Movie review: राजनीति का सच दिखाने में असफल रही '31 अक्टूबर'

नेशनल अवार्ड जीत चुके डायरेक्टर शिवजी लोटन पाटिल ने 1984 में इमरजेंसी के दौरान हुई घटनाओं को अपनी नई फिल्म '31 अक्टूबर' के माध्यम से दिखाने की कोशिश की है...

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सोहा अली खान और वीर दास सोहा अली खान और वीर दास

वन्‍दना यादव

  • मुंबई,
  • 21 अक्टूबर 2016,
  • अपडेटेड 12:47 PM IST

फिल्म का नाम: 31 अक्टूबर
डायरेक्टर: शिवजी लोटन पाटिल
स्टार कास्ट: वीर दास, सोहा अली खान, दीपराज राणा, लक्खा लखविंदर सिंह, नागेश भोसले
अवधि: 1 घंटा 42 मिनट
सर्टिफिकेट: A
रेटिंग: 2 स्टार

मराठी फिल्म 'धग' के लिए नेशनल अवार्ड जीत चुके डायरेक्टर शिवजी लोटन पाटिल ने इस बार 1984 के दंगों के दौरान हुई घटनाओं को इस फिल्म के माध्यम से दिखाने की कोशिश की है. फिल्म को कई सारे फिल्म फेस्टिवल्स में पहले ही दिखाया जा चुका है और सेंसर ना हो पाने की वजह से इसकी रिलीज डेट कई बार बदली भी गई.

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वैसे इसके पहले भी आंधी, किस्सा कुर्सी का, लोक परलोक और हजारो ख्वाहिशें ऐसी जैसी फिल्में भी राजनीतिक दंगों के दौरान होने वाले हालात के इर्द गिर्द बनाई जा चुकी हैं, आइये जानें, इमरजेंसी के त्रासदी को दिखाने में कितनी सफल हुइ्र है ये फिल्म...

कहानी
दिल्ली के बैकड्रॉप पर बेस्ड यह फिल्म 31 अक्टूबर 1984 की सुबह से लेकर देर रात तक की कहानी है. यह वही दिन था जब भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीया इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी और हर तरफ दंगे भड़कने लगे. इसी बीच देविंदर सिंह (वीर दास) , उसकी वाइफ तेजिंदर कौर (सोहा अली खान) का सिख परिवार भी इन दंगो के बीच अपनी जान बचाने की कोशिश में लग जाता है. लेकिन क्या इनके दोस्त और करीबी लोग इन्हें दंगो से बचा पाने में सफल होंगे. इसका पता आपको नजदीकी सिनेमाघर में जाकर ही चलेगा.

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कमजोर कड़ियां
1. फिल्म में इतने बड़े मुद्दे को दर्शाने की कोशिश तो की गई है लेकिन किरदारों के डॉयलाग्स से आप उस पल में खुद को कनेक्ट नहीं कर पाते हैं.

2. पटकथा काफी कमजोर लगती है साथ ही उसे दर्शाने का तरीका भी बहुत ही कमजोर है.

3. वीर दास एक सिख किरदार को निभा तो रहे हैं, लेकिन कहीं से भी वो खुद को ऑडियंस से कनेक्ट करवा पाने में असमर्थ रहे हैं.

4. इंदिरा गांधी की मृत्यु की वजह से होने वाले दंगो को काफी सीमित तरीके से दर्शाया गया है, जिसे और भी बेहतर रूप दिया जाता तो फिल्म और भी दिलचस्प नजर आती क्योंकि ये सब्जेक्ट खुद में ही बहुत आकर्षक है.

5. कई दिनों के बाद फिल्मों में दिखाई देने वाली सोहा अली खान ने भी कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ी है, हालांकि इक्का दुक्का सीन्स में उन्होंने बखूब अभिनय किया है.

6. यह फिल्म एक खास तरह की ऑडियंस के लिए और ज्यादातर फिल्म फेस्टिवल्स के लिए ही उपयुक्त दिखाई पड़ती है, मास ऑडियंस को निराश ही होगी.

क्यों देखें
यदि आप एक्टर वीर दास और सोहा अली खान के बड़े फैन हैं, तो एक बार सिनेमाघर तक जाकर देख सकते हैं. वैसे फिल्म के आखिर में एन्ड क्रेडिट्स से पहले आये हुए तथ्य आपको सोचने पर विवश करते हैं.

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