विरल वी. आचार्य
असल में, मंजिल पर पहुंचकर ही ठीक ढंग से विचार किया जा सकता है कि सफर कैसा रहा. डॉ. सी. रंगराजन की किताब आधुनिक भारतीय वित्तीय व्यवस्था के प्रमुख वास्तुकार के रूप में उनके विराट सफर को तफसील से सामने रखती है. यह भारत में तीन दशक (1982-2014) से ज्यादा अरसे तक उनकी लोक सेवा का लेखा-जोखा है. इस किताब को पढ़ना और इसकी समीक्षा करना मेरे लिए सम्मान और सौभाग्य की बात है.
ट्रेनिंग से मैक्रोइकोनॉमिस्ट और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ. रंगराजन भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के डिप्टी गवर्नर और गवर्नर, दो राज्यों के राज्यपाल, 12वें वित्त आयोग के अध्यक्ष, राज्यसभा के सदस्य तथा आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सरीखे पदों पर रहे.
मैं भारत में किसी दूसरे शख्स के बारे में नहीं सोच पाता जो तकनीकी और अर्ध-राजनैतिक दोनों पदों पर सफल रहा हो, दोनों किस्म के पदों पर सहजता से आता-जाता रहा हो, और जिसने हर काम में हमेशा खासे असरदार नतीजे दिए हों. इसलिए यह अपने आप में सेवानिवृत्ति के बाद बड़ी सेवा की बात है कि उन्होंने विभिन्न पदों पर अपने कार्यकाल के दौरान मौजूद आर्थिक पृष्ठभूमि, पेश आई नीतिगत चुनौतियों, लिए गए फैसलों, हासिल की गई स्थिरता, और तेज की गई वृद्धि को समाहित करते हुए ये संस्मरण लिखे हैं.
किताब में पहला धमाका 1990 के दशक के भुगतान संतुलन (बीओपी) के संकट बाद शुरू किए गए सुधार हैं. उस आरंभिक व्यवस्था से, जिसमें डॉ. रंगराजन आरबीआइ के गवर्नर के नाते नेपथ्य के दफ्तर में बैठकर (बेशक कर्मचारियों के साथ चर्चा के बाद) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए की विनिमय दर तय करते थे, आज अरबों डॉलर की खरीद-फरोख्त के बीच ज्यादातर बाजार की ताकतों के हाथों तय की जा रही विनिमय दर तक यह जो बदलाव आया है, भारत के बाहरी क्षेत्र की साज-संभाल में एक जबरदस्त छलांग है.
इस कदम के लिए नियंत्रण छोड़ने की जरूरत थी. बीओपी संकट के दोहराव से बचने की खातिर डॉ. रंगराजन ने भारत सरकार के साथ मिलकर उसकी शुरुआत की. उन्होंने लंबे वक्त की इक्विटी शैली पर ज्यादा, और अस्थिर तथा चलायमान मुद्रा के ऋण प्रवाह पर कम तथा डॉलर मूल्यवर्ग के सरकारी बॉन्ड में कतई भरोसा न करते हुए पूंजी के प्रवाह को संभालने के लिए दूरदर्शी ढांचा स्थापित किया.
आरबीआइ में अपने कार्यकाल को देखते हुए मुझे किताब के दूसरे हिस्से में ज्यादा आनंद आया. हैरानी नहीं कि यह उनके उस भाषण के इर्द-गिर्द घूमता है जो आरबीआइ के किसी भी गवर्नर का सबसे अहम भाषण माना जाता है, यानी डॉ. रंगराजन का 1993 का कुट्टी मेमोरियल लेक्चर.
