध्यान से संजोते और तैयार करते.
कंसर्ट में कुमार जी की थीम आधारित प्रस्तुतियां—गीत वर्षा, ऋतुराज, गीत हेमंत—संगीत रचनाओं की लीक से हटकर होतीं. उन पर मालवा इलाके के लोक संगीत का असर था. उनकी आवाज में गांव-देहात की अनुगूंज और लय और स्वर की नजाकत ही थी जो उन्हें गायकी का मेधावी जादूगर बना देती थी.
कुमार जी आजाद पंछी थे, जिसे पिंजरे में कैद नहीं किया जा सकता था. हरेक जीनियस की तरह वे मुक्त हृदय से गाना चाहते थे. वे घरानों के परे थे.
उन्होंने खुद अपना घराना रचा. उन्होंने खुद अपने संगीत विश्वासों का अनुसरण किया. वे एक ऐसे विद्रोही थे, जिसका एक साफ-सीधा उद्देश्य था.
पंडित विश्व मोहन भट्ट मोहन वीणा के उस्ताद, पद्म भूषण और ग्रैमी अवार्ड विजेता हैं.
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