राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 आने के बाद से ही विभिन्न वजहों से देश भर में चर्चा के केंद्र में है. दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु का तीन भाषाओं के फॉर्मूले पर सवाल हो या इसी दौरान कोरोना महामारी की वजह से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और राज्यों के बीच अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट की फाइनल परीक्षाएं कराने का विवाद, हर मुद्दा बहस का विषय बना है. हालांकि, अब भी इसके कई पहलुओं पर बातचीत नहीं हो सकी है. शिक्षा नीति किसी भी देश के भविष्य को तैयार करने का सबसे अहम पड़ाव होती है. यह किस राजनीतिक और आर्थिक माहौल में तैयार की गई है, इस पर विचार करना भी काफी अहम होता है. शिक्षा नीति को चाहिए कि उसमें न केवल देश के संवैधानिक मूल्य शामिल रहें, बल्कि वह एक जागरूक और आधुनिक पीढ़ी तैयार करने के साथ ही सामाजिक कुरीतियों को भी दूर करे. आइए जानने की कोशश करते हैं कि नई शिक्षा नीति में इन पहलुओं का कितना ध्यान रखा गया है.
शिक्षा नीति में भारतीय संस्कृति से क्या आशय?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्री-प्राइमरी एजुकेशन पर काफी जोर दिया गया है. शिक्षा नीति की भूमिका में ही लिखा है कि प्री-प्राइमरी एजुकेशन में छात्रों को भारतीय समाज, संस्कृति, माहौल की जानकारी दी जाएगी. देश में शिक्षा के क्षेत्र में दशकों से कार्यरत और पुरस्कृत शिक्षाविद डॉ. अनिल सदगोपाल कहते हैं कि इसमें आर्यभट्ट से लेकर चाणक्य का जिक्र तो है लेकिन उसी समय वैकल्पिक ज्ञान मीमांसा तैयार करने वाले और जातिगत भेदभावों पर सवाल करने वाले गौतम बुद्ध और महावीर जैन की सवाल करने वाली शैक्षणिक पद्धति का जिक्र नहीं है. यही नहीं, चार्वाक के भौतिकवादी दर्शन का भी इसमें कोई उल्लेख नहीं है. ये सभी भारतीय शैक्षणिक पद्धति के अहम पड़ाव रहे हैं. इसलिए मुद्दा यह है कि अगर इन्हें भारतीय संस्कृति से निकाल दिया जाए तो उसमें हमेशा से शीर्ष पर रहे मुट्ठी भर तबके के मनमुताबिक चीजें रह जाएंगी.
कौन होंगे स्वयंसेवक, समाजसेवी और काउंसलर?
एक अनुमान के मुताबिक देश में प्री-प्राइमरी एजुकेशन में करीब 20 करोड़ विद्यार्थी हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्री-प्राइमरी एजुकेशन के लिए लार्ज स्केल पर मिशन चलाने की बात कही गई है. साथ ही कहा गया है कि इसके लिए काफी लोगों की जरूरत होगी. हालांकि इसमें नियमित शिक्षकों को रखने की बजाए यह कहा गया है कि मिशन के लिए स्वयंसेवक, काउंसलर या सामाजिक कार्यकर्ता चाहिए होंगे. इसमें यह भी कहा गया है कि ब्लॉक हेडक्वार्टर में स्कूलों की मदद स्वयंसेवी संस्थाएं करेंगी. यह साफ नहीं है कि ये स्वयंसेवी कौन होंगे और ये स्वयंसेवी संस्थाएं कौन सी होंगी?
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शिक्षा नीति में भाषा को लेकर विरोधाभासी बातें
नई शिक्षा नीति में भाषा को लेकर विरोधाभासी बातें कही गई हैं. इसमें कहा गया है कि उच्च शिक्षा का ज्ञान संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज 22 भाषाओं में दिया जाएगा. लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि उच्च शिक्षा की प्रवेश परीक्षाएं केवल अंग्रेजी भाषा में ली जाएंगी. अंग्रेजी भाषा पर खासा जोर दिया गया है जबकि भारत में आधे से एक फीसदी लोगों के घरों में ही अंग्रेजी भाषा चलन में है. डॉ. अनिल कहते हैं कि अंग्रेजी भाषा को लेकर तमाम शिक्षाविदों और दुनिया भर में अंग्रेजी सिखाने वाली ब्रिटिश काउंसिल ने (2017 की रिपोर्ट में) माना है कि अच्छी अंग्रेजी सीखने के लिए गणित, सामाजिक विज्ञान, साहित्य यानी पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए. पढ़ाई के माध्यम को मातृभाषा में रखना ठीक है, पर प्रवेश परीक्षा अंग्रेजी में कराना कैसे उचित है?
