मजबूत नब्ज

भारत सरीखे उपमहाद्वीप भर में फैले देश में अत्यंत घनी आबादी और संघीय राजनीति के साथ स्वास्थ्य की चुनौतियां बहुतेरी हैं और उपलब्धियां विभिन्न राज्यों में अलग-अलग. तिस पर भी बीते 75 साल में कई क्षेत्रों में कामयाबी हासिल की गई. उनमें शामिल हैं...

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1 मार्च, 2020 को कोविड टीका लगवाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1 मार्च, 2020 को कोविड टीका लगवाते हुए

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 1:36 PM IST

विशेषांक : भारत की शान

स्वास्थ्य की सफलताएं

के. श्रीनाथ रेड्डी, पब्लिक हेल्थ के डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया

मजबूत नब्ज

प्रमुख स्वास्थ्य और जनसांख्यिकी संकेतकों में सुधार: जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 1947 में 32 वर्ष से बढ़कर अब 70.4 वर्ष हो गई है. फिसड्डी राज्य अगर सुधार लाएं तो भारत और बेहतर कर सकता है. मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) 1947 में प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर 2,000 थी. अब यह 97 है, जो 158 के वैश्विक औसत से बेहतर है. 2005 से भारत ने एमएमआर में 77 फीसद की गिरावट हासिल की, जो विश्व स्तर पर 43 फीसद से ज्यादा तेज गिरावट है. शिशु मृत्यु दर (आइएमआर) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 28 है, जो 1947 में 145 थी. बेलगाम जनसंख्या वृद्धि की आशंकाओं को धता बताते हुए सामान्य प्रजनन दर (जीएफआर) बीते दशक के दौरान 20 फीसद तक कम हो गई और कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 2.0 पर पहुंच गई. जन्म के समय पुरुष और महिला लैंगिक अनुपात में सुधार की उम्मीद तब दिखाई दी जब अनुपात प्रति 100 लड़कियों पर 111 लड़कों से घटकर 108 लड़के हो गया (2010-11).

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बीमारियों का उन्मूलन: सालों चेचक के सबसे ज्यादा मामले झेलने के बाद भारत ने 1979 में खुद को इस भयावह बीमारी से मुक्त घोषित किया. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2014 में भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया. कई राज्यों को तंग करने वाले गिनी कृमि रोग को 2000 में जड़ से उखाड़ फेंका गया. भारत पहला देश था जिसे आधिकारिक रूप से यॉज-मुक्त माना गया. भारत ने अपना मातृ और नवजात टिटेनस उन्मूलन (एमएनटीई) लक्ष्य, वैश्विक लक्ष्य की तारीख से पहले, अप्रैल 2015 में हासिल कर लिया था.
 
रोग नियंत्रण: 1947 में भारत की 33 करोड़ आबादी में मलेरिया के करीब 7.5 करोड़ मामले थे. बीते दो दशकों में ये 2000 में 2 करोड़ मामलों से घटकर 2019 में 56 लाख मामलों पर आ गए, जिससे 2030 तक मलेरिया उन्मूलन के लक्ष्य को बल मिला. इस गिरावट की अगुआई करते हुए ओडिशा ने 2016-21 के बीच मलेरिया के मामलों में 94 फीसद की कमी दर्ज की. भारत ने एचआइवी-एड्स महामारी को जिस तरह संभाला, वह गैरमामूली कामयाबी की कहानी है. राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसीओ) ने करीब 1,800 सिविल सोसायटी संगठनों को अपने साथ जोड़ा. 2000 में आबादी के 0.55 फीसद के शिखर से इसका प्रसार घटकर 0.2 फीसद पर आ गया है. 2010 के बाद नए मामलों में 46 फीसद की गिरावट आई. प्रसार के मौजूद स्तर से जीवित रहने के मामलों में सुधार की झलक मिलती है, जो एंटी-रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट (एआरटी) की बदौलत आई. 2021 तक की स्थिति के अनुसार, 500 के आसपास एआरटी केंद्र हैं, जो 15 लाख लोगों को मुफ्त इलाज मुहैया कर रहे हैं. कई संक्रामक रोगों के फैलाव पर नियंत्रण पाने में सरकार के स्वच्छ भारत मिशन ने भी भूमिका निभाई.

