ऐसे वक्त में जब देश का माहौल ढुलमुल और राजनैतिक तौर पर सरगर्म है और हवाओं में दुर्भावना और नफरत का बोलबाला है, इंडिया टुडे ग्रुप के कॉन्क्लेव ईस्ट के पांचवें संस्करण ने देश के कुछ सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दों पर विचार और बहस करते हुए संवाद की शुरुआत की. लगातार दो दिन इस आयोजन में हुए बौद्धिक मंथन से बातें साफ हुईं, गलतफहमियां दूर हुईं, लोग करीब आए और, जैसा कि होना ही था, नए विवाद छिड़े.
विपक्ष का प्रमुख परकोटा होने के नाते पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने न केवल दिखलाया कि भविष्य का और वैकल्पिक नेता कैसा होना चाहिए बल्कि उन्होंने चेतावनी भी दी कि बंगाल में महाराष्ट्र जैसा प्रयोग भाजपा की सबसे बड़ी भूल साबित होगा. 2021 के विधानसभा चुनावों में हार की फांस शायद अब भी चुभ रही है, पर अमित शाह अपने रास्ते पर अडिग हैं.
दूसरी ओर, अपने एकल सत्र—''नेशनल अफेयर्स: द विजन फॉर ऐन ऑल्टरनेटिव लीडरशिप’’—में ममता ने शाह की चुनौती स्वीकार की और उन्हें याद दिलाया कि बंगाल की किलेबंदी कितनी मजबूत है—''पहले तैरना सीख लें, फिर बंगाल की खाड़ी पार करने की जुर्रत करें. फिर रॉयल बंगाल टाइगर भी है. मेरे लोग ही मेरे रॉयल बंगाल टाइगर हैं.’’
तृणमूल सांसद सौगत रे और सामाजिक कल्याण मंत्री शशि पांजा ने अपने-अपने सत्रों में बंगाल को ध्रुवीकरण की बाढ़ को रोकने की मिसाल बताया. 'कल्चरल कनंड्रम’ सत्र में रे ने कहा कि रबींद्रनाथ टैगोर, राजा राममोहन रॉय और स्वामी विवेकानंद के बंगाली सांस्कृतिक लोकाचार में हिंदुत्व कभी जड़ नहीं पकड़ सकता.
केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने उन्हें याद दिलाया कि हिंदुत्व के विचार ने पहली बार बंगाल में ही ठोस रूप ग्रहण किया और 'भारत माता’ की पहली अवधारणा कलाकार अबनींद्रनाथ टैगोर की एक पेंटिंग से उभरी. रे ने कहा कि सावरकर की हिंदू राष्ट्र की अवधारणा बहिष्कार पर आधारित है, तो गुप्ता का तर्क था, ''राष्ट्र की सभ्यतागत अवधारणा पूर्णत: समावेशी रही है.’’
एक अन्य सत्र ''ड्राइविंग फोर्स: परफॉर्मेंस वर्सस पोलराइजेशन’’ में तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने कहा, ''स्वीकार करें या न करें, ध्रुवीकरण भारतीय राजनीति की कड़वी सच्चाई है.’’ उन्हें 'सोशल इंजीनियरिंग’ (जाति समीकरण का पर्याय बन गई शब्दावली) के चुनावी राजनीति का स्वीकृत हिस्सा होने में कोई बुराई नजर नहीं आती, पर देव ने आगाह किया कि ध्रुवीकरण पहचान-आधारित चुनावी राजनीति को खतरनाक मोड़ दे देता है.
टीआइपीआरए (द इंडीजिनस प्रोग्रेसिव रीजनल एलायंस) के चेयरमैन प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा इससे पूरी तरह सहमत दिखे. उन्होंने कहा, ''अगर कामकाज का महत्व होता तो अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा 'शाइनिंग इंडिया’ के बूते जीत जाती. मगर भाजपा को जबरदस्त जीत तब मिली जब उसने 'घर के अंदर घुसकर मारा’ अभियान चलाया.’’
भाजपा के विधायक आर.के. इमो सिंह ने यह दलील देने की कोशिश की कि उत्तर-पूर्व में मौजूदा एनडीए सरकार के विकास और लगातार अच्छे काम की बदौलत भाजपा ने 'आठ बहनों’ का समर्थन हासिल किया है, तो प्रद्योत ने कहा कि एनडीए का विकास राजनीति से लैस आता है. उन्होंने कहा, ''उन राज्यों को इनर लाइन परमिट की इजाजत क्यों दी जा रही है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश के साथ साझा है? क्या यह अपना वोटबैंक साधने के लिए मनमर्जी से फैसला करना नहीं है?’’
मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने 'रीजनल रीएलाइनमेंट’ सत्र में बोलते हुए संतुलन साधने की कला का राज बताया, जिसमें उन्होंने महारत हासिल कर ली है. उन्होंने कहा, ''चूंकि यह छिपाने की जरूरत नहीं है कि हम भाजपा के साथ टीम के रूप में काम कर रहे हैं, साथ ही हमारे लिए अपने मूल्यों से समझौता करने की भी कोई मजबूरी नहीं है.’’ वे मानते हैं कि हर बार पूरी सहमति की जरूरत नहीं है और उनकी पार्टी मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में अपने दम पर है.
मगर एक अन्य सत्र ''द आर्ट ऑफ बिल्डिंग अ कंसेंसस इन द एज ऑफ अ डिसरप्शन’’ में कुछ लोगों ने कहा कि उथल-पुथल के दौर में सर्वानुमति बनाने की कला तब तक नामुमकिन है, जब तक सत्ताधारी दूसरों के अधिकारों, विचारों और भावनाओं की पूर्णत: अनदेखी करते हैं.
टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे ने यूपीए के पहले और दूसरे कार्यकाल से तुलना करते हुए कहा कि यूपीए के जमाने में 71 फीसद विधेयक प्रवर समितियों और स्थाई समितियों को भेजे गए थे, जबकि 17वीं लोकसभा के बमुश्किल 11 फीसद विधेयक स्थाई समिति को भेजे गए. उन्होंने कहा, ''2021 में 11 विधेयकों पर 10 मिनट चर्चा हुई और बजट सत्र में रखे गए सात में से पांच विधेयक बिना चर्चा के पारित हुए.’’
दूसरी तरफ ओडिशा से भाजपा की लोकसभा सांसद अपराजिता सारंगी ने कहा कि 16वीं और 17वीं लोकसभाओं की उत्पादकता दर लगातार बढ़ी और हर साल नया शिखर छूते हुए 2014 में 86 फीसद से मौजूदा 17वीं लोकसभा में 106 फीसद तक पहुंची. वे मानती हैं कि देश 'अमृतकाल’ से गुजर रहा है, ''जो आगे का सोचने का वक्त है और अपने वक्त से आगे का सोचने पर प्रतिरोध तो झेलना ही होगा.’’
उन्होंने जोर देकर कहा कि निजी डेटा सुरक्षा सरीखा अहम विधेयक संयुक्त संसदीय समिति और स्थाई समिति को भेजा गया और तमाम हितधारकों के साथ 78 बैठकों के बाद सार्वजनिक हुआ. मगर तमाम दावों के बावजूद महज पांच साल में 76 विधेयक अध्यादेश के रास्ते लाए गए, जबकि यूपीए की हुकूमत के 10 साल में ऐसे विधेयक 61 थे. असम के कांग्रेस सांसद अब्दुल खलीक ने कहा कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने और सीएए सरीखे जल्दबाजी में पारित विधेयकों से कोई मकसद हासिल नहीं हुआ.
उन्होंने तंज कसते हुए कहा, ''कश्मीर में देखिए क्या हुआ. वहां पहले से बदतर स्थिति है और सीएए कानून से भी कोई भला नहीं हुआ.’’ मगर सारे वक्ता सहमत थे कि संसद में जितनी ज्यादा बैठकें और बहसें होंगी, उतना ही हम सड़कों पर कम खूनखराबा होता देखेंगे. यहां तक कि सारंगी भी इस नतीजे पर पहुंचीं कि ''सरकार बहुमत से लेकिन देश सर्वानुमति से चलता है और देश को आगे ले जाना सबकी जिम्मेदारी है.’’
अगर किसी ने सोचा हो कि नूपुर शर्मा विवाद खत्म हो चुका है, तो सभागार में नई असहमतियों का तूफान उठने का इंतजार कर रहा था. वह तब उठा जब ''द फाइन लाइन बिटवीन जुडिशियल ओवररीच ऐंड एग्जीक्यूटिव इनऐक्शन’’ और ''रिवेंज पॉलिटिक्स: फ्रॉम बैटल ऑफ बैलट टू बैटल ऑफ बुलेट’’ सरीखे सत्र हुए. कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अशोक गांगुली सरीखे वक्ता सहमत थे कि डर और हिचकिचाहट का माहौल न्यायपालिका में भीतर तक पैठ बना चुका है.
सिंघवी ने कहा, ''इस हिचकिचाहट के पीछे पदोन्नतियां, नियुन्न्तियां और तबादले रोकने के डर की भूमिका है.’’ मगर अब वन्न्त आ गया है, जब जज अपनी शपथ पर खरे उतरें और संविधान की रक्षा करें. सिंघवी ने यह भी कहा, ''कॉलेजियम के अलावा, जजों को अंतत: अपनी अंतरात्मा को भी जवाब देना, उसे शांत करना और उसके प्रति जवाबदेह होना है.’’ अल्पसंख्यक मामलों के पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि भाजपा से किसी ने भी नूपुर शर्मा की टिप्पणी को सही नहीं ठहराया.
