सुकून और खुशी की बुनियाद

ईबिक्स के सीईओ रॉबिन रैना के लिए लोकोपकार प्रार्थना और जीवन मिशन दोनों है.

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इनसानी जान की कद्र : दिल्ली में आरआरएफ के स्टुडेंट्स के बीच रॉबिन रैना इनसानी जान की कद्र : दिल्ली में आरआरएफ के स्टुडेंट्स के बीच रॉबिन रैना

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 21 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 2:14 PM IST

खुशी का सूत्र
''आपके पास जो कुछ भी है वह सब आप पलभर में गंवा सकते हैं. आपने जो दिया है वही आपके पास हमेशा रहेगा’’
रॉबिन रैना,
संस्थापक-सीईओ, ईबिक्स.

रॉबिन रैना फाउंडेशन
स्थापना: 2003
चैरिटी ऑर्गेनाइजेशन

दो हजार तीन में रॉबिन रैना नोएडा में अपने दफ्तर की सबसे ऊपरी मंजिल पर खड़े थे कि अचानक उनकी आंखों में आंसू आ गए. 2.5 अरब डॉलर की सॉफ्टवेयर और ई-कॉमर्स सॉल्यूशंस फर्म ईबिक्स, जिसके वे संस्थापक और सीईओ हैं, की भव्य बिल्डिंग के चारों तरफ उन्हें झुग्गियां नजर आ रही थीं. हालांकि, उनके आंसू इसलिए नहीं निकले क्योंकि वहां चारों तरफ झुग्गियां खड़ी थीं, बल्कि इसलिए कि उनकी नजर पहली बार उन पर पड़ी थी. रैना कहते हैं, ''मुझे लगा कि मैं भौतिक चीजों के पीछे भागता इतना खो गया हूं कि उनकी ओर देख ही नहीं पाता जिन्हें जिंदगी जीने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ता है.’’

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उस घटना ने फिटनेस के प्रति इस उत्साही भारतीय-अमेरिकी बिजनेस दिग्गज का पूरा ध्यान परोपकार की ओर मोड़ दिया. तमिलनाडु में सूनामी से प्रभावित दो गांवों को गोद लेने से लेकर, दिल्ली में लड़कियों के लिए कौशल प्रशिक्षण केंद्र, मुंबई में अनाथ लड़कियों के लिए घर या फिर एनसीआर में एंबुलेंस प्रायोजित करना हो, परोपकारी कार्यों में उनके योगदान की सूची अब बहुत लंबी और विविधतापूर्ण है. 

रैना और उनका धर्मार्थ संगठन—रॉबिन रैना फाउंडेशन (आरआरएफ)—शिक्षा को लोगों की कई पीढ़ियों की गरीबी को तोड़ने का सबसे कारगर जरिया मानता है. उन्होंने कई शैक्षिक पहल के माध्यम से अब तक 3,500 से अधिक बच्चों को गोद लिया है. उनका पहला प्रोजेक्ट तब शुरू हुआ जब दिल्ली सरकार ने कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान 1,50,000 लोगों को बवाना में स्थानांतरित किया.

रैना कहते हैं, ''शहर को साफ करने के लिए लोगों को जहां पहुंचाया गया था, 2005 में जब मैंने उस क्षेत्र का दौरा किया तो लोगों को झोंपड़ियों में रहते हुए देखा जिसके चारों ओर खतरनाक चीजें थीं.’’ रैना उस क्षेत्र में एक स्कूल स्थापित करना चाहते थे  लेकिन उन्हें पता चला कि हर पांच से छह महीने में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं क्योंकि काम और घर की तलाश में उनके माता-पिता को अक्सर शहर में अपना ठौर बदलना पड़ता है.

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रैना कहते हैं, ''फिर मेरे मन में एक विचार आया—अगर मैं उनके लिए कोई पक्का घर बना दूं जहां ये कानूनी रूप से रह सकें तो कैसा रहेगा? उन्हें इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा और उनके बच्चे एक स्थायी और स्थिर शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे.’’ उन्होंने 6,000 घर बनाने का वादा किया था, जिनमें से 2,304 घर अब तक लोगों को सौंपे जा चुके हैं.

