जंग से ज्यादा खतरनाक होती है 'जंग की सनक', समझ‍िए क्या है वार हिस्टेरिया जो अभी भी है द‍िमाग पर हावी

सिगमंड फ्रायड ने अपनी किताब Civilization and Its Discontents में कहा था कि इंसान के अंदर गुस्सा और हिंसा की आग हमेशा सुलगती रहती है. जब कोई खतरा सामने आता है जैसे कि आतंकी हमला तो ये आग भड़क उठती है. लोग डरते हैं, आक्रोश और गुस्से से भर जाते हैं एकजुट होकर दुश्मन को खत्म करने की बात करने लगते हैं.

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what is war hysteria (Representational Image by AI) what is war hysteria (Representational Image by AI)

मानसी मिश्रा

  • नई दिल्ली ,
  • 12 मई 2025,
  • अपडेटेड 4:03 PM IST

दुश्मन को सबक सिखाओ...हमारी सेना तैयार है...पहलगाम आतंकी हमले के बाद से ही ऐसी प्रतिक्रियाएं हर तरफ नजर आ रही थीं. टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर यही नारे गूंज रहे थे. फिर भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान के 9 आतंकी ठ‍िकाने ध्वस्त कर दिए. जवाबी कार्रवाई कीऔर दूसरी तरफ से भी पलटवार हुआ. इसके बाद दोनों देशों में युद्ध का ऐसा माहौल बना मानो जंग शुरू हो चुकी हो. 

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इस दौरान एक जंग सीमा पर लड़ी जा रही थी तो दूसरी आम नागरिकों के द‍िमाग में चलने लगी थी. युद्ध की तैयारियों से पहले ही दिल दिमाग पर युद्ध का उन्माद छा जाना ही वार हिस्टेरिया की श्रेणी में आता है. जब गोली चलने से पहले टीवी स्टूडियो में बंदूकें तन जाती हैं, सोशल मीडिया पर लोग खेमों में बंट जाते हैं और आम इंसान 'राष्ट्रभक्त' या 'देशद्रोही' जैसे तमगों से नवाजे जाने लगते हैं. जब देशभर में एक अघोषित युद्ध का माहौल बन गया था. ऐसे में अचानक दोनों देशों ने 'सीजफायर' का ऐलान कर दिया, तब भी वो उन्माद एकाएक ठंडा नहीं पड़ा. सवाल उठता है, कि क्या यह सिर्फ देशभक्ति है या कुछ और? आइए, इसे समझते हैं. 

क्या होता है वॉर हिस्टेरिया 
वॉर हिस्टेरिया यानी युद्ध का उन्माद, वो भावनात्मक तूफान है जो युद्ध की आशंका या शुरुआत के साथ समाज में फैलता है. ये सिर्फ सैनिकों या हथियारों की बात नहीं. ये वो माहौल है जब पूरा देश 'हम बनाम वो' की सोच में डूब जाता है. इसमें दुश्मन को खतरनाक और अपने देश को सही ठहराया जाता है. लोग तर्क भूलकर गुस्से और डर में बहने लगते हैं. टीवी पर चीखते एंकर, सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट और गली की बहसें सब इसी उन्माद का हिस्सा हैं. हाल के भारत-पाक तनाव में दोनों देशों में ये साफ देखा जा सकता है. 

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उदाहरण के लिए कश्मीर के पहलगाम में हमले के बाद न्यूज चैनलों ने दिन-रात खबरें चलाईं. इसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के बाद कई मीड‍िया प्लेटफार्म ने बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए कि कैसे दुश्मन के कई ठिकाने तबाह हो गए. दूसरी तरफ, पड़ोसी देश का मीडिया भी भारत के ख‍िलाफ सत्यापन के बिना नेगेट‍िव खबरें द‍िखाकर अपनी जनता को भड़का रहा था. दोनों देशों में लोग सड़कों पर उतरे, सेना का समर्थन किया और सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मच गई. ये ऐसा वॉर हिस्टेरिया है जो मैदान में जंग शुरू होने से पहले दिमाग में जंग छेड़ देता है. 

