कुदरत से करीबी का कारोबार

एक्सएलआरआइ, जमशेदपुर से एमबीए करने के बाद उन्होंने यूनिलीवर और फिर कोका-कोला में मार्केटिंग के क्षेत्र में काम किया. ग़ज़ल ने कॉलेज खत्म होने से पहले ही एनआइआइटी में पढ़ाना शुरू कर दिया था.

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जोरदार जोड़ी वरुण अलघ और ग़ज़ल अलघ जोरदार जोड़ी वरुण अलघ और ग़ज़ल अलघ

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 नवंबर 2022,
  • अपडेटेड 5:22 PM IST

36वीं वर्षगांठः दिग्गज कारोबारी

वरुण अलघ , 38 वर्ष, ग़ज़ल अलघ, 34 वर्ष, गुरुग्राम
कंपनीः
मामाअर्थ
कुल संपत्तिः 3,000  करोड़ रु.

पसंद अपनी-अपनी

वरुण को किताबें पढ़ना पसंद है, इस समय वे सत्या नडेला की आत्मकथा पढ़ रहे हैं. ग़ज़ल को पेंटिंग करना अच्छा लगता है

वरुण और ग़ज़ल से मुलाकात गुरुग्राम के गोल्फ लिंक इलाके में द अरालिआज सोसाइटी में उनके घर पर होती है. कुछ मिनट के इंतजार के बाद लाल रंग के बिजनेस सूट में ग़ज़ल लॉबी में आती हैं और देरी के लिए माफी मांगते हुए एक आम गृहिणी की तरह मुस्कुराते हुए कहती हैं, ''पेट्स ऐंड किड्स!’’ वरुण और ग़ज़ल की सफलता की कहानी इसी अंदाज के साथ शुरू होती है.

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बातचीत में जाहिर होता है कि दोनों ही मध्यमवर्गीय परिवारों के ऐसे होनहार बिरवान रहे हैं जिन्हें आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थानों में भेजने के सपने परिवार देखा करते हैं. चंडीगढ़ में पली-बढ़ी ग़ज़ल ने बीसीए की पढ़ाई की और वरुण ने दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई. वरुण बताते हैं, ''लेकिन जल्दी ही मुझे समझ आ गया था कि टरबाइन और कल-पुर्जों में मुझे दिलचस्पी नहीं थी.’’

एक्सएलआरआइ, जमशेदपुर से एमबीए करने के बाद उन्होंने यूनिलीवर और फिर कोका-कोला में मार्केटिंग के क्षेत्र में काम किया. ग़ज़ल ने कॉलेज खत्म होने से पहले ही एनआइआइटी में पढ़ाना शुरू कर दिया था. लेकिन जल्द ही परिवार ने उनका रिश्ता वरुण के साथ तय कर दिया.

मामाअर्थ की शुरुआत के बारे में वरुण बताते हैं, ''सब कुछ अच्छा चल रहा था. मैं बड़े ब्रांड्स के साथ काम कर रहा था. गजल न्यूयॉर्क अकेडमी ऑफ आर्ट से पढ़कर लौटी थीं. हम खूब घूमते थे, पब जाते थे, बंजी जंपिंग जैसी मौजमस्ती वाली चीजें करते थे. मगर अगस्त्य के हमारे जीवन में आने के बाद हम पहले जैसे नहीं रहे. बच्चे के लिए हमें सब कुछ बहुत सोच-समझ कर चुनना था.’’

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कौन-सा लोशन बच्चे की त्वचा के लिए बेहतर होगा या मालिश के लिए कौन-सा तेल इस्तेमाल किया जाए, यह सब गूगल करते हुए उन्हें समझ आया कि भारत में मिलने वाले लगभग सभी प्रोडक्ट बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं थे. उनमें खतरनाक टॉक्सिन्स (जहरीले पदार्थ) मौजूद थे. वे अपने बच्चे के लिए विदेशों से प्रोडक्ट मंगाने लगे.

ग़ज़ल बताती हैं, ''हम विदेशों से ये सब चीजें मंगाकर थक गए थे. हम लगातार सोच रहे थे कि हमें इस बारे में कुछ करना चाहिए. हम हैरान थे कि भारत में इस समस्या के बारे में कोई बात तक नहीं कर रहा था. तब हमने अपनी रिसर्च शुरू की.’’ 

लेकिन मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़कर एक ऐसा काम शुरू करना जिसका न तो बहुत अनुभव था और न ही भविष्य का कोई अंदाजा, आसान नहीं था. परिवार को इसके लिए मनाना ही काफी मुश्किल था. वरुण बताते हैं, ''मैं नहीं चाहता था कि 50 पार करने के बाद मुझे इस बात का पछतावा रहे कि मैं चुनौतियों से डर गया.

