अरुण पुरी
भारत ने अक्सर जीत के जबड़े से हार खींच लाने का रुझान दिखाया है. कोविड-19 महामारी से निबटने के तरीके में भी यही मालूम देता है. 1 फरवरी को भारत में 8,500 नए मामले थे, जो 8 जून 2020 के बाद सबसे कम थे. 13 अप्रैल को ये चढ़कर एक दिन में 1,80,000 नए मामलों पर जा पहुंचे, जो महामारी की शुरुआत के बाद सबसे ऊंचा स्तर था.
बदकिस्मती से यह ऐसा करतब है जो देश 6 अप्रैल से रोज कर रहा है. कोविड-19 वायरस का पिछले हफ्ते आया उभार अब सुनामी में बदल गया है. 13 अप्रैल की गिनती के बाद हमारे कुल सक्रिय मामले 12 लाख के पार पहुंच गए. हमारे कुल कोविड मामले भी 1.37 करोड़ पर जा पहुंचे, जो दुनिया भर में अमेरिका के 3.13 करोड़ मामलों के बाद दूसरे सबसे ज्यादा हैं.
तूफान से पहले की शांति को हमने गलती से उसका गुजर जाना मान लिया और रोजमर्रा की जिंदगी में मशगूल हो गए—धार्मिक जमावड़ों और राजनैतिक रैलियों की तो बात ही छोड़ दें. उससे भी हमारे राजनैतिक तबके के दोहरे मानदंड उजागर होते हैं. संक्रमण आसमान छू रहे थे और देश के कुछ हिस्सों में नागरिक कर्फ्यू झेल रहे थे, वहीं इन विशाल जमावड़ों पर कोई रोक-टोक नहीं थी और उनमें कोविड के नियमों का पालन भी बमुश्किल किया जा रहा था.
यही ढिलाई और लापरवाही अब भारी कीमत वसूल रही है. हर दिन मनहूस खबरें लेकर आता है और भारत की चीखें खुद वायरस की तरह कई गुना बढ़ती जाती हैं. ज्यादा बड़ी फिक्र है कि तमाम शहरों को बेध रही यह लहर उस आबादी को संक्रमित कर रही है जो पहली लहर में अछूती रह गई मालूम देती थी—यानी 15 से 44 की उम्र के लोग.
मुंबई के एक अव्वल अस्पताल में लिफ्ट के आसपास की जगह मरीजों के वार्ड में बदलनी पड़ी. दुनिया के सबसे कठोर लॉकडाउन के 68 दिनों में मेहनत से तैयार भारत का स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर जल्द चरमरा सकता है. भारत के आर्थिक शक्तिकेंद्र महाराष्ट्र ने लॉकडाउन लगा दिया है. पिछले साल हमने देखा कि लॉकडाउन अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर सकते हैं, पर शायद यह सिर्फ समय की ही बात हो जब वायरस के फैलाव को रोकने के लिए यही अकेला विकल्प बचे. भारत यह विकल्प गवारा नहीं कर सकता. इससे लाखों लोग अकथ मुसीबतों से घिर जाएंगे.
समाधान बेशक यही है कि बड़ी आबादी को तेजी से टीके लगाएं. वायरस के धक्के को धीमा तथा संक्रमण, गंभीर बीमारी और मौत के जोखिम को कम करने के लिए टीका अकेला अचूक उपाय है. हर्ड इम्यूनिटी पर पहुंचने के लिए भारत को 75 फीसद आबादी या 99 करोड़ लोगों को टीके लगाने होंगे. यानी हमें 1.98 अरब खुराकों (वैक्सीन की दो खुराक के लिए) की जरूरत है. फिलहाल रोज 40 लाख लोगों को टीके लग रहे हैं.
हमें टीकाकरण की रफ्तार 2 करोड़ रोजाना तक बढ़ाना और हर महीने 60 करोड़ टीकों की नियमित सप्लाई बनाए रखना होगा, जबकि हमारी मौजूदा क्षमता 8-10 करोड़ प्रति माह है. काम दुष्कर है और सरकार को तैयार रहना ही होगा. टीकाकरण बढ़ाने को हमारे पास न पर्याप्त खुराकें हैं, न ही भविष्य का रास्ता साफ है. समझ नहीं आता दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन उत्पादक देश इस हालत में क्यों है. यह वैसा ही है जैसे सऊदी अरब अपने लोगों से कहे कि उसके पास उनके लिए तेल नहीं.
