कुरुक्षेत्र के मैदान में अपने सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन के हाथ जब धनुष उठाने में कांप जाते हैं तो श्रीकृष्ण उसे सहारा देते हैं. लेकिन वह सिर्फ हाथों को सहारा नहीं देते हैं, अर्जुन की आत्मा को सहारे की जरूरत थी और परमयोगी श्रीकृष्ण ने तब उसी मौके पर कर्मयोग का ज्ञान देकर अर्जुन की आत्मा को सहारा दिया. आज वह कुरुक्षेत्र कहां है? भूगोल इस प्रश्न का उत्तर ठीक-ठीक नहीं दे सकता और न ही इतिहास यह दावे से बता सकता है कि 5000 साल पहले घटा कुरुक्षेत्र आज किसी प्रदेश (हरियाणा) की भीतरी सीमा में है.
लेकिन... सनातन ऐसी शक्ति है, जो आपसे बार-बार बताएगी कि कुरुक्षेत्र कहीं बाहर नहीं है. अपने भीतर झांक कर देखो तो आप खुद को इसी कुरुक्षेत्र में खड़ा पाओगे. आज भी वैसे ही अर्जुन की तरह शोक और मोह में फंसे हुए और हाथ पर हाथ धरे बैठे चिंता में लिपटे हुए. लेकिन वहां हमें श्रीकृष्ण के दर्शन क्यों नहीं होते हैं?
5 जनवरी 1893 को हुआ था जन्म
आज से 133 साल पहले अध्यात्म के ऐसे ही प्रश्नों का उत्तर अपने क्रिया योग के जरिये देने वाले योगी थे परमहंस योगानंद. 5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे और उस दौर में किशोर उम्र में अमेरिका को 'योग' से परिचित कराने वाले परमहंस योगानंद ने भारत ही नहीं संसार को इस दिव्यता का साक्षात्कार कराया और गीता की उन पंक्तियों का अनुभव कराया जहां भगवान कहते हैं कि ईश्वर तो सभी प्राणियों के भीतर मौजूद है. जरूरत है तो उसे देखने की शक्ति पैदा करने की. यही शक्ति 'क्रिया योग' है.
स्टीव जॉब्स को भी मिली थी प्रेरणा
ज्ञान की खोज के लिए योगानंद की व्यक्तिगत इच्छा और उस राह पर चलते हुए उनके संघर्ष ने आज आधुनिक पीढ़ी के लिए योग को सुलभ कराया और अनगिनत लोग इस प्राचीन परम्परा का अभ्यास कर रहे हैं. उनके इस यौगिक सफर का पूरा वृतांत, चुनौतियां या फिर उपलब्धियां, सभी के बारे में 'एक योगी की आत्मकथा' पुस्तक में विस्तार से दर्ज है. आज भी उनकी किताब साधक, दार्शनिक और योग से जुड़े लोगों के लिए महत्व रखती है. यह भी कहा जाता है कि स्टीव जॉब्स के आईपैड में केवल एक यही किताब मौजूद थी और अपने आखिरी समय में उन्होंने अपने करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों को यही किताब अपने आखिरी तोहफे के रूप में दी थी.
उनकी 'क्रिया योग' की तकनीक पर आज सारी दुनिया के लोग अमल कर रहें हैं. लेकिन ये 'क्रिया योग' क्या है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए कुरुक्षेत्र वाले प्रसंग पर फिर से चलते हैं. तो खुद से प्रश्न कीजिए कि आप जब खुद को अपने भीतर के कुरुक्षेत्र में अर्जुन की तरह अकेला खड़ा पाते हैं तो वहां श्रीकृष्ण क्यों नजर नहीं आते हैं. जबकि गीता में तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं सबके भीतर हूं. ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में मौजूद रहता है. याद कीजिए 18वें अध्याय का श्लोक 61 क्या कहता है...
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति,
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।
(भाव- ईश्वर सभीके भीतर मौजूद है, उनके कर्मों के अनुसार वह माया द्वारा निर्मित यंत्र पर सवार आत्माओं को निर्देशित करता है, उन्हें चलाता है.)
फिर वहां श्रीकृष्ण नजर क्यों नहीं आते हैं? क्योंकि हमारी इन आंखों पर बाहरी माया, भ्रम और लालच, गुस्सा, अहंकार का इतना घना परदा पड़ा है कि हम अपने भीतर ईश्वर के दर्शन नहीं कर पाते हैं. इसलिए गीता के 11वें अध्याय के आठवें श्लोक में वह पहले ही चेता देते हैं कि,
न तु मां शक्यसे द्रष्टुम् अनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वर्यम्॥
(भाव- तुम अपनी इन भौतिक (साधारण) आंखों से मेरे विराट रूप को नहीं देख सकते. इसलिए, मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूं. अब तुम मेरी इस अलौकिक योग-शक्ति और ऐश्वर्य को देखो.)