वर्ल्ड क्लास और क्वालिटी एजुकेशन से क्या मतलब?
1 मई 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा नीति की समीक्षा के बाद कहा था कि नई शिक्षा नीति का केंद्र बिंदु ऑनलाइन शिक्षा होगी. डॉ. अनिल सदगोपाल कहते हैं कि शिक्षा नीति में जो लिखा होता है, वह कभी महत्वपूर्ण नहीं होता है. शिक्षा नीति में वह महत्वपूर्ण होता है जो अनकहा होता है. उसे समझने की जरूरत है. इंटरनेशनल मार्केट की अभी आई रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले चार सालों में ऑनलाइन एजुकेशन का बिजनेस 15 बिलियन डॉलर का होगा. प्राइवेट प्लेयर्स की नजर इस पर है. पीएम मोदी ने अपने संबोधन में यह भी कहा था कि हम क्वालिटी और वर्ल्ड क्लास एजुकेशन देंगे. डॉ.अनिल कहते हैं कि हमें यह भी समझना होगा कि वर्ल्ड क्लास से उनका मतलब क्या है? साथ ही यह भी समझना होगा कि अगर किसी देश की शिक्षा अगर एक संवेदनशील इंसान तैयार नहीं करती है तो क्या वह वाकई वर्ल्ड क्लास है?
अंग्रेजों ने भी कहा था- दे दी है क्वालिटी एजुकेशन
शिक्षा में क्वालिटी लाने के सपने आज से नहीं दिखाए जा रहे हैं. 1930 के दशक में अंग्रेजों ने भी कहा था कि उन्होंने भारत में तमाम विश्वविद्यालय खड़े कर दिए हैं और क्वालिटी एजुकेशन दे दी है. लेकिन 1936 में गांधी ने उस शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठाया था और कहा कि यह शिक्षा हमारे समाज या देश किसी के भी पक्ष में नहीं है. उससे भी पहले, 1928 में भगत सिंह ने अपने छात्रजीवन में ही 'विद्यार्थी और राजनीति' नामक लेख लिखकर समूची शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे. भगत सिंह ने जो सवाल किए थे, वह आज भी उनके लिए जवाब हैं जो कहते हैं कि छात्रों को केवल पढ़ाई की बात करनी चाहिए.
जब भगत सिंह ने खड़े किए थे शिक्षा पर सवाल!
बात तब की है जब भगत सिंह लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे. तब भी आज की तरह छात्र जरूरी समस्याओं पर आंदोलित होते थे और कॉलेज के प्राचार्य और अध्यापक उनसे कहते थे कि आपको राजनीति न करके सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए. भगत सिंह ने इसके जवाब में 'विद्यार्थी और राजनीति' शीर्षक से एक लेख लिखा था कि अगर हमारी पढ़ाई हमें देश की समस्याएं, इसके उपाय, इससे निपटने की तैयारी करवाने या फिर हमें हमारी कोई भूमिका नहीं बता पा रही है तो यह फिजूल है.
क्यों निकाली जाती है टॉप यूनिवर्सिटी की लिस्ट?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्ल्ड क्लास एजुकेशन के साथ कई जगहों पर देश के विश्वविद्यालयों को टॉप-100 विश्वविद्यालयों में लाने की बात कही गई है. हर साल दुनिया भर के टॉप-100, टॉप-200, टॉप-500 विश्वविद्यालयों की रैंकिंग लिस्ट आती है. डॉ. अनिल सदगोपाल कहते हैं कि इस बारे में कभी बात नहीं की जाती है कि टॉप विश्वविद्यालयों की लिस्ट को कौन तैयार करता है और इसे तैयार करने का मकसद क्या होता है! इस लिस्ट को बनाने के लिए क्या मापदंड अपनाए जाते हैं? वह आगे खुद ही कहते हैं कि सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि इस लिस्ट को तैयार करने वालों में अकादमिक लोग या शिक्षाविद शामिल नहीं होते. यह काम बड़ी-बड़ी मार्केटिंग एजेंसियां करती हैं, जिनके शेयर न्यूयॉर्क और लंदन स्टॉक एक्सचेंज में खरीदे-बेचे जाते हैं. वह आगे कहते हैं, यह भी जान लीजिए कि इस लिस्ट के लिए क्या सवाल पूछे जाते हैं- आपके यहां कितने विदेशी छात्र और कितने विदेशी प्रोफेसर हैं? कितने छात्रों ने बैंक या मार्केट से लोन लिया हुआ है? शिक्षकों को कितना वेतन मिलता है? कितने छात्रों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी मिलती है और कितनी सैलरी पर मिलती है? इनमें से एक भी सवाल हमारे संविधान के मानदंडों से नहीं निकलता है. इसलिए भगत सिंह की भाषा में कहें तो न केवल ये सारे सवाल फिजूल हैं, बल्कि इत तरह का वर्ल्ड क्लास होना भी फिजूल है. इन सवालों से यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि शिक्षा की गुणवत्ता कैसी है, बल्कि यह जानने की कोशिश होती है कि इस शिक्षा की बाजार में क्या भागीदारी है और क्या योगदान रहने वाला है?