भारत की दिग्गज फार्मा कंपनियां वैक्सीन की सालाना 3 अरब खुराकें बना सकती हैं. दूरदृष्टि की कमी, निर्यात के वादों, देरी से मिले ऑर्डरों, बेहद केंद्रीकृत तरीके और मैन्युफैक्चरिंग के लिए प्रोत्साहन के अभाव के चलते तीन महीनों में महज 11 करोड़ खुराकें मिल पाईं. सरकार ने 12 करोड़ और वैक्सीन का ऑर्डर टीकाकरण कार्यक्रम शुरू होने के दो महीने बाद मार्च के आखिरी हफ्ते में दिया.
महामारी के प्रति अपने सारे सिनिसिज्म के बावजूद ट्रंप प्रशासन ने फाइजर को 10 करोड़ खुराक के लिए 2 अरब डॉलर दे दिए थे और वैक्सीन कामयाब होने पर 50 करोड़ खुराकें और लेने का विकल्प रखा था. अमेरिका के पास इतनी खुराकें है कि अपनी पूरी आबादी को दो बार टीके लगा सकता है.
हमारे टीका अभियान के शुरुआती दौर में वैक्सीन की हिचक से उबरने को लेकर संवाद की भीषण कमी के चलते कुछ राज्यों में 8-9 फीसद टीके बर्बाद हुए. यह साफ था कि अर्थव्यवस्था के फिर शुरू होते ही संक्रमण बढ़ेंगे, जैसा दुनिया के कई हिस्सों में हुआ. हमें पता है कि हम दुनिया के शायद सबसे कम अनुशासित राष्ट्र हैं और नियम तोड़ या उन्हें चकमा देकर खुश होते हैं.
फिर जिस तरह हर देश आपातस्थिति के लिए तेल या कोयले सरीखे ऊर्जा स्रोतों का भंडार रखता है, उसी तरह जब मांग कम थी, हम वैक्सीन का रिजर्व स्टॉक रख सकते थे. भारत की वैक्सीन के लिए बस रेफ्रिजरेटर चाहिए और सरकार आसानी से छह माह का भंडार रख सकती थी. इसके बजाय हमने 6 करोड़ वैक्सीन निर्यात कीं जबकि हमारे अपने लोगों को केवल 7 करोड़ खुराकें दी गईं.
हमारी वैक्सीन रणनीति से आत्मसंतोष और बहुत ज्यादा सरकारी नियम-कायदों की बू आती है. वैक्सीन की कमी के चलते भारत को टीकाकरण सबके लिए खोल देने की बजाय टुकड़ा-टुकड़ा रणनीति अपनानी पड़ी. निजी क्षेत्र को वितरण में शामिल न करने से भी रुकावटें आईं. दिसंबर में 16 वैक्सीन क्लिनिकल और प्री-क्लिनिकल परीक्षणों के दौर में थीं, फिर भी भारत के दवा नियंत्रक को परीक्षण तेज करने के नियम संशोधित करने में चार माह लगे.
विकसित देशों में कई वैक्सीन व्यापक परीक्षणों से गुजरीं और उनके दवा नियंत्रकों से मंजूर हुईं, जिनके इस्तेमाल को भारत में फास्ट-ट्रैक किया जा सकता है. रोज 40 लाख लोगों को टीका लगाने की मौजूदा रफ्तार से 30 करोड़ लोगों को टीके लगाने का लक्ष्य मध्य जुलाई तक पूरा होगा और 75 फीसद आबादी को टीके लगाने में डेढ़ साल लगेंगे. तब तक पूर्ण टीकाकृत लोगों की सुरक्षा अवधि खत्म होने लगेगी, उन्हें फिर टीके लगाने होंगे.
एसोसिएट एडिटर सोनाली आचार्जी की लिखी इस बार की हमारी आवरण कथा ‘टीके का आपातकाल’ बताती है कि भारत में मौजूदा संकट कैसे उपजा, तमाम पहलुओं ने टीका रणनीति को कैसे बेपटरी किया, वैक्सीन के पात्रों की संख्या में बढ़ोतरी और मामलों के उभार ने कैसे मांग बढ़ाई, उत्पादन क्षमता को पछाड़ा और वैक्सीन का भंडार खत्म कर दिया.
सरकार अब जागी दिखती है और टीकों का निर्यात कर रही है. पर हमने अहम वक्त गंवा दिया. इन उपायों का असर आने में 3-4 महीने लगेंगे. सरकार को वैक्सीन उत्पादन के लिए सब्सिडी देकर, धन खर्च करके और क्षमता बढ़ाकर टीकाकरण तेज करने की जरूरत है. उसे चाहिए कि तेजी से टीके लगाने को दूसरी फार्मा कंपनियों को जोड़े, सरकारी संसाधन लगाए, निजी क्षेत्र को तैनात करे. वह भी तीसरी लहर आने से पहले.
(अरुण पुरी).
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