लॉकडाउन का पालन कर रहे मजदूरों की सरकार से गुहार- भूख से बचा लो परिवार

लॉकडाउन ने एक बड़े तबके के लिए जीने की समस्या खड़ी कर दी है. दूरदराज से रोजी-रोटी कमाने महानगरों की ओर आए विस्थापित मजदूरों की जिंदगी अब अधर में लटकी है. राजधानी दिल्ली में कई इलाके ऐसे हैं जहां उत्तर प्रदेश और बिहार के विस्थापित मजदूरों की बड़ी आबादी बसती है.

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सरकार से दो वक्त की रोटी की गुहार (फोटो-आजतक) सरकार से दो वक्त की रोटी की गुहार (फोटो-आजतक)

आशुतोष मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 16 अप्रैल 2020,
  • अपडेटेड 7:58 PM IST

  • घरों में कैद रहकर निभाना चाहते हैं नागरिक कर्तव्य
  • परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ बनी चुनौती

लॉकडाउन के दौरान हजारों मजदूरों की जिंदगी मुश्किल भरे दौर से गुजर रही है. उनके पास खाने के जो थोड़े बहुत सामान बचे थे वह भी खत्म हो रहे हैं. खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, क्योंकि करने को कोई रोजगार नहीं है. वहीं कोरोना वायरस के संक्रमण पर काबू पाने के लिए अपने घरों में बंद रहना भी जरूरी है. जीवन यापन के लिए अपने घर (स्थायी निवास) भी नहीं जा सकते हैं. लेकिन सवाल यह है कि भूखे पेट इन मजदूरों की जिंदगी कैसे चलेगी?

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लॉकडाउन ने एक बड़े तबके के लिए जीने की समस्या खड़ी कर दी है. दूरदराज से रोजी-रोटी कमाने महानगरों की ओर आए विस्थापित मजदूरों की जिंदगी अब अधर में लटकी है. राजधानी दिल्ली में कई इलाके ऐसे हैं जहां उत्तर प्रदेश और बिहार के विस्थापित मजदूरों की बड़ी आबादी बसती है. आजतक की टीम ने झंडेवालान के पास स्थित अंबेडकर बस्ती का दौरा किया.

हमारे संवाददाता की मुलाकात उत्तर प्रदेश निवासी लक्ष्मण से हुई. लक्ष्मण दिल्ली में ई रिक्शा चलाते थे लेकिन लॉकडाउन ने उनके रिक्शे के पहियों की रफ्तार पर ही ब्रेक लगा दी. रिक्शा बंद हुआ तो कमाई का जरिया भी खत्म हो गया. वायरस के डर से बाहर जा नहीं सकते. परिवार के साथ अपने घर में मोबाइल फोन पर लूडो खेलते हुए दिन बिता रहे हैं लेकिन भूखे पेट जिंदगी भी कैसे चले?

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लक्ष्मण कहते हैं, "हमें पता है बाहर बीमारी का खतरा है लेकिन अपने गांव चले जाते तो किसी तरह जी खा लेते. जो पैसे थे वह खत्म हो गए, राशन भी नहीं बचा है. आटा-चावल बंटा तो था लेकिन सबको नहीं मिला‌. सरकारी स्कूल में खाना मिलता है, आजकल वही खाकर जिंदा हैं."

लक्ष्मण जैसे अन्य मजदूर भी यही चाहते हैं कि उनके घर तक राशन पहुंच जाए तो वह भी लॉकडाउन का पालन करें और घर में ही रहें. दूध, दही, घी, ड्राई फ्रूट्स इन परिवारों के लिए सपना है. फिलहाल पेट भर दाल चावल मिल जाए, वही उनके लिए बड़ी बात है.

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उत्तर प्रदेश के बनारस में रहने वाले सोनू, उनका भाई और पूरा परिवार अंबेडकर बस्ती की तंग गलियों के बीच छोटे से घर में रहते हैं. लॉकडाउन से पहले ठेका मजदूरी की नौकरी करते थे, जिससे परिवार का भरण-पोषण होता था, लेकिन वायरस की मार ने सब कुछ ठप कर दिया है. जिंदगी भी एकदम रुक सी गई है.

