घोसीः कल्पनाथ राय की धरती पर छिड़ेगी BJP और SP-BSP में जोरदार जंग

घोसी के लोकसभा इतिहास की बात करें तो यह प्रदेश के उन चंद सीटों में शामिल है जहां कांग्रेस का कभी भी गढ़ नहीं रहा. कांग्रेस के टिकट पर कल्पनाथ राय 2 बार चुनाव जरूर जीते, लेकिन यहां पर चुनाव जीतने के लिए उनकी अपनी ही छवि ही काफी थी. बाद में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी उन्होंने चुनाव जीता था.

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घोसी संसदीय सीट से बीजेपी के सांसद हरिनारायण राजभर (फाइल-ट्विटर) घोसी संसदीय सीट से बीजेपी के सांसद हरिनारायण राजभर (फाइल-ट्विटर)

सुरेंद्र कुमार वर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 08 फरवरी 2019,
  • अपडेटेड 10:07 AM IST

उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों में से एक घोसी संसदीय क्षेत्र भी है, जिसका संसदीय क्षेत्र नंबर 70 है. घोसी मऊ जिले में पड़ता है. घोसी संसदीय सीट क्षेत्र के दिग्गज नेता कल्पनाथ राय के नाम से जानी जाती है. 90 के दशक में कल्पनाथ राय पूर्वांचल के दिग्गज नेताओं में गिने जाते थे. यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है जिस कारण मऊ को जिले का दर्जा मिला. उन्होंने घोसी से सांसद रहते हुए मऊ को जिला बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया और अपने मकसद में कामयाब रहे.

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राजनीतिक पृष्ठभूमि

घोसी के लोकसभा इतिहास की बात करें तो यह प्रदेश के उन चंद सीटों में शामिल है जहां कांग्रेस का कभी भी गढ़ नहीं रहा. कांग्रेस के टिकट पर कल्पनाथ राय 2 बार चुनाव जरूर जीते, लेकिन यहां पर चुनाव जीतने के लिए उनकी अपनी ही छवि ही काफी थी. बाद में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी उन्होंने चुनाव जीता था. 1957 के चुनाव में कांग्रेस को पहली जीत मिली. कहा जाए तो पूर्वांचल में वामपंथ का गढ़ घोसी सीट ही रहा है, जहां से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) का कई सालों तक कब्जा रहा. 1957 से अब तक 16 बार हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 4 बार जीत मिली, जबकि सीपीआई ने 5 बार जीत हासिल की है.

गोरखपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति करने वाले कल्पनाथ राय के नाम से इस सीट को पहचान मिली. कांग्रेस के टिकट पर कल्पनाथ राय ने पहली बार 1989 में जीत हासिल की थी, इसके बाद वह 1991, 1996 और 1998 में जीत कर लोकसभा पहुंचे. कांग्रेस से मनमुटाव होने के बाद 1996 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की. इसके बाद 1998 में समता पार्टी के टिकट पर चौथी बार लोकसभा पहुंचे. इसके अलावा 1974–80, 1980–86 और 1986 में राज्यसभा में कांग्रेस सांसद रहे. कांग्रेस राज में वह बार मंत्री भी रहे. नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल में वह खाद्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रहे और इस दौरान इन पर घोटाले के आरोप लगे. वह इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी मंत्री रहे.

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1999 में कल्पनाथ राय के निधन के बाद बसपा (1999), सपा (2004), 2009 (बसपा) और 2014 (बीजेपी) ने इस सीट से जीत हासिल की. 2014 में बीजेपी यहां से पहली बार जीत हासिल करने में कामयाब रही.

विधानसभा क्षेत्र का पिछला रिकॉर्ड

घोसी संसदीय क्षेत्र में 5 विधानसभा क्षेत्र (मधुबन, घोसी, मुहम्मदाबाद-गोहना, मऊ सदर और रसड़ा) आते हैं जिसमें सिर्फ मुहम्मदाबाद-गोहना सीट ही अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व है. मधुबन विधानसभा क्षेत्र पर भारतीय जनता पार्टी के दारा सिंह चौहान विधायक हैं, उन्होंने 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के अमरेश चंद को 29.415 मतों के अंतर से हराया था. बीजेपी ने यह सीट बसपा से छीनी थी. घोसी विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का कब्जा है. बीजेपी के प्रत्याशी फागू चौहान ने 2 साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के अब्बास अंसारी को 7,003 मतों के अंतर से हराया था.

