झारखंड के चुनाव ने केवल बीजेपी को ही नहीं झटका दिया बल्कि बिहार में उसके सहयोगी जेडीयू और एलजेपी को भी करारा झटका लगा है. हालांकि बिहार में एकजुट ये तीनों पार्टियां झारखंड में अलग-अलग चुनाव लड़ीं. लेकिन नतीजा क्या हुआ, बीजेपी को छोड़कर जेडीयू और एलजेपी एक फीसदी वोट नहीं पा सकी जबकि दावा अपने बूते पर सरकार बनाने का था.
यही नहीं बीजेपी का भी ऐसा ही दावा था, लेकिन वो गठबंधन के एकजुटता के सामने चित हो गई. अब बिहार में महागठबंधन के हौसले बुलंद हैं. लोकसभा में करारी हार के बाद झारखंड की ये जीत उनके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है.
65 पार का नारा पड़ा फीका
बीजेपी पहली बार झारखंड में अकेले चुनाव लड़ी थी. इसको एक प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा था, ताकि उसका इस्तेमाल बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव में किया जा सके, लेकिन बीजेपी इस प्रयोग में फेल हो गया. अब बिहार में शायद ही वो अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ने की सोचे.
हालांकि यह सोच लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए को मिली सफलता की वजह से बनी. जहां कुल 40 सीटों में से 39 सीटों पर एनडीए का कब्जा रहा. वैसे झारखंड के 14 लोकसभा सीटों में से 12 सीटें बीजेपी ने जीती थी और तभी 65 पार का नारा भी लगा था, लेकिन विधानसभा चुनाव में ये सारे आंकड़े धरे के धरे रह गए.
जेडीयू को मिले महज 0.80 फीसदी वोट
बिहार में बीजेपी के सहयोगी जेडीयू और एलजेपी ने भी झारखंड के चुनाव में अपने हाथ आजमाए, लेकिन हाथ कुछ नहीं आया और लगभग सभी उम्मीदवारों को अपनी-अपनी जमानत गंवानी पड़ी.
झारखंड में जेडीयू ने 47 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चुनाव प्रचार में नहीं गए लेकिन उनके तमाम नेता मंत्री महीनों तक झारखंड में कैम्प करते रहे. वहीं पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव आरसीपी सिंह सांसद ललन सिंह तो लगातार पसीना बहाते रहे, लेकिन झारखंड ने जेडीयू को पूरी तरह से नकार दिया. जेडीयू को महज 0.80 फीसदी वोट मिले. यही हाल दूसरे सहयोगी एलजेपी का भी रहा.
रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी ने झारखंड में बीजेपी से सम्मानजनक सीट मांग रही थी. लेकिन बीजेपी ने जब एलजेपी की मांग को खारिज कर दिया तब एलजेपी के नए अध्यक्ष चिराग पासवान ने झारखंड के पचासों सीट पर अपने उम्मीदवार उतार दिए, लेकिन चुनाव परिणाम ऐसे आए कि उसे 0.27 फीसदी वोट पर संतोष करना पड़ा. यानि एलजेपी को जेडीयू से भी कम वोट मिले.
सुजीत झा