जानिए क्‍यों खास है लेडी श्रीराम कॉलेज

लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर विमेन में ह्यूमेनिटीज की पढ़ाई कॉलेज के माहौल, विविधता के सम्मान और बदलाव की वाहक शक्ति होने की जरूरत के साथ जुड़ी है.

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सितार का अभ्‍यास करती स्‍टूडेंट सितार का अभ्‍यास करती स्‍टूडेंट

उर्सिला अली

  • नई दिल्ली,
  • 01 जून 2016,
  • अपडेटेड 2:55 PM IST

जब 10 मई को लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के नतीजे आए तो शीर्ष पर एक ऐसे उम्मीदवार का नाम था, जिसे लेकर अचानक मीडिया में हलचल मच गई. लेडी श्रीराम कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में बीए कर चुकी 22 वर्षीया टीना डाबी ने पहली ही बार में यह परीक्षा पास कर ली थी. परीक्षा नतीजे आते ही उनके पास साक्षात्कार लेने वालों की लंबी कतार लग गई. सब लोग यही जानना चाहते थे कि आखिर ऐसा कैसे संभव हुआ.

डाबी एक सशक्त शिक्षा तंत्र की उपज हैं. ऐसा सशक्त शिक्षातंत्र, जहां ऐसे नेतृत्व का निर्माण होता है, जो अपने आसपास की चीजों को लेकर संवेदनशील हो और इतना जागरूक हो कि अपने समाज की बेहतरी के लिए सही फैसले ले सके. जैसा उन्होंने कई मीडिया संस्थानों और अखबारों को बताया, उन्हें यहां तक लाने में उस शिक्षा तंत्र की बड़ी भूमिका रही है. इसी एलएसआर में 19 वर्षीया अक्षिता सिंह बीए हिंदी ऑनर्स सेकंड ईयर की परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं और पीजी की पढ़ाई पॉलिटिकल साइंस से करना चाहती हैं. वे कहती हैं कि भविष्य में जब वे यूपीएससी की परीक्षा देंगी तो ये दोनों विषय उनके लिए मजबूत नींव का काम करेंगे.

इसी कॉलेज में फिलॉसफी की द्वितीय वर्ष की छात्रा रुक्मिणी पारीक कहती हैं, ‘‘विज्ञान ज्यादा टेक्निकल होता है, लेकिन उसके उलट ह्यूमेनिटीज में सिद्धांत और अवधारणाएं होती हैं, जिनसे आप खुद को जोड़ सकते हैं.’’ संयोग से पारीक भी आइएएस अफसर बनने की तैयारी कर रही हैं. सोशियोलॉजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अंजलि भाटिया कहती हैं कि इसे आप टीना डाबी का प्रभाव कह सकते हैं, लेकिन बड़े हित के लिए खुद को समर्पित करने का यह उत्साह दरअसल ‘‘लेडी श्रीराम कॉलेज के माहौल को ही प्रतिबिंबित करता है.’’

कॉलेज में सोशियोलॉजी के साथ हिस्ट्री, पॉलिटिकल साइंस और इकोनॉमिक्स सबसे लोकप्रिय विषय हैं. यहां कुल 15 विभाग हैं, जिनमें 10 ह्यूमेनिटीज को समर्पित हैं. डॉ. भाटिया के मुताबिक, सोशियोलॉजी की लोकप्रियता के पीछे की वजह ‘‘विविधता और मतभेदों के प्रति सम्मान है.’’ एलएसआर के इन कोर्सों में नया चॉयस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (सीबीसीएस) लागू है, जिसे दिल्ली यूनिवर्सिटी में भी अपनाया जाता है. यहां हर बैच में 30 छात्र हैं. पिछले साल इतिहास के एक बैच में 75 छात्र थे. इस कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर देबात्रि भट्टाचार्य कहती हैं, ‘‘हम इस कॉलेज में अभिजात्यों का इतिहास नहीं पढ़ाते.’’ वे यहां पिछले 32 साल से इतिहास पढ़ा रही हैं. वे कहती हैं, ‘‘यहां इतिहास में लैंगिकता, धर्म और विचार की राजनीति भी शामिल है, जो स्वस्थ बहस की संभावनाओं को जन्म देती है और इतिहास की मुख्यधारा से इतर हाशिए पर ढकेल दिए गए लोगों की राजनीति को भी समझने में मदद करती है.’’
एलएसआर मुख्य रूप से लिबरल आर्ट्स के क्षेत्र में अपने विशिष्ट योगदान के लिए जाना जाता है. इस कॉलेज से बहुत-सी महत्वपूर्ण श​ख्सियतें पढ़कर निकली हैं. जैसे मशहूर शिक्षाविद निवेदिता मेनन एलएसआर से ही निकली हैं. इसके अलावा आरबीआइ की पूर्व डिप्टी गवर्नर उषा थोराट और गीता चंद्रन जैसी प्रतिभाएं भी इसी कॉलेज ने दी हैं. यहां की प्रिंसिपल डॉ. सुमन शर्मा कहती हैं, ‘‘यहां हमारी कोशिश श्रेष्ठता को हासिल करने की होती है. कॉलेज की हर लड़की को न केवल अकादमिक विषयों और इतर क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, बल्कि सामाजिक रूप से एक जिम्मेदार नागरिक और बदलाव की वाहक शक्ति भी बनाया जाता है.’’ शायद यही वजह है कि इस संस्थान ने देश की सबसे प्रखर नारीवादियों को पैदा किया है.

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