यह शिकायत उतनी ही पुरानी है, जितनी सामाजिक न्याय की राजनीति. और शिकायत यह है कि शहरी अभिजात वर्ग का वंचितों और गरीबों पर वर्चस्व बना चला आ रहा है. तथाकथित दूसरे भारत-यानी संवेदनशील सूचकांक और बाजार के प्रलोभन से दूर बसे भारत-के पैरोकार इसे संपन्न अथवा सुविधाभोगी वर्ग की साजिश कहते नहीं थकते. वे हमें यह याद दिलाते नहीं थकते कि देश के 14 में से 12 प्रधानमंत्री देश के शहरी इलाकों से ही रहे हैं. सिर्फ दो प्रधानमंत्री यानी एच.डी. देवेगौड़ा और चरण सिंह किसान पृष्ठभूमि से थे और वे भी संयोग से ही कुर्सी पर बैठे थे.
अब जब गठबंधन की राजनीति ने भारत को दुनिया के सर्वाधिक भीड़ भरे-और राजनैतिक दृष्टि से घालमेल वाले-लोकतांत्रिक देशों में से एक बना दिया है तो सत्ता के समाजशास्त्र का यथार्थ एकदम सामने आ गया है. आम चुनावों की पूर्वसंध्या पर इंडिया टुडे के जनमानस सर्वेक्षण में अत्यंत मुखर रुझान यह सामने आया है कि दो ध्रुवीय राजनीति सिकुड़ रही है-अथवा बहुध्रुवीय राजनीति का बोलबाला हो रहा है. सर्वेक्षण में कोई भी स्पष्ट विजेता बनकर नहीं उभरा है क्योंकि सत्तारूढ़ यूपीए और राजग में बस 19 सीटों का अंतर है. इनके बीच के स्थान पर एक ऐसे निराकार समूह का कब्जा है जिसे तीसरा मोर्चा कहा जाता है. इस स्थान पर ऐसे क्षेत्रीय क्षत्रपों की भरमार है, जिनका मानना है कि अब देश पर उनके शासन करने का वक्त आ गया है. यदि वे खुद देश की सबसे ताकतवर कुर्सी पर नहीं बैठ पाए तो कम-से-कम यह फैसला तो कर ही सकेंगे कि उस पर कौन विराजमान होगा. यह क्षेत्रों की ओर से प्रतिकार भले ही न हो, लेकिन निश्चित रूप से राष्ट्रीय पार्टियों की राष्ट्रीय पहचान या कहें कि अखिल भारतीय स्वीकार्यता में कमी की पुष्टि तो करता ही है.
देश के खंडित राजनैतिक परिदृश्य में यदि प्रचुर मात्रा में कोई निश्चितता है तो वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की बहुलता है. शुरुआत में सिर्फ एक और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ही ठेठ प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में अपना अभियान चला रहे थे, वह भी बिना किसी स्पष्ट प्रतिद्वंद्वी के. बहुत बाद में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने और वह भी अनौपचारिक रूप से कहा कि यदि यूपीए ने चुनाव जीता तो मनमोहन सिंह एक बार फिर प्रधानमंत्री बनेंगे. लेकिन सोनिया प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम ही प्रस्तावित कर सकती हैं, उन्हें उस कुर्सी पर बिठा नहीं सकतीं. क्षेत्रीय पार्टियों के लगभग 70 सदस्यों के समर्थन के बगैर न तो आडवाणी और न ही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन सकते हैं. और उनके समर्थन की भी अब कोई गारंटी नहीं है क्योंकि किंगमेकर अब खुद ही किंग बनने की आकांक्षा पालने लगे हैं.
{mospagebreak}जैसे कि कभी सोनिया के भक्त रहे और फिर उन्हें ठेंगा दिखाने वाले लालू प्रसाद यादव ने आजतक टीवी चैनल पर एक साक्षात्कार में कहा, ''यूपीए का अस्तित्व बस दिल्ली में ही है. चुनाव के बाद हम दलित नेता रामविलास पासवान को प्रधानमंत्री बनाने पर क्यों नहीं विचार कर सकते?'' तो फिर, पासवान ही क्यों? शरद पवार क्यों नहीं? राकांपा अपने नेता और केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को कुछ समय से देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करती आ रही है. 13 अप्रैल को भुवनेश्वर में होने वाली रैली में वे माकपा नेता प्रकाश करात और ओडीसा के मुख्यमंत्री और बीजद नेता नवीन पटनायक के साथ एक ही मंच पर बैठेंगे. यही पवार की राजनैतिक स्वतंत्रता है. उनकी पार्टी उनके गृह राज्य महाराष्ट्र और गोवा को छोड़कर हर कहीं कांग्रेस के विरुद्ध लड़ रही है. प्रत्येक क्षेत्रीय पार्टी की रणनीति अधिकतम सीटों पर चुनाव लड़ने की है ताकि वे 2004 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले अपनी सीटों में वृद्धि कर सकें. जाहिर है, कांग्रेस और भाजपा दोनों बेहद चिंतित हैं और वे 2004 की तुलना में अधिक उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतार सकती हैं.