बाहर नहीं भीतर होता है मनुष्य का असली संघर्ष
असल में मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर नहीं, भीतर होता है. बाहरी दुनिया में वह जितना आगे बढ़ता है, भीतर उतना ही बिखरता चला जाता है. आज जब चिंता, भय और अस्थिरता जीवन का सामान्य अनुभव बन चुके हैं, तब एक प्रश्न बार-बार उभरता है 'क्या स्थायी शांति संभव है?' क्रिया योग इसी प्रश्न का उत्तर है. क्रिया योग कोई दार्शनिक प्रोसेस भर नहीं है बल्कि ये तो अनुभव का ऐसा विज्ञान है, ध्यान की ऐसी पद्धति है जो साधक को धीरे-धीरे उसके भीतर मौजूद शांति, आनंद और दिव्यता से जोड़ देती है.
'क्रिया योग' के अभ्यास की शुरुआत होते ही साधक जिस बदलाव को सबसे पहले महसूस करता है वह है 'मन की शांति'. विचारों की धारा धीमी पड़ने लगती है. बेचैनी का स्थान एक स्थिरता लेने लगती है और ऐसा लगता है कि भीतर कोई शांत दीप जल उठा हो. यह शांति केवल विश्राम नहीं है, बल्कि 'चेतना की स्पष्टता' है. इसी स्पष्टता के साथ भीतर से मार्गदर्शन मिलने लगता है. जीवन की समस्याएं पहले जैसी भारी नहीं लगतीं, उनके समाधान अपने-आप उभरने लगते हैं.
क्या है क्रिया योग?
परमहंस योगानंद कहा करते थे, ध्यान मनुष्य को शांत और स्थिर बनाता है. उसी उलझी हुई परिस्थिति से वापस निकाल लाता है. 'क्रिया योग' के अभ्यास से साधक परिस्थितियों को भावनात्मक होकर नहीं बल्कि 'विवेक और भीतरी नजरिए से ' से देखना सीखता है. यह भीतरी ज्ञान उसे बताता है, कब बोलना है, कब मौन रहना है. कब आगे बढ़ना है और कब रुक जाना ही बुद्धिमानी है. यही वजह है कि ध्यान करने वाला व्यक्ति जीवन के संघर्षों में भी संतुलित रहता है.
जैसे-जैसे साधक प्राणायाम का अभ्यास करता है, उसके जीवन में साहस, श्रद्धा, प्रेम, करुणा और विवेक जैसे 'दिव्य गुण' स्वाभाविक रूप से प्रकट होने लगते हैं. ईश्वर की अनुभूति ध्यान कक्ष तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दैनिक जीवन के व्यवहार में उतर आती है. परमहंस योगानंद ने स्पष्ट कहा था 'मैं धर्म की व्याख्या देने नहीं आया, बल्कि एक ऐसी तकनीक देने आया हूं, जिससे मनुष्य स्वयं ईश्वर को जान सके.' उनके अनुसार क्रिया योग वह रास्ता है, जहां 'अध्यात्म अनुभूति बन जाता है' उनके शब्दों में- “क्रिया योग ईश्वर से संपर्क की सर्वोच्च विधि है.” इससे मिलने वाला आनंद सभी भौतिक सुखों से कहीं अधिक और स्थायी है. क्रिया योग संसार से पलायन नहीं सिखाता, बल्कि भीतर से सशक्त होकर संसार में जीने की कला देता है.यह शांति देता है, आनंद देता है और सबसे बढ़कर—'ईश्वर की जीवंत अनुभूति'.
बचपन के मुकुंद लाल घोष बने परमहंस योगानंद
क्रिया योग और ईश्वरीय दिव्यता के अनुभव को इतना सरल बनाकर दुनिया भर के लिए सहज बना देने को आज भी विश्व के लिए उनकी ओर से दिया गया सबसे बड़ा अध्यात्मिक उपहार माना जाता है. यही उपहार एक योगी के निजी जीवन में झांकने को, उसे गहराई से समझने के लिए रोमांचित भी कर देता है. उनकी अपनी आत्मकथा और इसके अलावा मौजूद सभी जानकारियों की मानें तो वह गोरखपुर के एक बंगाली परिवार में जन्मे थे जहां उनका असल नाम मुकुंद लाल घोष था. अपने आठ भाई-बहनों में वे चौथे थे.