जानिए- वार हिस्टेर‍िया का दर्शन
वॉर हिस्टेरिया को समझने के लिए हमें इंसान के दिमाग में झांकना होगा. मशहूर मनो व‍िश्लेषक सिगमंड फ्रायड ने अपनी किताब Civilization and Its Discontents में कहा था कि इंसान के अंदर गुस्सा और हिंसा की आग हमेशा सुलगती रहती है. जब कोई खतरा सामने आता है जैसे कि आतंकी हमला तो ये आग भड़क उठती है. लोग डरते हैं, आक्रोश और गुस्से से भर जाते हैं एकजुट होकर दुश्मन को खत्म करने की बात करने लगते हैं. लेकिन ये इतना भी स्वाभाविक नहीं होता. दार्शनिकों का मानना है कि वॉर हिस्टेरिया को जानबूझकर बढ़ाया जाता है. सरकारें और मीडिया दुश्मन की ऐसी छवि बनाते हैं, जो डरावनी हो.  इस तरह वॉर हिस्टेरिया इंसान की भावनात्मक कमजोरियों को हथियार बनाता है. 

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एकजुटता का हथियार भी है ये हिस्टेरिया 

वॉर हिस्टेरिया सिर्फ भावनाओं का उबाल नहीं बल्कि एक बड़ा सामाजिक-राजनैतिक बदलाव भी द‍िखाता है. इसको राजनीतिक हथ‍ियार भी माना जाता है जिसे अंग्रेजी में 'रैली अराउंड द फ्लैग' सिंड्रोम कहते हैं. इसमें सरकारें और नेता अक्सर एक 'बाहरी खतरे' का हवाला देकर जनता को एकजुट करती हैं. यह रणनीति राष्ट्रवाद की भावना को जगाती है और लोगों का ध्यान आंतरिक भेदभाव की भावना से हटाकर बाहरी दुश्मन पर केंद्रित कर देता है. भारत में ये बदलाव वृहद रूप से देखने को मिला, जब पाकिस्तान के ख‍िलाफ हर धर्म जाति और समूहों से न‍िकलकर लोगों ने अपनी प्रति‍क्र‍िया दी.

आम जनता पर मनोवैज्ञानिक असर

युद्ध का उन्माद पहले तो आसान लगता है, लेकिन धीरे-धीरे collective trauma में बदलता है. 
लोगों में भय और असुरक्षा आती है, लोग डरने लगते हैं कि हमला कभी भी हो सकता है. 
क्रोध और घृणा का भाव आने से पूरे समुदायों के प्रति नफरत पैदा होती है, खासकर जो शत्रु देश से जुड़े माने जाते हैं. 
इस दौरान दूसरों पर शक के साथ ही अपने ही देश के लोगों पर शक किया जाने लगता है. 

देशभक्ति और कट्टरता में फर्क मिटने लगता है

वार हिस्टेरियार का असर 10-15 दिन में कम नहीं होता. कई लोगों खासकर बच्चों और युद्ध से प्रभाव‍ित क्षेत्र के लोगों में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसे लक्षण दिखते हैं. उदाहरण के लिए कश्मीर में सीजफायर के बाद भी लोग डर में जी रहे थे. अध्ययनों के अनुसार सामान्य आबादी में ये प्रभाव 6-12 महीने में कम होता है, लेकिन युद्ध क्षेत्र में ये सालों तक रह सकता है 

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क्या है वॉर हिस्टेरिया से बचने का रास्ता?
मीडिया की जिम्मेदारी: टीआरपी के लिए उन्माद फैलाने की बजाय, शांति और संवाद को बढ़ावा देना चाहिए. 
जागरूकता: स्कूलों में इमोशनल इंटेल‍िजेंस स‍िखाया जाए ताकि लोग युद्ध को तर्क की नजर से देखें।
संवाद: देशों के बीच बातचीत और कूटनीति को बढ़ावा देना चाहिए. 

वॉर हिस्टेरिया जंग से पहले आने वाली वो भावना है जो जंग से ज्यादा खतरनाक होती है. ये दिमाग में ऐसी आग लगाता है जो करुणा और सह अस्त‍ित्व जैसे भावों को काट देता है. आज भारत-पाक सीजफायर ने एक ऐसा मौका दिया है कि हम इस उन्माद से सबक लें. जंग मैदान में नहीं दिमाग में जीती जाती है और अगर हम अपने दिमाग को शांति और संवाद की राह पर ले जाएं तो असली जीत वही होगी. 

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