सर्वेक्षण भाजपा या कांग्रेस में से किसी के भी हौसले बुलंद नहीं करता दिखता. जो पार्टियां इनमें से किसी गठबंधन में शामिल नहीं हैं, उन्हें भी लगभग उतनी ही सीटें मिलेंगी. लालू, मुलायम सिंह यादव, पासवान, जयललिता, मायावती सरीखे नेता और कम्युनिस्ट अब अपनी मर्जी के मालिक हैं. पवार के पांव भले ही यूपीए की जमीन पर हों, लेकिन उनका दिल तो कहीं और ही है. और इनमें प्रत्येक क्षत्रप करीब 25-30 सीटें लाने की कुव्वत रखता है. इस तरह उनकी सीटें ही कुल मिलाकर 180 का आंकड़ा छू सकती हैं. फिर भी, उनके एक साथ बने रहने पर भी शक है. क्या मायावती और मुलायम सिंह कभी एक साथ रहेंगे? लगता नहीं है. वामपंथियों और अन्य के नेतृत्व में तथाकथित तीसरे मोर्चे का उम्मीदवार कांग्रेस या भाजपा के समर्थन के बिना 7 रेसकोर्स रोड़ नहीं पहुंच सकता. प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए विकल्प बहुत हैं, और जोड़-तोड़ की कला में माहिर कोई शख्स ही राजनैतिक दृष्टि से फायदेमंद सौदा कर सकता है.
तो हमारे समाने इतने विकल्प कैसे आ गए-या कहें कि भारत के बारे में इतने प्रतियोगी विचार कैसे मैदान में आ गए? असल में यूपीए, प्रधानमंत्री पद के इंतजार में बैठे नेताओं की कतार तैयार करने में खासा उवर्रक रहा है. लालू और पवार जैसे नेताओं ने अपने विभाग का कार्यकाल अच्छी तरह संभालकर राष्ट्रीय पहचान बना ली है. केंद्र में अपनी ताकत का इस्तेमाल उन्होंने अपना क्षेत्रीय आधार बढ़ाने में किया. तो यूपीए के लिए तो संसद में विश्वास मत ऐसी घड़ी थी, जब उसे अपने सहयोगियों के असली महत्व का एहसास हुआ. उसने सपा, राजद और द्रमुक की बदौलत विश्वास मत जीता. इन पार्टियों ने न सिर्फ अपने सांसदों को बचाए रखा, बल्कि दूसरी पार्टियों के सांसदों को खींचने में भी कामयाब रहे. इससे सहयोगियों में नया विश्वास आया.
{mospagebreak}जैसा कि सर्वेक्षण से स्पष्ट है, राष्ट्रीय हस्ती बनने के आकांक्षी क्षेत्रीय नेताओं को अपने राज्यों में दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की तुलना में अधिक समर्थन हासिल है. उत्तर प्रदेश में मायावती 24 फीसदी और मुलायम सिंह 21 फीसदी समर्थन पाकर आडवाणी (11 फीसदी) और मनमोहन सिंह (7 फीसदी) से कहीं दूर आगे हैं. उधर, बिहार के मतदाताओं की नजर में लालू या नीतीश कुमार आडवाणी या मनमोहन सिंह के मुकाबले अच्छे प्रधानमंत्री होंगे. अपनी 120 सीटों के साथ ये राज्य चुनाव के बाद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. गुजरात में नरेंद्र मोदी 40 फीसदी से अधिक मतदाताओं की पसंद हैं. वहां आडवाणी को सिर्फ 3 फीसदी लोगों ने पसंद किया. महाराष्ट्र में पवार इस पद के लिए द्वितीय सर्वाधिक पसंदीदा उम्मीदवार हैं. लेकिन दक्षिणी राज्यों में मनमोहन सिंह को मतदाताओं ने देवेगौड़ा, जयललिता, करुणानिधि और चंद्रबाबू नायडु की तुलना में बेहतर उम्मीदवार माना है. जब इंदिरा गांधी, राजीव गांधी या अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता में थे तो कोई क्षेत्रीय नेता उनके समकक्ष नहीं बैठता था या उनकी लोकप्रियता के कहीं आसपास तक भी नहीं टिकता था.
नेतृत्व में क्षेत्रीय ताकतों के उभरने का अर्थ कई छोटे-छोटे भारतों का उभार भी है. तो चुनाव के बाद यह तय है कि भारत गणितीय जोड़-तोड़ और प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा के महत्वोन्माद और राजनीति से नैतिक मूल्यों के विघटन का रोमांचक थ्रिलर बनेगा.
प्रभु चावला