कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर हर दिन अलग-अलग रंग और तस्वीरें सामने आ रही हैं. इन्हीं तस्वीरों के बीच एक वाकया देश की कॉफी कैपिटल कहे जाने वाले चिकमगलूर में भी हुआ. यहां कांग्रेस के टिकट पर बीएल शंकर चुनावी मैदान में हैं, जिन्होंने कभी कांग्रेस का अभेद्य किला कहे जाने वाले चिकमंगलूर में कांग्रेस को ही शिकस्त दी थी.
साठ के दशक से लेकर 90 के दशक तक चिकमगलूर कांग्रेस का गढ़ रहा. 1978 में आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो कांग्रेस पूरे देश में हारी यहां तक कि रायबरेली में भी वह अपनी कुर्सी नहीं बचा पाई. ऐसे मुश्किल दौर में भी कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उपचुनाव में जीत मिली थी. इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस के टिकट पर कई लोगों ने चुनाव लड़ा और चिकमंगलूर कांग्रेस का अभेद्य किला बन गया.
राहुल गांधी के साथ बीएल शंकर
साल 1996 में जनता दल सेक्युलर की ओर से कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ मैदान में बीएल शंकर उतरे और उन्होंने पहली बार कांग्रेस को हरा दिया. साल 1992 में बाबरी की घटना के बाद चिकमंगलूर में बाबा बुडन गिरी आंदोलन शुरू होने के बाद हिंदुत्व और संघ परिवार के घटक दल इलाके में हावी होने लगे थे. वहीं देवगौड़ा की अपनी छवि भी कांग्रेस पर भारी पड़ रही थी. इसी के चलते जेडीएस उम्मीदवार बीएल शंकर ने तब कांग्रेस का गढ़ धराशाई कर दिया और कांग्रेस से चिकमंगलूर की सीट छीन ली.
चिकमंगलूर लोकसभा सीटों के अंदर 5 विधानसभा आती हैं और जिसमें चिकमंगलूर शहर की विधानसभा सीट पिछले 15 साल से बीजेपी के सीटी रवि के खाते में जाती रही. रवि को बीजेपी ने चौथी बार चिकमंगलूर शहर की विधानसभा सीट से टिकट दिया है. लेकिन सबसे दिलचस्प तस्वीर इसी पर देखने को मिली है क्योंकि उसी कांग्रेस को जो 1996 में हराने वाले बीएल शंकर आज कांग्रेस के टिकट पर चिकमंगलूर शहर से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं.
साल 1996 में कांग्रेस को हराने के बाद 1998 में शंकर ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था. चिकमंगलूर से चुनाव लड़ने के सवाल पर शंकर ने कहा की वह सेक्युलर विचारधारा के चलते कांग्रेस में लौटे हैं. उनका कहना है कि वह कांग्रेस की मजबूती और खामियां भी जानते हैं साथ ही जनता परिवार की ताकत और कमजोरी भी जानते हैं. यही वजह कि वो एक बार फिर से चिकमंगलूर में कांग्रेस का गढ़ बचाने मैदान में उतरे हैं.
आशुतोष मिश्रा