एक बार फिर ये बात लोगों की ज़ुबान पर आने लगी है कि थियेटर में पब्लिक आ ही नहीं रही है. थियेटर में आने की बजाय वो फ़िल्म के ओटीटी पर रिलीज़ होने की बात जोह रही है. हाल-फ़िलहाल में हिंदी फ़िल्मों में कश्मीर फ़ाइल्स (वजहें अलग हैं) और भूल भुलैया ही थोड़ी-बहुत भीड़ ख़ुद तक खींच पायी हैं. बाकी, कोविड-काल के बाद सिर्फ़ केजीएफ़ और आरआरआर ही वो फ़िल्में नज़र आ रही हैं जिन्हें खचाखच भरी सीटें नसीब हुई हैं. इसी सब के बीच हिंदी और मातृभाषा की पूरी भसड़ तेज़ हुई और इसमें फ़िल्म इंडस्ट्री के बड़े नाम अपनी-अपनी बात रखते हुए नज़र आये. मालूम पड़ा कि एक दक्षिण भारत के ग़ैर-हिंदी स्टार ने कह दिया कि हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री उन्हें अफ़ोर्ड ही नहीं कर पाएगी. यहां हम इस बहस में नहीं जायेंगे और न ही किसी प्रकार का ज्ञान ठेलेंगे. फ़िलहाल, आप ये जान सकते हैं कि अगर लगातार ढीले होते जा रहे हिंदी कॉन्टेंट से उकता चुके हैं (गुल्लक 3 और पंचायत आप निपटा चुके हैं) और दक्षिण भारतीय फ़िल्में देखना पसंद है तो ये 5 मलयाली फ़िल्में देखें. ये सभी फ़िल्में थ्रिलर की केटेगरी में आती हैं और ओटीटी पर मौजूद हैं.
5. जोसेफ़ (2018)
डायरेक्टर एम पद्माकुमार की इस फ़िल्म में जोजू जॉर्ज हैं जिनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस बहुत ही दमदार है. उन्होंने एक रिटायर हो चुके तलाकशुदा पुलिसवाले की भूमिका निभायी है जो तसल्ली से शराब पीता है और नाना प्रकार के नशों से उसे कोई गुरेज नहीं है. इस किरदार का नाम जोसेफ़ है. जोसेफ़ एक बेहतरीन इन्वेस्टिगेटर है और वो छोटी से छोटी बात पकड़कर अपराधी को खोज निकाल सकता है. फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती है और जोसेफ़ की पूर्व पत्नी स्टेला का एक रोड एक्सीडेंट हो जाता है और कुछ दिनों में अस्पताल में उसकी मौत हो जाती है. जोसेफ़ को यकीन है कि रोड एक्सीडेंट असल में एक सोची-समझी साज़िश थी और स्टेला की हत्या की गयी थी. यूं ही कहानी आगे बढ़ती है और जोसेफ़ एक बहुत बड़े राज़ का पर्दाफाश करता है.
फ़िल्म प्राइम वीडियो पर मौजूद है.
इस फ़िल्म के हिंदी रीमेक की भी ख़बरें आयी हैं. सनी देओल को लीड रोल के लिये तय किया गया है.
4. मालिक (2021)
मालिक एक पोलिटिकल थ्रिलर फ़िल्म है जिसमें फ़हाद फ़ाज़िल सुलेमान नाम के किरदार में हैं. फ़िल्म शुरू होती है और मालूम चलता है कि सुलेमान एक बड़ी राजनीतिक हस्ती है जो एक धड़े का मसीहा सा बना हुआ है. ये भी मालूम चलता है कि विपक्षी खेमा उसे ख़तम कर देना चाहता है और उसे मारे जाने की प्लानिंग चल रही है. इसी बीच फ़िल्म फ़्लैशबैक में जाती है और समझ में आता है कि कैसे एक कस्बे का छोटा सा गुंडा मालिक बन गया. ये कस्बा मुस्लिम बनाम ईसाई के संघर्ष का गवाह बन रहा था और इस सब के केंद्र में था सुलेमान.
