समुद्र मंथन की कहानी लगभग सभी लोगों ने सुनी होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि समुद्र मंथन में इस्तेमाल मंदार पर्वत कहां है? ज्यादातर लोगों को इसका जवाब नहीं पता होगा. होगा भी तो कैसे, इस पौराणिक पर्वत के बारे में कभी ढंग से प्रचार-प्रसार हुआ ही नहीं. ऐसा नहीं है कि यहां पर्यटकों के लिए काम हुए ही नहीं हैं, लेकिन जिस महत्व का ये स्थल है, उस हिसाब से इसे पर्यटन के नक्शे पर अब तक पहचान नहीं मिली. ये जगह आज भी विकास की बाट जोह रहा है.
बिहार तक की टीम ने देखी सच्चाई
चुनाव के दौरान बिहार तक की टीम बांका जिले में इस धार्मिक महत्व वाले स्थल तक पहुंची. टीम ने पाया कि यहां पिछले कुछ सालों से चल रहा पापहरिणी तालाब से लेकर मंदार पर्वत शिखर तक के रोप-पे का काम अब तक पूरा नहीं हुआ. श्रद्धालुओं के बैठने के लिए यहां 100 बेंच भी आए हैं लेकिन अब तक लगे नहीं हैं. यहां पर्यटन विभाग का एक रेस्टोरेंट भी बना है जो अब तक शुरू नहीं हुआ. यहां बहुत सी बुनियादी सुविधाओं की कमी है, जिस पर अब तक काम नहीं हुआ है.
अद्भुत है ये स्थान
भागलपुर से देवघर जाने वाले हाइवे पर बांका जिले में बौंसी एरिया में मंदार पर्वत पड़ता है. पुराणों में इस पर्वत का उल्लेख समुद्र मंथन के दौरान मिलता है. यहां स्थित विष्णु नारायण मंदिर के पुजारी पं. रतन झा ने बिहार तक की टीम को बताया कि मकर संक्रांति के दिन यहां वृहद मेला लगता है. मान्यता है कि पर्वत के नीचे दबे राक्षस मधु से मिलने के लिए भगवान विष्णु उस दिन आते हैं. ऐसे तो पूरे साल ही यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है.
किसी की प्राथमिकता में नहीं ये स्थान
स्थानीय लोगों के मुताबिक ये स्थान हिंदुओं के अलावा जैन धर्म और सफा धर्म के लोगों के लिए बेहद खास है. बावजूद ये किसी भी सरकार की प्राथमिकता में नहीं रहा. लम्बे से चली आ रही मांग के बाद 2018 में यहां के मंदार महोत्सव को राजकीय मेले का दर्जा मिला है.
विशेषताओं से भरा पड़ा है मंदार पर्वत
- पौराणिक स्थल होने के बावजूद मंदार पर्वत तीर्थ का नहीं हुआ अच्छी तरह से प्रचार प्रसार
- बहुत ही पौराणिक,रमणीक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है ये स्थान
- प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति पर लगता है यहां मंदार महोत्सव का मेला
- लंबी मांग के बाद 2018 में मंदार महोत्सव को मिला राजकीय मेला का दर्जा
- हिंदुओं के अलावा जैन और सफा धर्मावलंबियों के लिए बेहद खास है ये जगह
- यहीं एक पहाड़ी पर है, जो जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर बासुपूर्व की है निर्वाण स्थली
- सफा धर्मावलंबियों का भी है यहां मंदिर, स्थानीय जनजातीय लोगों की उमड़ती है भीड़
- यहां के पापहरिणी तालाब में स्नान से सभी पाप धुल जाने की है मान्यता
- यहां के सीता कुंड, शंख कुंड और पाताल कुंड की भी है अलग-अलग मान्यता
- पर्यटकों के लिए बन रहा है रोप-वे लेकिन अबतक पूरा नहीं हुआ है काम
- बुनियादी सुविधाओं का है अभाव, पर्यटन के लिए यहां अनंत संभावनाएं हैं.
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