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जुर्म

इंदिरा से बराड़ तक, ये थे ऑपरेशन ब्लूस्टार के सबसे बड़े नायक

आशुतोष कुमार मौर्य
  • 06 जून 2018,
  • अपडेटेड 2:51 PM IST
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6 जून 1984 को हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं. जनवरी 1980 में पार्टी को मिली जीत के बाद इंदिरा गांधी बतौर पीएम अपनी तीसरी पारी खेल रही थीं. उधर देश का सबसे समृद्ध राज्य पंजाब सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहा था. 5 अक्टूबर 1983 को हथियारबंद लोगों ने एक बस को अगवा कर लिया और उसमें सवार सभी हिंदुओं की हत्या कर दी. इंदिरा गांधी इस घटना से आगबबूला हो उठीं.

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पंजाब में इमरजेंसी लगा दी गई. अफवाहें उड़नी लगी थीं कि भिंडरावाले को गिरफ्तार कर लिया जाएगा. भिंडरावाले अकाल तख्त में रहने लगा था. इस बीच, सरकार ने स्वर्ण मंदिर की घेरेबंदी की योजना बनाई. मई 1984 में इंदिरा को यकीन होने लगा था कि पंजाब में आतंक का सफाया करने के लिए अब टकराव ही सीधा रास्ता है. जिसके बाद उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार को हरी झंडी दी.

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1977 में जब इंदिरा गांधी सत्ता से बेदखल हुईं थी तो पंजाब के सबसे प्रभावशाली दमदमी टकसाल ने अपना नया जत्थेदार चुना जिसका नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाले. भिंडरावाले के जोशीले भाषणों में अजीब का खिंचाव था लेकिन उनकी सोच बहुत कट्टर थी. भिंडरावाले गैर सिख के बारे में अच्छी राय नहीं रखता था. निरंकारियों से उसकी कुछ ऐसी ही रंजिश थी.

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1978 में निरंकारियों के हाथों भिंडरावाले के 13 समर्थक मारे गए. इस घटना के बाद भिंडरावाले ने अपने समर्थकों से कह दिया कि जो भी निरंकारी को मौत के घाट उतारेगा, उसे वह सोने से तौल देगा. अलगाववाद का जहर बोने वाले भिंडरावाले के भाषणों के कैसेट पंजाब के गांव-गांव में बांटे गए थे.

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मेजर जनरल बराड़ को ऑपरेशन ब्लू स्टार के कमांडर की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. 1971 की जंग में हिस्सा ले चुके बराड़ ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले मेरठ में 9वीं इनफैन्ट्री डिविजन का नेतृत्व कर रहे थे. एक जून 1984 को बराड़ मेरठ से चंडीगढ़ पहुंचे. उनसे कहा गया कि यह ऑपरेशन जल्दी से जल्दी होना है. और उन्हें अमृतसर जाने का हुक्म मिला.

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ऑपरेशन ब्लू स्टार के करीब 28 साल बाद रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़ पर जानलेवा हमला भी हुआ था. 30 सितंबर, 2012 को चार सिख नौजवानों ने लंदन की ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट पर उन्हें मारने की कोशिश की. उस दौरान उनकी पत्नी भी साथ थीं. हालांकि, इस हमले में वे बच गए.

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1971 की जंग के नायक रहे मेजर जनरल शाबेग सिंह ने मुक्ति वाहिनी के लड़ाकों को ट्रेनिंग दी थी. लेकिन 1976 में रिटायरमेंट से ठीक पहले भ्रष्टाचार के आरोप में उनका कोर्ट-मार्शल किया गया और रैंक छीन लिया गया. खुद के साथ हुई इस कार्रवाई को वो नाइंसाफी मानते थे. सरकारी तानाशाही से आहत शाबेग सिंह ने भिंडरावाले का हाथ थाम लिया. शाबेग पांच मंजिला अकाल तख्त की किलेबंदी में भिंडरावाले के सैनिक सलाहकार बन गए.

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शाबेग ने अपनी युद्धकला का हर दाव भिंडरावाले की छोटी सी फौज को सिखाया. ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान शाबेग ने सेना का डटकर मुकाबला किया. हालांकि, इस ऑपरेशन के दौरान वो भी मारे गए. लेकिन, शाबेग ने सेना से बहुत महंगा खूनी बदला लिया, क्योंकि उसे लगता था कि सेना ने उसे धोखा दिया है.

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मोटा चश्मा पहनने वाले 66 साल के रामेश्वर नाथ काव पर्दे के पीछे रहने वाले जासूस थे. उन्होंने 1968 में गुप्तचर एजेंसी रॉ का गठन किया था और 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान रॉ से मुक्तिवाहिनी के छापामारों को ट्रेनिंग दिलाई थी. 1981 में वे श्रीमती गांधी के वरिष्ठ सहायक की हैसियत से सरकार में लौटे और एक तरह से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका निभाने लगे. इससे भी बड़ी बात यह थी कि वे पंजाब समस्या के बारे में श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रमुख सलाहकार थे.

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विदेशों में कई खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों के साथ काव के निजी संबंध थे. ऑपरेशन सनडाउन के लिए श्रीमती गांधी के इनकार से काव अगर नाखुश थे तो भी उन्होंने जाहिर नहीं किया. असल में उनकी सोच श्रीमती गांधी की सोच के अत्यधिक अनुरूप थी. ऑपरेशन ब्लूस्टार के कुछ हफ्ते पहले ही विदेशी राजधानियों में, खासकर बड़ी सिख आबादी वाले शहरों में तैनात रॉ के प्रमुखों ने काव को सावधान कर दिया था कि उग्रवादियों को निकालने की सैनिक कार्रवाई का बुरा असर होगा. काव ने खुद विदेशों में मौजूद सिख अलगाववादियों से बात की थी कि वे भिंडरांवाले को स्वर्ण मंदिर खाली करने में राजी कर लें.

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ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान भारतीय सेना के प्रमुख थे जनरल अरुण श्रीधर वैद्य. 31 जुलाई 1983 को जनरल वैद्य 13वें सेनाध्यक्ष बने थे. 1984 में इन्होंने गोल्डन टेंपल से अलगाववादियों को मुक्त करने के लिए ऑपरेशन ब्लूस्टार की योजना बनाई थी.

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उन्होंने ऑपरेशन से पहले भरोसा दिलाया था कि इस ऑपरेशन के दौरान कोई मौत नहीं होगी और स्वर्ण मंदिर को कोई नुकसान नहीं होगा. हालांकि, ऐसा हुआ नहीं. बहरहाल, 40 वर्षों की शानदार सेवा के बाद जनरल वैद्य 31 जनवरी 1986 को सेना से रिटायर हुए. रिटायरमेंट के 6 महीने बाद ही 10 अगस्त 1986 को पुणे में सिख अलगाववादियों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी.

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