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शाहीन बाग जैसे आंदोलनों से बनता है दबाव
डॉ. सदगोपाल आगे कहते हैं कि संविधान के मानदंड तलाशने के लिए बहुत माथापच्ची करने की जरूरत नहीं है. ये मानदंड संविधान की चंद लाइनों की प्रस्तावना से निकलते हैं. वह आगे कहते हैं कि शिक्षा नीति के लिए यह काफी सकारात्मक रहा कि उसका मसौदा बनते समय शाहीन बाग जैसा आंदोलन चल रहा था. यह आंदोलन देश भर में संविधान की प्रस्तावना को फिर से चर्चाओं के केंद्र में ले आया, जब युवाओं ने कई बार संविधान की प्रस्तावना पढ़ी. यही वजह है कि जहां दिसंबर 2019 तक शिक्षा नीति के पांचवें मसौदे में भारतीय संविधान की प्रस्तावना को शामिल नहीं किया गया था. लेकिन शाहीन बाग जैसे आंदोलन के बाद जुलाई 2020 में इसके छठे मसौदे में संविधान की प्रस्तावना को भी शामिल कर लिया गया.
'दुनिया हमसे सीख रही और हम बाहर देख रहे'
शिक्षा नीति के संदर्भ में ही 24 जून 2020 को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वर्ल्ड बैंक के साथ एक करार किया. वर्ल्ड बैंक को इस करार के लिए तीसरी बार भारत बुलाया गया था. इसमें Strengthening Teacher-Learning and Results for States (STARS) कार्यक्रम को अपनाने के लिए हस्ताक्षर हुए. इसमें ये है कि प्री-प्राइमरी से लेकर 12वीं तक की शिक्षा वर्ल्ड बैंक की शर्तों के अनुसार चलेगी. इससे पहले भी वर्ल्ड बैंक ने दो बार भारत में ऐसे समझौते किए हैं, जब उन्होंने प्राइमरी शिक्षा के बजट के 100 रुपये में से महज 1.38 रुपये का लोन देकर भारत में शिक्षा के पाठ्यक्रम से लेकर शिक्षकों की भर्ती तक सभी शर्तें अपने हिसाब से बदल दी थीं. जबकि हमारे देश में केरल का ही उदाहरण है जहां की साक्षरता की दर करीब 100 फीसदी है. यहां की शिक्षा प्रणाली के मजबूत मॉडल का उदाहरण दुनिया भर में दिया जाता है. लेकिन इससे सीखने और इस मॉडल को अन्य राज्यों में लागू करने की बजाए हमने वर्ल्ड बैंक की शर्तों के आधार पर पाठ्यक्रम लागू करने का रास्ता चुना है.
UGC का फैसला संविधान सम्मत नहीं
कोरोना महामारी और नई शिक्षा नीति लगभग एक ही समय में आए. ठीक इसी समय UGC के जरिए केंद्र सरकार का संविधान की मूल भावना के खिलाफ रवैया भी देखने को मिला. देश के आठ राज्यों ने कोरोना को देखते हुए अपने विश्वविद्यालयों में फाइनल सेमेस्टर की परीक्षा न करवाने की घोषणा की तो 7 जुलाई को UGC ने ऑनलाइन परीक्षाएं कराने का आदेश दे दिया. डॉ. अनिल कहते हैं कि संविधान के पहले अनुच्छेद 1(1) में ही साफ कहा गया है कि भारत राज्यों का संघ होगा. यानी भारत अपने आप में कुछ नहीं है. यह संघों यानी राज्यों से मिलकर बना है. 25 नवंबर 1949 को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी संविधान सभा में यही कहा था कि हम सबने कानून के विषयों की तीन अलग-अलग सूचियां बनाकर व्यवस्था कर दी है कि राज्यसत्ता का केंद्रीकरण नहीं हो पाएगा. इसके अलावा, देश की सबसे ज्यादा चर्चित कानूनी लड़ाइयों में शामिल 1973 में केशवानंद भारती केस में 13 जजों की सबसे बड़ी संवैधानिक बेंच ने भी यही टिप्पणी की थी कि भारत की संघीय रचना ही संविधान का मूल चरित्र है. ऐसे में जब आठ राज्यों ने कहा कि कोरोना महामारी के दौर में छात्र मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक परेशानियों के चलते परीक्षा देने में सक्षम नहीं हैं तो UGC को इतनी मूलभूत और मानवीय जरूरत भी समझ नहीं आई और न ही उसने इन राज्यों के फैसले का सम्मान किया.