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सार्वभौम टीकाकरण: 1978 में प्रतिरक्षण या टीकाकरण के विस्तारित कार्यक्रम (ईपीआइ) के रूप में शुरू होकर 1985 में यह सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआइपी) बना. यह हर साल करीब 26.7 करोड़ नवजात शिशुओं और 29 करोड़ गर्भवती माताओं को लक्ष्य बनाता है और 12 टीके मुफ्त प्रदान करता है, प्रमाण सामने आने पर और टीके जोड़े जाते हैं. कार्यक्रम ने 5 साल के कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 32 तक सीमित करने में मदद की. मिशन इंद्रधनुष जैसे विशेष टीकाकरण अभियान उन इलाकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जहां टीकाकरण का कवरेज अच्छा नहीं है. कोविड-19 के टीके लगाने के लिए भारत के देशव्यापी सामूहिक टीकाकरण कार्यक्रम ने, जो दुनिया का सबसे बडा ऐसा कार्यक्रम था, यूआइपी की दक्षता का फायदा उठाया.

तंबाकू नियंत्रण: आजादी के बाद दशकों तक भारत ने व्यावसायिक फसल के रूप में तंबाकू की खेती में निवेश किया और खासा राजस्व कमाया. तंबाकू से जुड़ी बीमारियों की लागत उन आर्थिक प्रतिफलों से ज्यादा बढ़ गई और रोकी जा सकने वाली मौतों और बीमारियों की तादाद में लगातार इजाफा हुआ. भारत में जितने विभिन्न रूपों में इसका सेवन किया जाता है, वे नियंत्रण की रणनीतियों के लिए चुनौती बन गए. तंबाकू के सक्रिय और निष्क्रिय सेवन से होने वाले नुक्सानों को माना-स्वीकार किया गया और उसके साथ संगठित सिविल सोसायटी अभियानों से उत्प्रेरित होकर 2003 में बहुत-से घटकों वाला तंबाकू नियंत्रण कानून पारित किया गया. 2003 में भारत ने डब्ल्यूएचओ में वैश्विक फ्रेमवर्क कंन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल को आकार देने में भी अग्रणी भूमिका निभाई जिसे खासी सराहना मिली. भारत में इलेक्ट्रॉनिक निकोटिन उत्पादों (मसलन वैपिंग) और गुटके पर भी रोक लगा दी गई है. नियंत्रण कार्यक्रम की कामयाबी की झलक 13-15 आयु समूह में किसी भी प्रकार के तंबाकू की खपत में 42 फीसद की (2009-19) और 15+ आयु समूह में 2009-10 में 34.6 फीसद से 2016-17 में 28.6 फीसद की कमी से मिलती है.

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राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन (एनआरएचएम) 2005 में शुरू हुआ और बाद में शहरी घटक जुड़ने पर यह एनएचएम बन गया. इसने पहले वंचित रह गए कई इलाकों में मातृ और बाल स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए प्लेटफॉर्म प्रदान किया और कई अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रमों को समुदाय से जुड़े इस प्लेटफॉर्म से जोड़ा. एक बड़ा नवाचार मान्यता-प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (एएसएचए या आशा) के रूप में स्थानीय स्तर पर भर्ती महिलाओं को प्रशिक्षण देना और तैनात करना था. आशा कार्यकर्ताओं के रूप में मशहूर इनमें से दस लाख महिलाएं प्राथमिक देखभाल केंद्रों पर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के अग्रिम मोर्चे पर हैं. एनएचएम 2005 से मातृ और शिशु मृत्यु दर में आई गिरावट का प्रमुख चालक रहा है.

आशा कार्यकर्ताओं को वर्ल्ड हेल्थ एसेंबली में ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड 2022 के साथ मान्यता दी गई. आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं को सांस्थानिक या अस्पताल में प्रसव के लिए तैयार करती हैं, टीकाकरण कार्यक्रमों को सहारा देती हैं, आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां, गर्भनिरोध की गोलियां और तपेदिक की दवाइयां देती हैं. अब उन्हें गैर-संक्रामक रोगों और मानसिक स्वास्थ्य विकारों की पहचान और नियंत्रण से भी जोड़ा जा रहा है. एनएचएम के दायरे में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की कई योजनाएं लॉन्च की गईं. इनमें जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाइ), जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएएसएमए) शामिल हैं.

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आयुष्मान भारत: 2018 में लॉन्च की गई यह योजना हर रोग की खास और अलग पद्धतियों में बंटे और आयु समूहों में विभाजित स्वास्थ्य कार्यक्रमों को एक साथ जोड़ने में बड़ी छलांग साबित हुई. 'व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल' (सीपीएचसी) का नजरिया अपनाते हुए स्वास्थ्य और आरोग्य केंद्रों (एचडब्ल्यूसी) में सामान्य स्वास्थ्य स्थितियों की विस्तृत शृंखला समाहित की गई है. प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाइ) वित्तीय झटकों से टूट जाने वाली 40 फीसद आबादी को अस्पताल में भर्ती होने पर वित्तीय सुरक्षा देती है. 2021 में लॉन्च हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर मिशन और डिजिटल हेल्थ मिशन आयुष्मान भारत प्लेटफॉर्म को मजबूत करते हैं. इन कार्यक्रमों को और ज्यादा अच्छी तरह जोड़ देने और उनके राज्य सरकार की योजनाओं की कमियों को पूरा करने से सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) का सफर आगे बढ़ेगा.