अबोध उम्र में ही मां को खो देना और उसी के बाद से अध्यात्म की ओर होने लगे झुकाव ने किशोर उम्र तक आत्मज्ञान और जिज्ञासा का रूप ले लिया. जब ये जिज्ञासा बढ़ी तो मन इस प्रश्न का सही उत्तर दे सकने वाले गुरु की खोज करने लगा. इसी दौरान समय आया साल 1910. महज सत्रह साल की बांकी उम्र में वह बनारस के श्रद्धेय स्वामी श्रीश्रीयुक्तेश्वर गिरी के शिष्य बन गए. अपने जीवन के दस साल उन्होंने उनके आश्रम में बिताये. अध्यात्म के ज्ञान के साथ उच्च शिक्षा भी जारी रही जिसमें साल 1915 में कोलकाता यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन पूरा किया और इसी के बाद उन्होंने भारत के मठवासी स्वामी आदेश के अनुसार महंत के रूप में शपथ ली. तभी उन्हें 'योगानंद' नाम मिला जिसका अर्थ होता है योग से प्राप्त होने वाला आनंद.
रांची में भारतीय योगदा सत्संग सोसाइटी की स्थापना
साल 1917 में रांची में भारतीय योगदा सत्संग सोसाइटी की स्थापना करने के बाद साल 1920 में वे अमेरिका चले गए. बोस्टन में इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ रिलीजियस लिबरल्स के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें आमंत्रित किया गया था. एक प्रतिभाशाली वक्ता, योगानंद ने 'द साइंस ऑफ़ रिलिजन' विषय पर सभा को सम्बोधित किया और उनका सन्देश पूरे अमेरिका में गूंज गया. वह शुरुआत थी पश्चिम में पूर्व के आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार की. उसी साल उन्होंने आत्म-प्राप्ति फैलोशिप की शुरुआत की, जिसके जरिये वे भारत के योग का प्राचीन दर्शन और ध्यान के समय-सम्मानित विज्ञान पर अपने ज्ञान का प्रसार करने लगे.
अगले दशक में उन्होंने नॉर्थ अमेरिका और यूरोप के विभिन्न देशों की यात्रा की और बड़ी-बड़ी सभाओं में लोगों को सम्बोधित किया. उनके भाषणों ने दुनिया के महान धर्मों में छिपी एकता पर जोर दिया और क्रिया योग की आत्मा जागृति तकनीक की शुरुआत की. साल 1925 में उन्होंने लॉस एंजिल्स में आत्म-प्राप्ति फैलोशिप के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय की स्थापना की, जो आगे चलकर एक बड़ा आध्यात्मिक और प्रशासनिक केंद्र बन गया.
यूरोप और मिडिल-ईस्ट के कुछ भागों में घूमने के बाद, साल 1935 में जब परमहंस योगानंद भारत में साल-भर रहने के लिए आये तब उनकी मुलाक़ात महात्मा गांधी से भी हुई. उन्होंने भारत में महात्मा गांधी, नोबल पुरुस्कार से सम्मानित भौतिक विज्ञानी सीवी रमन, और कुछ प्रसिद्ध आध्यत्मिक व्यक्तित्व जैसे रमना महृषि और आनंदमयी मां के साथ भी समय बिताया.महात्मा गांधी के अनुरोध पर, परमहंस योगानंद ने उन्हें और उनके कई अनुयायियों को क्रिया योग के आध्यात्मिक विज्ञान में निर्देश दिया. इस तरह अध्यात्म का प्रसार करते हुए आधुनिक महर्षि के रूप में प्रसिद्ध हुए परमहंस योगानंद 7 मार्च, 1952 को लॉस एंजिल्स में ब्रह्मलीन हो गए.
भारत सरकार ने औपचारिक रूप से मार्च 1977 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी करके उनके उत्कृष्ट योगदान को मान्यता दी और कहा, 'भगवान के लिए प्यार और मानवता की सेवा के आदर्श परमहंस योगानंद के जीवन में पूर्ण अभिव्यक्ति मिली. हालांकि उनके जीवन का मुख्य हिस्सा भारत के बाहर बिताया गया था, फिर भी, वे हमारे देश के महान संतों में से एक है.'
परमहंस योगानंद के जीवन से प्रेरणा लेने वाले और उससे भी अधिक उनके 'क्रियायोग' से जीवन की जटिलताओं को सुलझाने वालों में कई बड़ी हस्तियां और दिग्गज शामिल हैं. इसके अलावा भी दुनियाभर में अध्यात्म की जो गंगा बह रही है, उसे गीता और वेदों से जैसे गूढ़ ग्रंथों से निकालकर जन सामान्य को देने वाले परमहंस योगानंद ही हैं.
विकास पोरवाल