उसमें तदर्थ और छोटे वक्त के ट्रेजरी बिल जारी करके अपने आप सरकारी घाटों की पूर्ति करने की उस अस्वस्थ प्रथा को स्वीकार किया गया, जिसका नतीजा घाटे के मामले में अनुशासन में कमी और धन की आपूर्ति में वृद्धि तथा उसकी वजह से कीमतों में वृद्धि के निरंतर जोखिम की शक्ल में सामने आता है. इस भाषण ने आरबीआइ की मौद्रिक नीति के मामले में परिचालन की स्वायत्तता न होने को प्रमुखता से सामने रखा, जिसे दुरुस्त करने की जरूरत थी. इस सुधार के कदम 1994 से 1997 के दौरान एक-एक कर उठाए गए.
डॉ. रंगराजन कुशलता से बताते हैं कि सरकार का अपने घाटों के लिए आरबीआइ के बजाए बाजारों से धन जुटाना, अर्थव्यवस्था में मुक्त रूप से ब्याज दरें तय होने देने की मांग करता है. इसका अर्थ था कि 1964 से ही केंद्रीय रूप से प्रशासित की जा रही कर्ज की दरों का विनियमन और सरकारी बॉन्ड बाजारों का विकास.
ये सुधार 1992-1997 के दौरान हुए—बैंकों को सरकारी बॉन्ड खरीदने या बड़ी तादाद में केंद्रीय बैंक की आरक्षित धनराशि रखने के नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया, छोटे वक्त के मुद्रा बाजार विकसित किए गए, और सरकारी प्रतिभूतियों को पहले से तय कीमतों के बजाए नीलामी के जरिए बाजारों को बेचा गया. आरबीआइ और सरकार ने महंगाई को नियोजित करने का जो ढांचा 2016 में अपनाया, वह डॉ. रंगराजन के गवर्नर काल के दौरान लागू किए गए और आगे बढ़ाए गए उनके बेहद अहम सुधारों की ही स्वाभाविक परिणति है.
किताब का तीसरा और अंतिम हिस्सा राजकोषीय संघवाद के मुद्दे पर केंद्रित है—असल अर्थव्यवस्था को सहारा देने और सार्वजनिक खर्चों के लिए धन जुटाने की खातिर राज्यों के साथ केंद्र का रिश्ता कैसे सहकारी तरीके से लेकिन साथ ही पर्याप्त अधिकार सौंपने के माध्यम से संभाला जाना चाहिए. यहां भी डॉ. रंगराजन 2002 में 12वें वित्त आयोग की अपनी अध्यक्षता के दौरान राज्यों के लिए धन जुटाने, राज्यों के विकास ऋण जारी करने, और धन जुटाने के उद्देश्यों से राज्यों को धीरे-धीरे केंद्र से विमुख करने की दिशा में अहम सुधारों की ओर ले गए.
इतनी सारी उपलब्धियों के साथ लेखक के रूप में कोई भी नए-नवेले विचारों को चमक-दमक के साथ पेश करने या उनकी रूमानियत के फेर में पड़ ही सकता है. मगर डॉ. रंगराजन ऐसे किसी प्रलोभन के आगे घुटने नहीं टेकते. उनकी लेखन शैली संयम से भरी है. विभिन्न पदों पर अपने कार्यकाल के दौरान हासिल उपलब्धियों का श्रेय उसे अन्य लोगों के साथ साझा करने के मामले में वे उदार हैं. गौरतलब बात यह कि किताब तब के वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को समर्पित की गई है, जिनके साथ उनका परस्पर सम्मान का रिश्ता और बढ़िया नतीजे देने वाली साझेदारी थी, और ''जिनकी दूरदृष्टि और साहस ने भारत के लिए कई नई संभावनाओं और अवसरों के दरवाजे खोले.’’
