भारत की हिंदी-पट्टी में (या कहीं भी ऐसी जगह जहां हिंदी बोलने-सुनने वाले इक्का-दुक्का लोग मौजूद हैं) अगर कोई ऐसा कहता है कि उसने नुसरत फ़तेह अली ख़ान को नहीं सुना है तो या वो बहरा है या किसी दूसरे ग्रह से आया है. दोनों ही मामलों में उसकी जांच की जानी बेहद ज़रूरी होगी. 1948 में पाकिस्तान में जन्मे नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने क़व्वाली को देश की संकरी गलियों, उर्स की भीड़ और सिगरेट के धुएं से भरी बैठकों से निकालकर न्यू यॉर्क के सेन्ट्रल पार्क में बिठाया. पीटर गेब्रियल का साथ पाने के बाद नुसरत मार्टिन स्कॉर्सेसी की फ़िल्म द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ क्राइस्ट का हिस्सा बने और उन्होंने WOMAD (वर्ल्ड ऑफ़ म्यूज़िक, आर्ट्स ऐंड डांस) के पहले संस्करण (1982) से उसमें हिस्सा लेना शुरू किया.
आगे चलकर ये दुनिया का सबसे बड़ा म्यूज़िक फ़ेस्टिवल बना. नुसरत ने दुनिया के सबसे बड़े नामों जैसे ट्रेंट रेज्नॉर, नाइन इंच नेल्स, एडी वेडर के साथ काम किया और पूरी दुनिया पर छाते रहे. इस दौरान उनके कदम हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में भी पड़े. 1994 की शेखर कपूर की फ़िल्म बैंडिट क्वीन से हुई शुरुआत 'और प्यार हो गया', 'शहीद-ए-मोहब्बत', 'धड़कन' और 'कच्चे धागे' तक पहुंची. (वीडियो: द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ क्राइस्ट में नुसरत का अलाप)
लेकिन नुसरत फ़तेह अली ख़ान की शुरुआत असल में इस नाम से नहीं हुई थी. ये एक जानी-मानी कहानी है कि उनके पिता फ़तेह अली ख़ान ने अपने बेटे का नाम परवेज़ रखा था. लेकिन फिर गुलाम सम्दानी ने उनका नाम बदलकर नुसरत रख दिया, जिसका अर्थ है - जीत. नुसरत के पिता और उनके भाई मुबारक अली ख़ान जाने-माने क़व्वाल थे लेकिन फ़तेह अली ख़ान ये नहीं चाहते थे कि उनका बेटा भी क़व्वाल ही बने. समाज में क़व्वालों की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं थी. लेकिन परवेज़ को आला की जगह तबला ही रास आता था. पंडित दीनानाथ (दीनानाथ मंगेशकर से कन्फ्यूज़ न किया जाए) के कहने पर नुसरत के पिता ने उन्हें संगीत सिखाना जारी रखा. लेकिन संगीत इसी शर्त पर सिखाया गया कि वो स्कूल जाते रहेंगे.
नुसरत की ट्रेनिंग चल रही थी और इसी बीच, 1964 में उनके पिता का देहांत हो गया. दुख में डूबे नुसरत ने अपने पिता की मौत के कुछ ही दिन बाद एक सपना देखा. सपने में फ़तेह अली ख़ान उनसे अपने चेहल्लुम (मरने के 40 दिन बाद होने वाला एक कार्यक्रम) पर गाने को कह रहे थे. नुसरत फ़तेह अली ख़ान कहते हैं कि 'मैंने देखा कि मैं अपने पिता की मौत के बाद होने वाले कार्यक्रम में अपनी पहली लाइव परफ़ॉरमेंस दे रहा था. उनकी मौत के 40 दिन बाद वो आयोजन हुआ और वहां मैंने पहली बार सभी के सामने परफ़ॉर्म किया.'
1971 में नुसरत के चाचा मुबारक अली ख़ान की भी मौत हो गयी. इसके बाद उस क़व्वाली पार्टी को नुसरत ने आगे बढ़ाना शुरू कर दिया और इसे नाम मिला नुसरत फ़तेह अली ख़ान, मुजाहिद मुबारक अली ख़ान ऐंड पार्टी.
बचपन में, जब नुसरत को उनके पिता और चाचा संगीत की तालीम दे रहे थे, नुसरत को बार-बार एक सपना आता था. वो सपने में देखते थे कि वो अजमेर में मोईनुद्दीन चिश्ती के उर्स पर वहां गा रहे हैं. जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां थीं, एक पाकिस्तानी क़व्वाल के लिये भारत में किसी मजार पर आकर परफ़ॉर्म करना बहुत ही मुश्किल था. लेकिन 1979 में नुसरत अजमेर आये और वहां होने वाले उर्स पर उन्होंने परफ़ॉर्म किया.
नुसरत कहते थे कि जब उन्होंने अजमेर में बैठकर गाया तो उन्हें यकीन हो गया था कि वो जो भी कर रहे थे, सब कुछ अल्लाह उनसे करवा रहा था.
16 अगस्त 1997 को नुसरत फ़तेह अली ख़ान की लंडन के क्रोमवेल अस्पताल में मौत हो गयी. उन्हें काफ़ी समय से बीमारियों ने घेर रखा था.
नुसरत फ़तेह अली ख़ान के चेहल्लुम पर उनके भतीजे राहत फ़तेह अली ख़ान ने परफ़ॉर्म किया. राहत फ़तेह अली ख़ान, जो नुसरत के भाई फ़ारुख फ़तेह अली ख़ान के बेटे थे, बचपन से ही नुसरत से ट्रेनिंग पा रहे थे और तमाम वीडियो रिकॉर्डिंग में इन दोनों को जुगलबंदी करते हुए देखा-सुना जा सकता है. नुसरत के चेहल्लुम और उस मौके पर राहत की भावुक परफ़ॉरमेंस की वीडियो रिकॉर्डिंग यूट्यूब पर मिलती है.
केतन मिश्रा