सोनू ने बताया कि अंबेडकर बस्ती में मदद के नाम पर अनाज बंटा था लेकिन अब वह खत्म होने वाला है. सोनू और उनके परिवार के पास राशन के नाम पर ज्यादा कुछ नहीं बचा है इसलिए पेट भरने के लिए पास के सरकारी स्कूल में जब खाना बंटता है तो लाइन में लग जाते हैं.

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सोनू के परिवार को बच्चों की फिक्र होती है लेकिन वायरस का डर भी है. इसलिए यह परिवार मदद के नाम पर राशन चाहता है ताकि घर से बाहर निकलने की नौबत ना आए. सोनू की पत्नी कहती हैं, "अगर साधन होता तो हम अपने घर चले जाते लेकिन हालात से मजबूर होकर हम यहीं रुके हैं. स्कूलों में खाना मिलता है तो ले आते हैं क्योंकि घर में अब कुछ नहीं बचा. सरकार अगर हमारी मदद कर दे तो हम आगे भी अपने घरों में ही रहेंगे."

बता दें, झंडेवालान के सरकारी स्कूल में केजरीवाल सरकार की ओर से खाने-पीने की व्यवस्था की गई है. जहां दिन में दो बार खाना मिलता है. अंबेडकर बस्ती के सैकड़ों मजदूर और उनका परिवार इस स्कूल में खाना खाने के लिए आता है. सरकार की ओर से खाना बांट रहे अधिकारियों का कहना है कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन वह जरूर करते हैं लेकिन खाना लेने जो आते हैं उनके अंदर फिलहाल संघर्ष कुछ और ही है.

दिल्ली पुलिस के जवान भी खाना बांटने के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पालन सुनिश्चित कराते हैं, लेकिन कोशिश यही रहती है कि इन लोगों के साथ किसी तरह की सख्ती ना दिखानी पड़े.

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से मेहनत मजदूरी करने दिल्ली आए अमरजीत का परिवार गांव जा चुका है. अब वह खुद भी गांव जाना चाहते हैं लेकिन लॉकडाउन की वजह से घर में कैद हैं. अमरजीत के पास भी अब रोजी रोटी का कोई सहारा नहीं है. आजतक से अपनी व्यथा सुनाते हुए अमरजीत ने कहा, "होटल में नौकरी करते थे लेकिन अब पैसा खत्म हो गया है. मदद के नाम पर सरकारी आटा मिला था, वह भी खत्म होने को आया. बाहर खाना मिल जाता है तो खा लेते हैं. अगर घर जाने की व्यवस्था हो जाए तो हम वापस चले जाएं. लेकिन सरकार अगर मदद कर दे तो हम यहीं रहना चाहेंगे."

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अंबेडकर बस्ती की तंग गलियों की कच्ची दीवारों के बीच कमजोर छत के नीचे चक बहादुर नाम का एक शख्स किराए के मकान में रह रहा है. चक बहादुर उत्तर प्रदेश के जिला सिद्धार्थ नगर के रहने वाले हैं. सालों पहले परिवार के साथ दिल्ली के अंबेडकर बस्ती रहने आए थे. आज इनके लिए बच्चों और परिवार का पेट भरना भी दुश्वार हो रहा है.

चक बहादुर की व्यथा यह है कि जब सरकारी अनाज बांटा तो उन्हें नहीं मिला. बच्चों के साथ स्कूल में खाना लेने जाते हैं तो भरपेट खाना नहीं मिलता क्योंकि भीड़ ज्यादा होती है, अपने गांव जा नहीं सकते क्योंकि साधन नहीं है लेकिन खतरे से लड़ना भी है और जीना भी है.

चक बहादुर की पत्नी कहती हैं, "हमें पता है बाहर महामारी फैली है लेकिन घर में भूख से नहीं मरना चाहते. सरकार मदद कर दे तो हम भी घर में बैठेंगे."

मेहनत मजदूरी करके परिवार का पेट भरने वाले चक बहादुर के हाथ में पैसे नहीं बचे हैं. वह भी अपने घरों के अंदर ही रहना चाहते हैं लेकिन भूख सड़क पर ले आती है. इसलिए सरकार से दो वक्त की रोटी के प्रबंध के लिए गुहार लगा रहे हैं.

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कोरोना महामारी के दौरान सरकार लोगों से लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग नियम के पालन करने की उम्मीद करती है लेकिन भूख से बेबस इन मजदूरों के सामने मुश्किल यह है कि वो सरकारी फरमान को अमल में लाएं या अपने परिवार को भूखों मरने से बचाएं.

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