दवाइयों की सुलभता: 1970 के दशक की शुरुआत में उत्पाद पेटेंट करवाने से हटकर प्रक्रिया पेटेंट करवाने के बदलाव की बदौलत नई ऊर्जा से ओतप्रोत घरेलू दवा उद्योग बड़े पैमाने पर जेनेरिक दवाओं का उत्पादन कर सका. भारत 'विश्व की फार्मेसी' बन गया. दक्षिण अफ्रीका को भारत से एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं के निर्यात ने सस्ती दवाओं के वैश्विक आंदोलन को उत्प्रेरित किया. फिलहाल 350 से ज्यादा भारतीय दवा मैन्यूफैक्चरिंग इकाइयों को यूरोपीय संघ का और कई को अमेरिकी नियामकों का अनुमोदन हासिल है. वैश्विक बाल टीकाकरण कार्यक्रमों के लिए भारत टीकों का मुख्य आपूर्तिकर्ता है. भारत के फार्मा सेक्टर का पराक्रम कोविड-19 महामारी के दौरान भी दिखा, जब घरेलू इस्तेमाल और 101 देशों तथा संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं को निर्यात के लिए बड़ी तादाद में कई टीके मैन्यूफैक्चर किए गए.

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डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाना: देर से शुरू करने के बावजूद भारत ने डिजिटल टेक्नोलॉजी अपनाने और लागू करने का काम तेजी से किया. कानूनी अड़चनें हटने के बाद टेली-स्वास्थ्य सेवाओं के इस्तेमाल में तेजी आई. विशाल देशव्यापी कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम को सहारा देने में कोविन ऐप उल्लेखनीय ढंग से कामयाब रहा है. पॉइंट-ऑफ-केयर डायग्नोस्टिक प्रणालियां प्राथमिक देखभाल का कायापलट कर रही हैं. टेक्नोलॉजी-समर्थ गैर-चिकित्सकीय प्राथमिक देखभाल प्रदाता, उच्च रक्तचाप और मधुमेह की पहचान और निगरानी में मदद कर रहे हैं और लगातार देखभाल की सुविधा दे रहे हैं. सप्लाई चेन प्रबंधन ज्यादा कार्यकुशल हो गया है. वास्तविक समय में रोगों की निगरानी की जा रही है. आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता (एबीएचए) संख्या लोगों को विशिष्ट आइडी देती है, जबकि यूनिफाइड हेल्थ इंटरफेस (यूएचआइ) स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं को एक साथ लाकर एक डिजिटल हाइवे का निर्माण करेगा, जो देश भर की स्वास्थ्य सेवाओं को एक साथ जोड़ेगा और मेडिकल रिकॉर्ड को पोर्टेबिलिटी प्रदान करेगा.

विविध स्वास्थ्य प्रणालियां: कुछ तो गहरे विश्वास के कारण और कुछ सुविधा की वजह से भारत ने स्वास्थ्य देखभाल के लिए चिकित्सीय बहुलतावाद अपनाने का फैसला किया. उच्च गुणवत्ता के डॉक्टर, नर्सें और संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवर आधुनिक व्यवस्थाओं का परिणाम हैं, तो चिकित्सा की पारंपरिक प्रणालियां भी कई भारतीयों की स्वास्थ्य सेवा में योगदान दे रही हैं. डॉक्टरों और नर्सों की कमी, जो उनके दूसरे देशों में चले जाने के कारण और बढ़ गई, उसे कुछ हद तक अन्य चिकित्सा पद्धतियों के पेशेवरों ने पूरा किया. समय के साथ योग की स्वास्थ्य संवर्धक शक्ति और आयुर्वेद के सर्वांगीण नजरिये को अन्य देशों की ज्यादा से ज्यादा सराहना मिल रही है. एकीकृत चिकित्सा का मॉडल विकसित करने के लिए भारत के पास कई स्वास्थ्य सेवाओं और आरोग्य पद्धतियों की अपनी ताकत का इस्तेमाल करने का शानदार मौका है, जिससे सारी दुनिया को फायदा होगा.

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स्वच्छ भारत मिशन ने लोगों को खुले में शौच से रोकने और सफाई से रहने की आदत विकसित की जिससे बीमारियों पर नियंत्रण में मदद मिली 

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