अरुण पुरी
लगातार दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रहे रोनाल्ड रीगन को उनके विरोधी मोटी चमड़ी वाला राष्ट्रपति कहा करते थे, क्योंकि कोई आलोचना उन पर टिकती नहीं थी. कई संकटों से गुजरने के बावजूद उनकी लोकप्रियता ज्यों की त्यों बनी रही, बल्कि कई बार बढ़ी.
यही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कही जा सकती है. देश अनेक संकटों से गुजरा है और कई मोर्चों पर बेहद मुश्किल स्थिति बनी है, लेकिन उनकी निजी लोकप्रियता बेदाग है. यह आम समझ से परे है. लगता है, उन्हें झटकों को झेलने का कोई कवच हासिल है, जिसे सिर्फ आभामंडल ही कहा जा सकता है.
आंकड़े उसकी व्याख्या तो दूर, उसका कोई सिरा भी नहीं पकड़ सकते. पर वे हमें देश की मनोदशा का एक खाका तो दे ही देते हैं, हमारे लिए यह भांपने में मददगार हो जाते हैं कि सामूहिक सोच कैसे अबूझ पहेली की तरह काम करती है. इंडिया टुडे के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के 44वें संस्करण से वही साबित होता है, जो ज्यादातर जानकार अपनी सूझबूझ से जानते हैं.
अगर 'बेहतरीन’ (22.7 फीसद) और 'अच्छा’ (42.8 फीसद) को जोड़ लें तो बतौर प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज को अभी भी सर्वेक्षण में 65.5 फीसद लोग काफी ऊंचा आंकते हैं. अगस्त 2020 में यह आंकड़ा 78 फीसद को छू गया था, लेकिन 2016 के बाद से कभी भी 53-54 फीसद से नीचे नहीं गया.
सामान्य समय में भी अपने कार्यकाल के नौवें वर्ष में किसी प्रधानमंत्री ने लोकप्रियता की ऐसी ऊंचाई हासिल नहीं की थी क्योंकि इस समय तक ज्यादातर नेता सत्ता-विरोधी रुझान से रू-ब-रू होते हैं. और यह सामान्य समय है भी कहां! युद्ध, महामारी और आर्थिक गिरावट, सबका साया मोदी के कार्यकाल में छाया रहा. सो, हम एक बुनियादी विरोधाभास के सामने खड़े हैं: सब कुछ को मात देने वाले इस आंकड़े के साथ महंगाई और बेरोजगारी जैसे अहम आर्थिक मुद्दों पर भारी असंतोष भी खड़ा है.
मतदाताओं की मंशा की अगर हम व्याख्या करें तो इस मोदी फैक्टर के मायने यह भी हैं कि भाजपा और उसका गठजोड़ एनडीए देश की दुर्दशा के दंश से बचा हुआ है. अगर 1 अगस्त, 2022 को चुनाव होते तो भाजपा की वोट हिस्सेदारी 37.2 फीसद रहती, जो 2019 के लोकसभा चुनावों में हासिल 37.3 फीसद से मामूली दशमलव अंक ही पीछे है. इसके मुताबिक, भाजपा 283 सीटों पर (2019 में 303 के मुकाबले) खिसक आती. लेकिन तब भी उसके पास अपने दम पर बहुमत होता.
और एनडीए ठीक-ठाक 41.4 फीसद वोट के साथ अभी भी 307 सीटें हासिल कर सकता है, जबकि 2019 में यह आंकड़ा 45 फीसद और 352 सीटों का था. हमारे सर्वेक्षण के बाद अचानक इस हफ्ते बिहार में घटनाओं ने नया मोड़ ले लिया. नीतीश कुमार ने एनडीए से मुंह मोड़कर पुराने महागठबंधन के साथी के साथ सरकार बना ली, जिससे भाजपा की राष्ट्रीय स्थिति पर असर पड़ सकता है.
इसका असर भांपने को हमने 10 अगस्त को एक फौरी सर्वे करवाया. हमने पाया कि एनडीए का आंकड़ा मामूली घटकर 286 और भाजपा का 275 पर आ गया है. यानी भाजपा को अभी भी, थोड़ा ही सही, अपने दम पर बहुमत मिलता दिखता है. हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि 2024 के चुनावों में इसका असर क्या होगा.
