चुनाव कवरेज के लिए विदर्भ, मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों के दौरे के दौरान मैंने किसानों से वही पांच सवाल किए, जो अमूमन हर पत्रकार करते हैं.
सवाल-क्या आप के सिर पर कर्ज का बोझ है?
जवाब- हां
सवाल- क्या आपकी कमाई में कुछ वृद्धि हुई है?
जवाब- नहीं
सवाल- क्या आपको उपज का उचित मूल्य मिलता है?
जवाब- नहीं
सवाल- क्या सरकार से छह हजार रुपये सालाना मदद पर्याप्त है?
जवाब- नहीं
सवाल- क्या देश में कोई राजनीतिक दल किसानों का शुभचिंतक है?
जवाब- कोई नहीं.
शुरुआती चार सवालों के जवाब से स्पष्ट है कि सरकार की ओर से खेती-किसानी पर पर्याप्त ध्यान न देने से किसान सरकार से नाराज हैं. यह हाल तब है जबकि किसान सबसे बड़े वोट बैंक माने जाते हैं. हालांकि आखिरी सवाल का जवाब जरूर सत्ताधारी पार्टी के लिए थोड़ी राहत की सांस देता है. मगर आखिरी सवाल के जवाब से पूर्ववर्ती सरकारों से किसानों की नाराजगी साफ दिखाई देती है.
2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से पता चलता है कि ग्रामीण महाराष्ट्र में भी बीजेपी-शिवसेना के गठबंधन ने तमाम बाधाओं से पार पाते हुए अच्छा प्रदर्शन किया है. सत्ताधारी बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को जहां 51 प्रतिशत वोट मिले, वहीं कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन महज 35 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाया.
सवाल उठता है कि आखिर कैसे एनडीए 2014 का प्रदर्शन न केवल दोहराने में सफल रहा, बल्कि इस बार तीन प्रतिशत और वोट मिले. अगर हम मतदान करने वाले किसानों और कृषि मजदूरों से जुड़े इंडिया टुडे-एक्सिस माई इंडिया के सर्वे पर गौर करें तो पता चलता है कि 52 प्रतिशत किसानों ने कांग्रेस-एनसीपी की जगह बीजेपी को वरीयता दी. वहीं 51 प्रतिशत कृषि मजदूरों ने बीजेपी को पसंद किया.
बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को भी चुनाव के वक्त यह पता हो चला था कि किसानों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं हैं. रैलियों में बीजेपी भले पिछली सरकार से अधिक उपज का मूल्य दिलाने की बातें करतीं रहीं मगर किसानों ने कहीं से यह जाहिर नहीं किया कि उन्हें सचमुच में उपज का उचित मूल्य अब मिल रहा है.
तो क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के लिए एक अलग नैरेटिव सेट करने और उनकी प्राथमिकताओं को भ्रमित करने के अपने भाषणों का उपयोग किया. 2014 में नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में किसानों की आय दोगुनी करने के वादे के साथ अच्छे दिनों के सपने बेचे थे.
उन्होंने उस दौरान याद दिलाया था कि दस साल शरद पवार के कृषि मंत्री रहने के बावजूद महाराष्ट्र के किसानों की जिंदगी में बदलाव नहीं हुआ. उस दौरान उन्होंने गुजरात के किसानों की कई सफलता की कहानियां बताते हुए कहा कि देश के अन्य हिस्सों के किसानों से वहां(गुजरात) के किसान अच्छी स्थिति में हैं. मगर 2019 के लोकसभा चुनाव के भाषणों में मोदी ने किसानों की जगह अन्य मुद्दों पर ज्यादा चर्चा की.
इंडिया टुडे टीम ने वर्धा में पीएम मोदी के 2014 और 2019 में दिए भाषण का विश्लेषण किया. पता चला कि 2014 में जहां उन्होंने 32 मिनट में से 18 मिनट किसानों पर फोकस किया, वहीं 2019 में बमुश्किल उन्होंने तीन से चार मिनट ही किसानों पर बात की और अन्य समय वह हिंदू आतंकवाद, राष्ट्रवाद और एयर स्ट्राइक के मुद्दे पर विपक्ष को घेरने में जुटे रहे. भले ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जमीन पर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की सफलता का जिक्र किया हो, मगर हकीकत में इसके कम लाभार्थी रहे.
इसी तरह समय-समय पर किसानों से जुड़ी समस्याओं को उठाने वाले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के सुर भी गठबंधन रैलियों में बदले नजर आए. उन्होंने उस रैली में हिंदुत्व पर 20 मिनट तक बोला. 2014 में जाति और धर्म से ऊपर उठकर किसानों ने बीजेपी को वोट दिया था. 2019 में भी किसानों ने जाति और धर्म से ऊपर उठकर वोट दिया, मगर क्या किसान के रूप में ही उन्होंने वोट दिया? माना जाता है कि 2018 में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत तथा 2017 में गुजरात में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के पीछे वहां मौजूद कृषि संकट को भुनाने की भूमिका रही.
मगर लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि कृषि संकट के मुद्दे को और ज्यादा समय तक भुनाया नहीं जा सकता. कांग्रेस-एनसीपी नेताओं ने चुनाव से पहले राज्य भर में संयुक्त आंदोलन किए थे, लेकिन प्रचार के दौरान राहुल गांधी के भाषणों में, राफेल को चार्ट में सबसे ऊपर रखा गया. राहुल गांधी ने यह जरूर बताया कि कांग्रेस की राज्य सरकारों ने कैसे दस दिनों के भीतर कर्जमाफी के वादे को पूरा किया. लेकिन सच कहा जाए तो जमीन पर कांग्रेस प्रभाव पैदा करने में विफल रही. यह संभवतः इस कारण से है कि मुझे अपने पांचवे प्रश्न के उत्तर के रूप में 'कोई नहीं' का जवाब मिला.
aajtak.in / साहिल जोशी