कई लोगों को बीमा कंपनियां लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी (Life Insurance Policy) देने से साफ इनकार कर देती हैं. क्योंकि ऐसे लोगों को पॉलिसी देने से पहले बीमा कंपनियां कई तरह की जानकारियां मांगती हैं. उसके बाद तय करती हैं कि पॉलिसी दी जाए या नहीं.
दरअसल, खासकर टर्म प्लान (Term Plan) और लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी जारी करने पहले बीमा कंपनियां बीमाधारक की हेल्थ रिकॉर्ड के साथ-साथ दूसरे रिकॉर्ड को खंगालती हैं. अक्सर गंभीर मामलों में बीमा कंपनियां आवेदन को ही खारिज कर देती हैं. आइए जानते हैं कि किस तरह के मामलों में अप्लीकेशन रिजेक्ट हो सकते हैं.
1. गंभीर बीमारी: अगर किसी को पहले से कोई गंभीर बीमारी है तो उसे लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं मिल पाती है. पॉलिसी इश्यू करने पहले कंपनी मेडिकल हिस्ट्री को खंगालती है. कई तरह के मेडिकल चेकअप किए जाते हैं. जिसमें किसी भी गंभीर बीमारी की पुष्टि होने पर कंपनी अप्लीकेशन को रिजेक्ट कर देती है.
2. शराब या ड्रग्स की लत: अगर आप बहुत ज्यादा शराब पीते हैं, तो आपको लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने में दिक्कतें आ सकती हैं. कंपनियां मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर तय करती हैं कि पॉलिसी दी जाए या नहीं, बीमा कंपनियां खुद कई तरह की चेकअप करवाती हैं. बहुत ज्यादा शराब और ड्रग्स लेने वालों को सीधे कंपनियां पॉलिसी देने से मना कर देती हैं.
क्योंकि ज्यादा नशे की वजह से सड़क हादसे और गंभीर बीमारियां होने का खतरा रहता है. यही नहीं, कई बार बीमा कंपनियां बहुत ज्यादा सिगरेट पीने वालों को भी टर्म प्लान या फिर कोई दूसरी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी देने से इनकार कर देती हैं.
3. क्रिमिनल रिकॉर्ड: पॉलिसी होल्डर का कोई आपराधिक रिकॉर्ड (Criminal Record) होने पर भी कंपनियां टर्म प्लान (Term Insurance) देने से हिचकिचाती हैं. ऐसे लोगों के बारे में कंपनियां सभी आपराधिक हिस्ट्री को खंगालने के बाद तय करती हैं कि अप्लीकेशन को स्वीकार किया जाए या नहीं. गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वालों का शुरू में ही अप्लीकेशन रिजेक्ट हो जाता है. ऐसे लोगों के भविष्य को बीमा कंपनियां खतरे में मानकर चलती हैं.
सबस अहम बात यह है कि पॉलिसी खरीदते वक्त बीमाधारक को भी खुलकर मेडिकल हिस्ट्री और आपराधिक रिकॉर्ड के बारे जानकारी देनी चाहिए, ताकि बाद में क्लेम रिजेक्ट (Claim Reject) न हो. क्योंकि अगर किसी ने गलत जानकारी देकर पॉलिसी ले ली तो फिर क्लेम के वक्त सही तथ्य सामने आने पर बीमा कंपनियां उसे आधार बनाकर क्लेम रिजेक्ट कर सकती हैं. ऐसे में इंश्योरेंस का तो लाभ नहीं मिलेगा, साथ ही प्रीमियम की भी राशि का नुकसान उठाना पड़ेगा.
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