यह किताब वाणिज्य, सेंट्रल बैंकिंग, अर्थशास्त्र और वित्तीय बाजारों में दिलचस्पी रखने वाला कोई भी व्यक्ति पढ़ सकता है. दरअसल, कोई अर्थशास्त्र का अच्छा जानकार न हो, तब भी आज के भारत के बारे में इस पाठ की अहमियत पाठक में अर्थशास्त्र के बारे में और ज्यादा जानने की दिलचस्पी जगा सकती है. किताब का आखिरी अध्याय 'सम रुमिनेशंस’ (कुछ चिंतन-मनन), 1990 के दशक से पहले के मोटे तौर पर राज्य-नियंत्रित युग से उदारीकरण के नपे-तुले, क्रमिक, लेकिन निर्णायक सुधारों से लाभान्वित मौजूदा रूप तक, भारत के विकास का सबसे पठनीय, स्वतंत्र और तथ्य-आधारित सार-संक्षेप है.
किताब आनंददायक ढंग से सारगर्भित और पारदर्शी ढंग से ईमानदार वाक्यों से गुंथी है. मसलन, किताब की प्रस्तावना का एक वाक्य इस प्रकार है—कई लोग मुझसे पूछते हैं, ''आरबीआइ का गवर्नर होने में मुझे आनंद आया?’’ मेरा जवाब है, ''मैं पीछे मुड़कर इसका आनंद ले रहा हूं.’’ उस वक्त जब हम संकट से और बाद में सुधारों से निबट रहे थे, ''आगे बढऩा आसान नहीं था. तीव्र उत्कंठा और चिंता के क्षण आते थे.’’ फैसले लेने वाले शख्स के तौर पर अपनी कमजोरियों को उघाड़कर रख देना और फिर भी अपनी सारी दुविधाओं को चुपचाप सुलझाना डॉ. रंगराजन के व्यक्तित्व की पहचान है.
पूरी किताब में वृद्धि पर डॉ. रंगराजन का अचूक फोकस देखा जा सकता है. कीमतों में स्थिरता यानी महंगाई को नियंत्रित रखने को वे सतत वृद्धि के लिए अनिवार्य मानते हैं. शुरू से आखिर तक वे समतामूलक वृद्धि की अहमियत पर जोर देते हैं. दरअसल, वे यह स्पष्ट कर देते हैं कि ऊंची वृद्धि और समता को इसी क्रम में नहीं रखा जा सकता, बल्कि अर्थव्यवस्था की संतुलित चाल के लिए दोनों कदम आपसी तालमेल के साथ उठाए जाने चाहिए. वे कहते हैं, ''अर्थशास्त्र की बुद्धिमता और आर्थिक राजकौशल इसी में है.’’
आज ज्यादा से ज्यादा देश, यहां तक कि विकसित देश भी, इतनी संकरी नीतिगत गुंजाइश से दरपेश हैं कि जहां राजकोषीय और सेंट्रल बैंकिंग का अंकगणित एक दूसरे के विपरीत है. यह ऐसी चुनौती है जो बाजारों पर इसके असर से और बढ़ जाती है. यह कम आवृत्ति वाला चक्र है जो अपने को दोहराता रहता है. इसलिए मेरा आकलन यह है कि फॉर्क्स इन द रोड केवल भारतीय ही नहीं बल्कि दुनियाभर के पाठकों के लिए आर्थिक इतिहास की कालजयी कृतियों का दर्जा पाने की हकदार है. ठ्ठ
विरल वी. आचार्य न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनेस के डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंस में अर्थशास्त्र के सी.वी. स्टार प्रोफेसर और आरबीआइ के पूर्व डिप्टी गवर्नर (2017-19) हैं
इतनी सारी उपलब्धियों के बावजूद, लेखक के रूप में डॉ. रंगराजन किसी भी नए-नवेले या अनियत विचार को चमक-दमक के साथ पेश करने या उनकी रूमानियत के फेर में नहीं पड़ते
इस पूरी किताब में, वृद्धि पर डॉ. रंगराजन का अचूक फोकस देखा जा सकता है
फॉर्क्स इन द रोड:
माइ डेज ऐट आरबीआइ ऐंड बीऑन्ड
लेखक: सी. रंगराजन
पेंगुइन रैंडम बुक्स
699 रु.; 304 पेज
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