घोसी संसदीय क्षेत्र में मुहम्मदाबाद-गोहना सीट ही एकमात्र रिजर्व विधानसभा सीट है. मुहम्मदाबाद-गोहना सीट से बीजेपी के श्रीराम सोनकर विधायक हैं. उन्होंने बसपा के राजेंद्र को बेहद कड़े मुकाबले में 538 वोटों से हराया था. मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में हर बार चुनाव कांटे का रहा है और हार-जीत का अंतर बेहद कम रहा है. मऊ सदर विधानसभा क्षेत्र से बाहुबली मुख्तार अंसारी विधायक हैं. उन्होंने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रत्याशी महेंद्र राजभर को 8,698 मतों के अंतर से हराया था. मुख्तार अंसारी पूर्वांचल के दबंगों में गिने जाते हैं. वह पांचवीं बार यहां से विधायक चुने गए हैं. रसड़ा विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी के उमाशंकर सिंह विधायक हैं.

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इस तरह से देखा जाए तो घोसी संसदीय सीट के 5 विधानसभा सीट में से 3 पर बीजेपी का कब्जा है, जबकि 2 पर बसपा ने जीत हासिल की हुई है.

सामाजिक तानाबाना

2011 जनगणना के आधार पर घोसी संसदीय क्षेत्र में आने वाली घोसी तहसील की बात की जाए तो यहां की आबादी 4.7 लाख है जिसमें 2.3 लाख लोग (50%) पुरुष हैं, जबकि महिलाओं की भी संख्या भी करीब-करीब यही है. इसमें से 77 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग के लोगों की है. इसके अलावा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी क्रमशः 21 फीसदी और 1 फीसदी है. घोसी में ज्यादातर आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है.

धर्म के आधार पर देखा जाए तो इस क्षेत्र में 87.29 फीसदी लोग हिंदू हैं तो 12.41 फीसदी लोग मुस्लिम समुदाय से हैं. 2011 के लिंगानुपात के आधार पर एक हजार पुरुषों की आबादी पर महिलाओं की संख्या 1,008 है. सामान्य वर्ग में लिंगानुपात 1,011 है. साक्षरता दर पर बात की जाए तो घोसी की साक्षरता 72 फीसदी है, जिसमें पुरुषों की 83 फीसदी और महिलाओं की 62 फीसदी आबादी शिक्षित है.

2014 का जनादेश

2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पहली बार इस सीट से जीत हासिल की. बीजेपी के उम्मीदवार हरिनारायण राजभर ने बसपा के दारा सिंह चौहान को हराकर अपनी पार्टी के लिए यहां से खाता खोला. पिछले लोकसभा चुनाव में यहां पर 18,91,112 इलेक्टोरल थे, जिसमें से 54.99 फीसदी (10,39,830) मतदाताओं ने अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग किया. चुनाव में 18 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई.

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हरिनारायण को इसमें से 36.53 फीसदी यानी 3,79797 वोट मिले, जबकि बसपा के दारा सिंह को 22,49 फीसदी (2,33,782) वोट मिले. हरिनारायण ने यह चुनाव 1,46,015 मतों के अंतर से जीता था. बाहुबली मुख्तार अंसारी तीसरे नंबर पर रहे. उन्हें 16 फीसदी यानी 1,66,443 मत मिले थे.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

घोसी संसदीय सीट से बीजेपी का खाता खुलवाने वाले हरिनारायण राजभर ने ज्यादा स्कूली शिक्षा हासिल नहीं की है. उन्होंने12वीं तक की शिक्षा हासिल की है. बलिया के तंगगुनिया में पैदा होने वाले हरिनारायण के परिवार में 8 बच्चे हैं, जिसमें 3 बेटे और 5 बेटियां हैं.

69 साल के सांसद हरिनारायण राजभर पहली बार लोकसभा पहुंचे हैं. वह साइंस एंड टेक्नोलॉजी, इनवायरमेंट एंड फॉरेस्ट स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य हैं. लोकसभा में उनकी उपस्थिति काफी अच्छी है. उनकी उपस्थिति 97 फीसदी रही है. लोकसभा के 16 सत्रों में से 11 बार उनकी उपस्थिति 100 फीसदी रही है. उन्होंने लोकसभा में 31 बहस में हिस्सा लिया. 8 जनवरी, 2019 तक चले संसद सत्रों में उन्होंने 158 सवाल पूछे. राजभर ने 1 बार अप्रैल 2015 में प्राइवेट मेंबर्स बिल (The Constitution (Scheduled Castes) Order (Amendment) Bill, 2015) भी पेश किया.

कल्पनाथ राय की संसदीय क्षेत्र के रूप में पहचान रखने वाली घोसी सीट पर इस बार कड़ा और रोमांचक मुकाबला होने के आसार हैं. सपा-बसपा का गठबंधन होने के बाद बीजेपी के सामने अपनी सीट बचाने की बड़ी चुनौती होगी.

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