फ़िल्म महेश नारायणन ने डायरेक्ट की है जिन्होंने इससे पहले सी यू सून, टेक ऑफ़ जैसी फ़िल्में बनायी थीं. फ़िल्म में फ़हाद फ़ाज़िल की शानदार ऐक्टिंग है और फ़िल्म सांप्रदायिक टकरावों के कई आयामों को बगैर पार्टी बने आपके सामने रखती है.
फ़िल्म प्राइम वीडियो पर अवेलेबल है.
3. जल्लिकट्टू (2019)
जल्लिकट्टू फ़िल्म टोरंटो फ़िल्म फ़ेस्टिवल में प्रीमियर हुई थी. इसकी कहानी बेहद छोटी है - एक कसाई के यहां से एक भैंस भाग गयी है और पूरा गांव उस भैंस को ढूंढने निकल पड़ा है. लेकिन इस ढूंढने के क्रम में जो भी घटता है, वो कल्पना से परे है और झकझोर कर रख देने वाला है. एक जानवर को ढूंढने निकले लोगों को मालूम पड़ता है कि आस-पास कितने ही जानवर भेस बदलकर घूम रहे थे. ये फ़िल्म एक लम्बे और भारी हैंग-ओवर की तरह आपके सर पर लदी रहती है.
फ़िल्म के डायरेक्टर लिजो होज़े पेल्लिसरी अपनी अलग तरह की फ़िल्म-मेकिंग के लिये जाने जाते हैं. इनकी फ़िल्म अंगामली डायरीज़ में एक साथ 80 से ज़्यादा नये कलाकारों ने काम किया था.
जल्लिकट्टू फ़िल्म प्राइम वीडियो पर मौजूद है.
हैंगओवर उतारने के लिए Deepika Padukone बैग में रखती हैं खास दवा, आपको है मालूम?
2. नयट्टू (2021)
जोजू जॉर्ज की फ़िल्मों को ऐसी लिस्ट से दूर रखना बेहद मुश्किल है. फ़िल्म नयट्टू एक पोलिटिकल थ्रिलर है जहां पुलिस कुछ पुलिसवालों का पीछा कर रही है. एक लोकल पोलिटिकल गुंडे के साथी की मोटरसाइकिल पुलिसवालों की जीप से भिड़ जाती है और होते-करते उस लड़के की मौत हो जाती है. एक्सीडेंट की ये कहानी अचानक ही राजनीतिक मोड़ ले लेती है और शादी में शराब पीकर आ रहे उन पुलिसवालों की जान पर बन आती है. मर्डर का आरोप लगने के डर से तीनों पुलिसवाले भाग निकलते हैं और सूबे के मुख्यमंत्री उन्हें ढूंढ निकालने का फ़रमान जारी कर देते हैं. इलेक्शन सर पर हैं, ऐसे में कोई भी कैसा भी रिस्क नहीं लेना चाहता. पूरी कहानी इसी भागमभाग और जान बचाने की कोशिशों का शानदार संकलन है.
इस फ़िल्म को बेस्ट इंटरनेशनल फ़िल्मों की केटेगरी में इंडिया की तरफ़ से शॉर्टलिस्ट किया गया था.
फ़िल्म नेटफ़्लिक्स पर उपलब्ध है.
1. पाड़ा (2022)
एक और फ़िल्म जिसमें जोजू जॉर्ज हैं. ये फ़िल्म एक सत्य घटना पर आधारित हैं. साल 1996 में पलक्कड़ ज़िले के कलेक्टर साहब को उन्हीं के दफ़्तर में बंधक बना लिया गया था. एक तगड़े प्लान के साथ आये इन 'अपराधियों' ने ख़ुद को आदिवासियों के हित में काम करने वाले समूह का सदस्य बताया. ये लोग भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल के विरोध में इस घटना को अंजाम दे रहे थे. सिस्टम से लड़ाई की एक सच्ची घटना को दिखाती ये फ़िल्म कट-टु-कट बात करती है और कहीं भी इम्पैक्ट को कम नहीं होने देती. कमाल केएम द्वारा बनायी गयी इस फ़िल्म को हर तरफ़ से अच्छी ही बातें सुनने को मिलीं.
फ़िल्म प्राइम वीडियोज़ पर मौजूद है.
केतन मिश्रा