उन्होंने कहा कि मोदी की लानत-मलामत पूरे जोर-शोर से चल रही है, जो भारत की लानत-मलामत की हद तक चली गई है. उन्होंने कहा, ''भाजपा ने विकास के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया. भारत में तीन लाख मस्जिदें और तीन लाख दरगाहें हैं—इतनी तो पाकिस्तान में भी नहीं हैं.’’
बोलने की आजादी की पैरोकार लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा उस वक्त विवाद से घिर गईं जब एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म के मां काली को सिगरेट पीते दिखाने वाले पोस्टर के बारे में उनकी राय पूछी गई. महुआ ने कहा कि मां काली उनके लिए मांसाहारी और शराब स्वीकार करने वाली देवी हैं, क्योंकि उनकी पूजा में मांस और शराब चढ़ाने का रिवाज है. उनकी इस बात से हंगामा मच गया. भगवा ब्रिगेड उन्हें ट्रोल करने लगी, जिसके चलते उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने खुद को उनसे अलग कर लिया.
कॉन्क्लेव की एक और प्रमुख बात यह थी कि इस मौके पर पूर्वात्तर के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म इंडिया टुडे एनई लॉन्च किया गया. इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस-चेयरपर्सन कली पुरी ने कहा, ''आज मुझे पता चला कि यह इलाका पांच अन्य देशों से घिरा है. रणनीतिक तौर पर यह अहम इलाका है. ये आठ राज्य ज्यादा ध्यान दिए जाने के हकदार हैं.
इसको ध्यान में रखकर हम ताजातरीन न्यूज वेंचर इंडिया टुडे नॉर्थ-ईस्ट लॉन्च कर रहे हैं. इस इलाके पर नजर डालते हुए हम इस क्षेत्र को बेहतर ढंग से पेश करेंगे और बड़ी हद तक उन गलतफहमियों को दुरुस्त करेंगे जो इस इलाके और इसके खूबसूरत के लोगों के बारे में व्याप्त हैं.’’
गरमागर्म बहसों के बीच शांत होकर अपने भीतर झांकने और ताजा हवा में ताजगी से भर देने वाली सांसों के लम्हे भी थे. सौम्योजित दास की राग भैरवी की प्रस्तुति शुद्ध जादू थी, जिसमें गायत्री मंत्र—भूर्भव स्व:—के सुर अजान के अल्लाह हो अकबर के साथ आसानी से घुलमिल गए. यह सुनना प्रेरक और आश्वस्तकारी था कि रागों के प्रति साझा प्रेम कॉलेज के पुराने साथियों गायक सौम्योजित और पियानो वादक सौरेंद्र को संगीत की भावपूर्ण यात्रा में एक साथ जोड़ता है.
कॉन्क्लेव का एक और उजला हिस्सा वह था जिसमें आरपी-संजीव गोयनका ग्रुप के चेयरपर्सन संजीव गोयनका ने व्हार्टन से ग्रेजुएट अपने बेटे शाश्वत के काबिल हाथों में भविष्य के सुरक्षित होने की बात कही. शाश्वत न केवल मेहनती हैं, बल्कि साधारण जीवनयापन में विश्वास करते हैं.
कोनराड संगमा की पत्नी डॉ. मेहताब चंडी ने समां बांध दिया, जब उन्होंने कहा कि मेघालय में राजनेता को उसके राजनैतिक रंग या संगत से नहीं बल्कि उसके परिवार और पालतू जानवरों से आंका जाता है. एक सत्र ''बीइंग द बेटर हाफ’’ उन मोहतरमाओं के बारे में था जो अपने मशहूर शौहरों से जरा भी दोयम या कमतर नहीं हैं. यह सुनना स्फूर्तिदायक था कि राजकुमार राव कई बार बहुत प्यार करने वाले घरेलू शौहर भी होते हैं—उन्हें बर्तन मांजना अच्छा लगता है और अक्सर झाड़ू और पोछा भी उठा लेते हैं.
आखिर में, पर उतना ही अहम यह कि बिहू का मतलब होता है प्यार और ''ओपनिंग नोट्स: बिहू बीट्स: म्यूजिक मेलोडी और मिर्जा गर्ल्स’’ शीर्षक सत्र में असम के पूर्णत: लड़कियों के पहले बैंड हरिकेन गल्स ने ढोल और गिटार की जोशीली थापों और 'होइ’ (लड़कियों के गैंग से लड़कों के गुट के टकराने पर भोली-भाली सीटियों की आवाजें) के समवेत नाद से चौतरफा खूब सारा प्यार बरसाया.