दूसरे मोर्चों पर नजर डालें तो मोदी की निजी लोकप्रियता कुछ दिलचस्प विरोधाभास दर्शाती है. सबसे गहरा विरोधाभास लोगों की खुशहाली पर ली गई राय के मामले में उभरता है. टीम मोदी के अर्थव्यवस्था संचालन को 'बेहतरीन या अच्छा’ कहने वालों की तादाद में अगस्त 2020 के 70 फीसद से भारी गिरावट दर्ज हुई है.
यह आंकड़ा जनवरी 2022 के 50 फीसद से भी नीचे चला गया है. 'खराब या बेहद खराब’ बताने वालों की संख्या में तेज उछाल आया है. यह अगस्त 2020 के 5 फीसद से अब 29 फीसद पर पहुंच गया है. महामारी ने 2020 के मध्य को किसी भी सरकार के बारे में राय बदलने का एक स्वाभाविक मोड़ बना दिया; और जनवरी 2022 से यूक्रेन युद्ध से फिर गिरावट आई.
इसी के साथ इस सवाल को जोड़ लें कि 'मोदी के सत्ता में आने के बाद आपकी आॢथक स्थिति कैसे बदली है?’ तो प्रधानमंत्री के लिए यह चिंता का सबब होना चाहिए. जनवरी 2017 और अगस्त 2020 के बीच, 'सुधरी है’ बताने वालों का आंकड़ा बस एक बार ही 50 फीसद तक पहुंचा पर कभी 40 फीसद से नीचे नहीं गया. लेकिन आज यह सबसे नीचे महज 28 फीसद पर पहुंच गया है.
'बदतर हुई है’ कहने वाले अब 36 फीसद तक हैं और अगर उसमें 'ज्यों की त्यों’ बताने वालों के आंकड़े जोड़ लें तो संख्या 67 फीसद से ऊपर पहुंच जाती है. खासकर महंगाई और बेरोजगारी सबसे दर्दनाक पहलू हैं. करीब 63 फीसद ने कहा कि रोजाना के खर्चे पूरे करना आफत बना हुआ है. 73 फीसद जैसी बड़ी संख्या रोजगार के मोर्चे को गंभीर मानती है.
एनडीए सरकार को जिस दूसरे दायरे में रुझानों पर गौर करना चाहिए, वह है सामाजिक-राजनैतिक हलका. वहां से अच्छे संकेत नहीं मिल रहे. देश में लोकतंत्र को खतरे में कहने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है. अब यह चालीसेक से बढ़ता हुआ सबसे ऊंचे 48 फीसद (और ग्रामीण हलकों में 51 फीसद) पर पहुंच गया है. इसके भी शुरुआती संकेत हैं कि सांप्रदायिक सौहार्द में गिरावट समझने वालों की संख्या बढ़ रही है. सिर्फ 50 फीसद ने कहा कि राजनीति और धर्म पर राय रखने की आजादी है, जिसे गिलास आधा खाली के मुहावरे से सही-सही समझा जा सकता है.
'मिज़ाज’ भांपना बड़ा मुश्किल होता है, और मोदी के आलोचक शायद यह समझने में भूल कर बैठते हैं कि तगड़े झटके, वृद्धि दर, गिरावट वगैरह जैसे लोकप्रियता के ग्राफ के मानक पैमानों को वे कैसे लांघ जाते हैं. क्यों वे उन तगड़े झटकों से बच जाते हैं, जहां दूसरे चित हो जाते हैं? एक वजह विपक्ष में बिखराव है: अभी तक उन्हें चुनौती देने वाला कोई एक नेता नहीं है.
अलबत्ता हमारे सर्वेक्षण से पता चलता है कि अरविंद केजरीवाल का कद बढ़ रहा है. दूसरे, मोदी को अभी भी इसी रूप में देखा जाता है कि वे ही तमाम संकटों से आगे ले जा सकते हैं. उनकी सफलताओं में कोविड प्रबंधन के आंकड़े सबसे ऊपर हैं. इसका श्रेय बड़े पैमाने पर सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम को रिकॉर्ड समय में पूरा करने को जाता है. उससे मोदी सरकार में लोगों का भरोसा बढ़ा.
इसी तरह अपेक्षाकृत घोटालों से मुक्त प्रशासन को भी जाता है. सर्वेक्षण का बड़ा संदेश सरकार के लिए है कि वह अर्थव्यवस्था, खासकर रोजगार और महंगाई के मोर्चे पर फौरन फोकस करे और लोकतांत्रिक आजादी और सांप्रदायिक सद्भाव सुनिश्चित करे. इससे रुझानों में दूरियां मिटेंगी और शायद मोदी को रिकॉर्ड तीसरी बार जीत का भरोसा पैदा होगा.
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