प्रत्येक घर में एक कंक्रीट की छत, चार फुट की ठोस ईंट की नींव, एक रसोई, एक एग्जॉस्टफैन, मीटर कनेक्शन के साथ बिजली और गैस की सुविधा है. प्रत्येक घर को बनाने पर उनके एक लाख रुपए खर्च होते हैं, लेकिन वे उन्हें लोगों को मुफ्त देते हैं. इन नए घर के मालिक के साथ एक कानूनी समझौते के माध्यम से रैना अपनी दो शर्तें रखते हैं—पहली शर्त कि घर को सात साल तक बेचा नहीं जा सकता और दूसरी, बच्चों, विशेष रूप से लड़कियों को स्कूल जरूर भेजना होगा.

आरआरएफ ने इलाके के बुजुर्गों की चिकित्सा देखभाल में भी निवेश किया. बवाना में प्लॉट नंबर 205 की मालकिन नजमुन निसा कहती हैं, ''मैं 85 साल की हूं और कई बीमारियों से ग्रस्त हूं. आरआरएफ ने न केवल मेरे लिए स्थायी घर बनाया है बल्कि यह मुझे भोजन और दवाओं के खर्चे के लिए 1,000 रुपए प्रति माह नकद भी देता है.’’ 

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आरआरएफ के स्कूलों और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों में दाखिल पाने वाले बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है. भावना के आरआरएफ स्कूल के कक्षा 6 के एक छात्र शाम (बदला हुआ नाम) का कहना है, ''मैं सड़कों पर आवारागर्दी करता था लेकिन आरआरएफ के स्कूल में दाखिले के बाद मेरी पढ़ाई शुरू हो गई है और मुझे लगता है कि अपना अच्छा भविष्य बनाने का मौका मिल गया है.’’ 

रैना वैसे तो एक कश्मीरी पंडित हैं लेकिन उनके परोपकारी कार्य किसी भूगोल या राजनीति के दायरे में सीमित नहीं हैं. लाहौर में इमरान खान के शौकत खानम कैंसर अस्पताल के वार्ड नंबर 224 का नाम रैना के नाम पर रखा गया है; वे उस अस्पताल में इलाज के लिए दाखिल होने वाले तीन बच्चों के इलाज का सारा खर्चा उठाते हैं.

टेक्नोलॉजी की मदद से भविष्य में दान के मामले में चमत्कार हो सकता है, खासकर जब बात पारदर्शिता की हो. रैना कहते हैं, ''कई बार मुझे लगा कि लोग दान इसलिए भी नहीं करते क्योंकि उन्हें पता ही नहीं होता कि उनके किए दान का आखिर क्या हुआ.’’ उन्होंने हाल ही में एनजीओ सेवा भारती के साथ मिलकर योगदान प्रोजेक्ट शुरू किया है. इसमें बारकोड की मदद से प्रत्येक दान पर नजर रखी जाती है और दाता को तत्काल मैसेज भेजकर यह सूचित किया जाता है कि उनके दिए दान का क्या उपयोग हो रहा है.

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ऐसी कई पहल हैं जिनका श्रेय रैना को जाता है और ये उन्हें एक इनसान के रूप में जमीन से कहीं अधिक जुड़ा हुआ महसूस करने में मदद करती हैं. दूसरों को प्रेरित करने के लिए वे अक्सर अपने 16.50 लाख सोशल मीडिया प्रशंसकों के साथ दूसरों को कुछ देने के फायदों के बारे में पोस्ट करते हैं.

रैना कहते हैं, ''आपके पास जो कुछ भी है वह सब आप पलभर में भी गंवा सकते हैं. जब हम जिंदा होते हैं तो हमें लगता है कि हम बहुत शक्तिशाली हैं, लेकिन कभी भी सब कुछ बदल सकता है. कफन में जेब नहीं होती और इसलिए आपको यह महसूस करने की जरूरत है कि आप अपने साथ केवल एक चीज लेकर जा सकते हैं, वह है अपने कर्म.’’ दान उनकी प्रार्थना और खुशी का स्रोत है.

सोनाली आचार्जी

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