''यह कहना कि भेदभाव करने की वजह से कट्टरता को बढ़ावा मिलता है, सही नहीं है. भाजपा ने विकास के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया’’
मुख्तार अब्स नकवी,पूर्व केंद्रीय मंत्री
''हम सुनिश्चित कर रहे हैं कि शासन-प्रशासन में बेहतरी आए. हमें केंद्र से समर्थन भी मिल रहा है. आपको हर चीज में संतुलन बनाना होता है’’
कोनराड संगमा, मुख्यमंत्री, मेघालय
''विधेयक (मुख्यमंत्री को विश्वविद्यालयों का चांसलर घोषित करने वाला) उन्हें (ममता बनर्जी को) इसलिए वापस भेजा गया, न्न्योंकि उसमें आधी-अधूरी जानकारी थी’’
जगदीप धनखड़, राज्यपाल, पश्चिम बंगाल
''न्यायपालिका कोई पवित्र चीज नहीं है. हमें, बतौर जनता, सवाल उठाने का अधिकार है. आइपीसी (भारतीय दंड संहिता) का उल्लंघन नूपुर शर्मा ने किया था, मोहम्मद जुबैर ने नहीं.’’
महुआ मोइत्रा, सांसद, तृणमूल कांग्रेस
''भाजपा अकेली ऐसी पार्टी है जो देश को पहले रखती है, फिर पार्टी का स्थान है और आखिर में हम आते हैं. हमें सफलता रातोरात नहीं मिली’’
बैजयंत पांडा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा
'' हम अपने नए डिजिटल वेंचर इंडिया टुडे एनई के जरिए इस क्षेत्र को बेहतर तरीके से दिखाएंगे और इस क्षेत्र को लेकर जो गलतफहमियां हैं, उन्हें दूर करने का काम करेंगे ‘’
कली पुरी, वाइस चेयरपर्सन, इंडिया टुडे समूह
''बीते दस साल में हमारा परिसंपत्ति आधार 7,000 करोड़ रुपए से बढ़कर 52,000 करोड़ रु पए हो गया है. इसे सुस्त निवेश नहीं कहा जा सकता’’
संजीव गोयनका, चेयरपर्सन, आरपीएसजी समूह
''अगर आपको लगता है कि आपके साथ गलत किया जा रहा है और कोई बंगाली कैबिनेट में शामिल नहीं हो सकता, तो यह अपमानजनक है’’
बाबुल सुप्रियो, विधायक, तृणमूल कांग्रेस
''नौटंकी से आपको वोट मिलते हैं, वह सिंहासन दिलाती है. गुस्सा एक राजनीतिक भाव है, जिससे आपको ताकतवर बनने में मदद मिलती है. राजनीति मूल रूप से नाट्यशास्त्र है’’
देवदत्त पटनायक, लेखक
''दूसरे क्षेत्रों की तुलना में भारत के उत्तर-पूर्वी इलाकों में बुनियादी ढांचे की भारी कमी है. इस स्थिति में बदलाव लाने की जरूरत है’’
अशोक कुमार लाहिड़ी, अर्थशास्त्री, भाजपा विधायक
''पड़ोसी राज्यों को स्वेच्छा से एक-दूसरे के साथ बैठना चाहिए और एक साझा मंच बनाना चाहिए. उन्हें अपने लिए एक योजना बनानी चाहिए’’
प्रणब सेन, अर्थशास्त्री
''इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है कि पूर्व के लिए अलग से नीति बनाई जाए, जिसमें बेहतर सड़कों और बुनियादी ढांचे पर जोर हो’’
सागर दरयानी, सीईओ, वॉव! मोमो
''नूपुर शर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पूरी तरह से वैधानिक संवाद प्रक्रिया का हिस्सा थी. इसे न्यायिक अतिक्रमण नहीं माना चाहिए’’
अभिषेक मनु सिंघवी, राज्यसभा सांसद, कांग्रेस
''न्यायपालिका को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामलों को लेकर ज्यादा चौकस रहना चाहिए. अभी वह अपनी जिम्मेदारियां उचित ढंग से नहीं निभा रही है’’
अशोक गांगुली, पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट
''कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच टकराव अपने आप खत्म हो जाएगा अगर इनमें से हर एक संविधान के तय दायरे में खुद को रखे’’
देवाजीत सैकिया, एडवोकेट जनरल, असम
''अग्निपथ योजना का उद्देश्य सशस्त्र बलों को और जवान (युथफुल प्रोफाइल) बनाना है. सेनाओं में युवा जोश और अनुभव का एक उचित संतुलन होना चाहिए’’
ले. जनरल राणा प्रताप कलिता. जीओसी-इन-चीफ, पूर्वी कमान
रोमिता दत्ता