2016 में मैंने नौकरी छोड़ दी और हमने अपने प्रोडक्ट पर काम करने का फैसला किया. इसके लिए केमिस्ट्री की क्लास लीं, चीजों को समझा. कई डर्मैटोलॉजिस्ट यानी कि त्वचा रोग विशेषज्ञों का एक पैनल बनाया. हमने अपने आप को एक साल दिया कि अगर फेल होते हैं तो यही सही.’’ 

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लेकिन मुश्किलें और भी थीं. वरुण और ग़ज़ल इंडस्ट्री के सबसे अच्छे लोगों के साथ काम करना चाहते थे मगर वे सब लोग मामाअर्थ को क्यों चुनते? ऐसे में उनका जज्बा काम आया. उन्होंने लोगों को यकीन दिलाया कि मामाअर्थ को बनाना क्यों जरूरी था.

वरुण याद करते हैं, ''परिवार और दोस्तों के बाद सबसे पहले मामाअर्थ में अपना पैसा लगाने वाले इन्वेस्टर कंवलजीत ने हमसे बस यही कहा, 'तुम लोग ठीक लोग हो, कुछ कर ले जाओगे.’ आइडिया तो वक्त के साथ इवॉल्व होगा ही.’’

टॉक्सिन-फ्री प्रोडक्ट बनाने के साथ-साथ उन्हें यह भी देखना था कि मांएं इस बात पर क्यों भरोसा करेंगी कि उनकी बनाई चीजों में सचमुच टॉक्सिन नहीं हैं. इसके लिए उन्होंने सुरक्षित और केमिकल-फ्री प्रोडक्ट को प्रमाणित करने वाले एनजीओ मेडसेफ डॉट ऑर्ग से संपर्क किया. 

प्रोडक्ट तैयार करने के बाद अगली चुनौती उन्हें बाजार तक ले जाने की थी. इसके लिए शुरुआत में उन्होंने दक्षिण दिल्ली में बच्चों के सामान बेचने वाली दुकानों के बाहर स्टॉल लगाए. मांओं से बात की कि क्या वे अपने बच्चों के लिए टॉक्सिन-फ्री प्रोडक्ट खरीदेंगी?

लेकिन कई बार जवाब मिलता कि इसके साथ फ्री क्या मिलेगा. उन मांओं से संपर्क किया गया जो शिशु-पालन से जुड़े ब्लॉग लिख रही थीं. इस तरह शुरुआती बिक्री कंपनी और उसके प्रोडक्ट्सि  को लेकर सुगबुगाहट के बाद शुरू हुई. तब मामाअर्थ की वेबसाइट पर शॉपिंग कार्ट नहीं थी. बस प्रोडक्ट के बारे में जानकारी भर मौजूद थी.

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वरुण एक ऐसा ब्रांड बनाना चाहते थे जो लोगों को उनकी आम समस्याओं का हल देता हो और भरोसेमंद भी हो. वे कहते हैं, ''मुझे हमेशा ऐसे ब्रांड पसंद थे जिनके लिए 'क्या’ से ज्यादा 'क्यों’ महत्वपूर्ण था. मामाअर्थ बनाते वक्त हमने 'क्यों’ पर ध्यान दिया. हमने अपनी और अपने आस-पास के लोगों की जरूरतों को ध्यान से सुना और हमें यह समझ आया कि टॉक्सिन-फ्री और प्राकृतिक तरीकों से बनी चीजों के लिए एक बड़ा मार्केट मौजूद था.’’

मामाअर्थ इस समय छोटे बच्चों के लिए हींग रोल ऑन, बड़ों के लिए प्राकृतिक उबटन से लेकर केमिकल फ्री मॉस्कीटो रिपेलेंट तक, रोजमर्रा में काम आने वाले बहुत से प्रोडक्ट लगातार बाजार में ला रही है. बेबीकेयर ब्रांड अब पर्सनल केयर ब्रांड बन चुका है. उनकी सफलता को इस तरह आंका जा सकता है कि 2020 में लॉकडाउन के बावजूद कंपनी का रेवेन्यू 17 करोड़ से बढ़कर 110 करोड़ रुपए तक पहुंच गया.

घर और बिजनेस, दोनों जगह काम को आपस में बांटने को लेकर वरुण और ग़ज़ल का प्लानिंग पर पूरा जोर है. वरुण बताते हैं, ''हम हर चीज पहले से प्लान करते हैं. बच्चों को खाना खिलाने से लेकर बिजनेस मीटिंग तक. इसके अलावा, हम एक दूसरे से मदद मांगने या शुक्रिया कहने से कभी नहीं हिचकते.’’ वरुण को पढ़ने का खूब शौक  है और वे इन दिनों सत्या नडेला की  आत्मकथा पढ़ रहे हैं. ग़ज़ल पेंटिंग करती हैं लेकिन बच्चों और बिजनेस के बीच अभी समय नहीं निकाल पा रही हैं.

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-प्रदीपिका सारस्वत

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