नई शिक्षा नीति में समाज को पीछे धकेलने का खतरा
शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने वाली कस्तूरी रंगन समिति ने 2019 में नई शिक्षा नीति के चौथे ड्राफ्ट में तीन जगह लिखा था कि छह साल से कम उम्र और 14 साल से ज्यादा उम्र यानी कक्षा एक से पहले और कक्षा आठ से बाद के छात्रों को भी शिक्षा के अधिकार के दायरे में शामिल किया जाएगा. लेकिन इसका छठा ड्राफ्ट बनते-बनते इस लाइन को हटा दिया गया. डॉ.अनिल कहते हैं कि इसकी वजह सरकारी शिक्षा के दायरे को बढ़ने से रोकना है ताकि यह भी प्राइवेट प्लेयर्स को फायदा देने वाला क्षेत्र बन सके. इसके अलावा नई शिक्षा नीति में एक और अहम चीज है. इसमें वोकेशनल कोर्स के नाम पर 11 साल के बच्चों से भी इंटर्नशिप कराने की बात कही गई है. जिन देशों में यह मॉडल लागू है वहां पर पिछड़े परिवेश से आने वाले छात्रों को यह कहकर ऐसे केंद्रों में भेजा जाता है कि उन्हें फेल करने की बजाए ऐसी ट्रेनिंग दे दी जाए ताकि वे किसी रोजगार में दक्ष हो सकें.
लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि जिन बच्चों के परिजन शिक्षित नहीं रहे हैं, उनके ही बच्चे ऐसे केंद्रों में जाकर कम आय वर्ग और जातिगत पेशों में ही फंसे रह जाते हैं. भारतीय समाज में इस स्तर के रोजगार अब भी जातिगत पेशों से जुड़े हैं. यानी इस शिक्षा नीति को चाहिए तो था कि वह समाज को जाति के ढांचे से बाहर निकाले, उन लोगों को पढ़ने का मौका दे, जिनकी पुरानी पीढ़ियों ने स्कूली शिक्षा का मुंह नहीं देखा है. अब नई शिक्षा नीति न केवल पेशों के माध्यम से जातिगत ढांचों को और मजबूत करेगी बल्कि देश की बड़ी आबादी को स्कूलों और उच्च शिक्षा से दूर ही रखेगी. इस घटनाक्रम का एक अहम पहलू यह भी है कि केंद्र सरकार ने 2016 में ही यह प्रावधान कर दिया गया था कि अगर 14 साल से कम उम्र के बच्चे जातिगत पेशों का काम करते हैं तो इसे बालश्रम के तहत अपराध नहीं माना जाएगा. इन सभी घटनाक्रमों से यह आशंका बढ़ गई है कि इससे आने वाली पीढ़ियां भी जातिगत पेशों और गरीबी के मकड़जाल में कैद रहेंगी.
'हथियार की तरह इस्तेमाल होती है शिक्षा नीति'
नई शिक्षा नीति पर वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया कहते हैं कि शिक्षा नीति इतनी सामान्य चीज नहीं है. इस पर समाज के सभी वर्गों को ध्यान देना चाहिए. इस पर लगातार बहस और चिंतन होना चाहिए. शिक्षा आने वाली पीढ़ियों को तैयार करती है. इसे दो-तीन सौ साल आगे के बारे में सोचकर तैयार किया जाता है. इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और किया भी जाता रहा है. वह कहते हैं कि पहली शिक्षा नीति तब आई थी जब 1960 के दशक में 9 राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी. उन सरकारों में बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर जैसे निचले तबके के नेताओं का कद काफी बढ़ गया था. निचले तबके से आने वाले लोगों का जब कद बढ़ जाता है तो समाज में हलचल होती है. इसी को रोकने के लिए शिक्षा नीति लाई गई थी. दूसरी बार शिक्षा नीति 1986 में आई, जब पंजाब में सिखों के खिलाफ बड़ा अभियान चला था. वह कहते हैं कि तब हमारे समाज में हिंदुत्व का उभार सबसे तेजी से हुआ था. तीसरी बार जिस माहौल में शिक्षा नीति आई है, वह आज की पीढ़ी के सामने है. अनिल चमड़िया आगे कहते हैं कि सत्ता प्रतिष्ठान इस बात को अच्छे से समझते हैं कि अगर समाज में चेतना विकसित हो रही है, तो इसे कैसे रोकना है, कब औ कहां पर ब्रेक लगाना है और शिक्षा नीति को वे इस मकसद में हथियार बनाते रहे हैं. इसलिए समाज के सभी जागरूक लोगों को इस पर ज्यादा से ज्यादा चर्चा करनी चाहिए.
भारत सिंह