Happy Birthday Murli Manohar Manjul: इस ओवर की अगली गेंद... और खेलने के प्रयास में निश्चित तौर पर परेशान... इस बार गैटिंग... हालांकि एक रन के लिए बाहर निकले, दूसरे रन के लिए पलट रहे हैं. मनोज प्रभाकर का थ्रो अब पहुंच रहा है कमेंटेटर बॉक्स के ठीक सामने से... दो रन भाग कर पूरे किए, लेकिन जरूर इस गेंद ने एकाग्रता को तोड़ा. इन दो रनों के साथ स्कोर आगे बढ़ा. इंग्लैंड का कुल स्कोर 2 विकेट पर 117... काफी देर से ऊपर आसमान में सूरज गायब है.... कमेंट्री के ये अंश मुरली मनोहर मंजुल के हैं. अपनी आवाज से श्रोताओं को बांधने वाले मंजुल की आवाज क्रिकेट के आकाश में आज भी तैर रही है. उन्होंने जब भी कमेंट्री की, सुनकर कभी ऐसा नहीं लगा कि सुननेवाला रेडियो पर मैच का 'आखों देखा हाल' सुन रहा है, बल्कि ऐसा लगा कि वह मैच को मंजुल की आखों से देख रहा है.
(उनकी आवाज में कमेंट्री का यह दुर्लभ अंश आप यहां सुन सकते हैं)
उन्होंने कई ऐसे शब्दों को चलाया, कई खंड वाक्यों का लगातार प्रयोग किया, जिससे हिंदी कमेंट्री को एक आधार तो मिला ही क्रिकेट के प्रति दीवानगी भी बढ़ती गई. आज कमेंट्री के दौरान कोई यह दोहराता है कि बॉलर की अपील में अनुमान ज्यादा, विश्वास कम, पूरा स्टेडियम धूप में नहाया हुआ... तो ये शब्द बरबस ही मुरली मनोहर को सामने ला खड़े करते हैं.
भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है. इसे जन-जन तक पहुंचाने का पूरा श्रेय आकाशवाणी के खेल प्रसारण को जाता है. लेकिन यह भी सच है कि आज के दौर में रेडियो का 'आंखों देखा हाल' अपने स्वर्णिम दौर से निकलकर हाशिए पर जाता प्रतीत हो रहा है. इसके बने बनाए मंच पर किसी और का कब्जा हो गया. रेडियो क्रिकेट कमेंट्री आज भी जिंदा है, पर सिर्फ स्टूडियो तक... इस 'कटुसत्य' को खुद मुरली मनोहर मंजुल ने स्वीकार किया है, जिन्होंने आकाशवाणी की कमेंट्री को घर की भाषा (मातृभाषा हिंदी) में आम लोगों तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया था.
'देखिए एक बात मैं मानता हूं और सभी मानते हैं कि आज दूरदर्शन या टेलीविजन क्रिकेट की या खेलों की जिस लोकप्रियता को भुना रहा है... किसी भी रूप में- चाहे अर्थ (पैसे कमाने) के रूप में, प्रचार-प्रसार के रूप में. इसका आधार रेडियो ने ही तैयार किया था. रेडियो ने उन्हें पका-पकाया मंच दिया, जिसपर वो चल निकले.'
ये शब्द हिंदी कमेंट्री के 'प्रबल योद्धा' मुरली मनोहर मंजुल के हैं, जो आज (7 दिसंबर) 90 साल के हो गए. उनकी लयबद्ध और धाराप्रवाह कमेंट्री उन लोगों को जरूर याद होगी, जिन्होंने सत्तर से नब्बे के दशक में आकाशवाणी की क्रिकेट कमेंट्री का आनंद उठाया होगा.
मंजुल इन दिनों जयपुर में उम्र के उस पड़ाव पर है, जहां उन्हें देखकर सिर्फ अनुभव किया जा सकता है उस स्वर्णिम काल को, जब उनकी बुलंद आवाज श्रोताओं तक पहुंच रही होती थी. हिंदी कमेंट्री के इस पुरोधा से उनके जन्मदिन से कुछ ही दिन पहले मिलने का अवसर प्राप्त हुआ. कमाल की बात यह रही कि उनकी याददाश्त में कोई ह्रास नहीं दिखा.. स्मृति शक्ति ऐसी कि उस दौर के एक-एक पल को साझा करने की उन्होंने पुरजोर कोशिश की... इस क्रम में मंजुल ने साथ बैठे अपने बेटे (आलोक पुरोहित) को माध्यम नहीं बनने दिया. .
मुरली मनोहर मंजुल हिंदी कमेंट्री के 'प्रबल योद्धा' क्यों?
दरअसल, क्रिकेट मूल रूप से एक इंग्लिश गेम है. शुरुआती दौर में ऐसी धारणा थी कि इसका विवरण... इसकी कमेंट्री सिर्फ अंग्रेजी में ही की जा सकती है. आखिरकार मुरली मनोहर मंजुल ऐसे अगुआ बन कर उभरे, जिन्होंने इस मिथक को तोड़ा. मंजुल उन दिनों की चुनौती को याद करते हुए कहते हैं, 'बड़ी भारी चुनौती थी. तब हिंदी-अंग्रेजी की कमेंट्री एक ही बॉक्स से हुआ करती थी. मेरे कई ऐसे साथी जो अंग्रेजी कमेंटेटर थे, तंज कसने में पीछे नहीं रहे- ये कोई भाषा है... जिसको हिंदी में बयान किया जाए. तो हम दो-तीन साथियों ने यह बीड़ा उठाया कि एक दिन साबित कर देंगे हिंदी कमेंट्री सुनने वालों की तादाद आपसे कहीं ज्यादा है, क्योंकि यह भारतवर्ष है. यहां विदेशी भाषा की तुलना में घर की भाषा में लोग इसे सुनना ज्यादा पसंद करेंगे.'
'भागीरथी प्रयास..' मंजुल बनते गए घर-घर की शान
आखिरकार मंजुल का यह 'भागीरथी प्रयास' सफल रहा और हिंद कमेंट्री अपनी लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के लिए बेताब दिखी. वो भी एक समय था, जब अंग्रेजी में कमेंट्री करने वालों ने हतोत्साहित किया, मजाक उड़ाया था. मंजुल का यह अनुभव काफी दिलचस्प रहा, जब उन्होंने कहा, 'बिल्कुल हतोत्साहित किया गया. लेकिन 1974 में दिल्ली के फिरोज शाह कोटला में भारत और वेस्टइंडीज के बीच मैच हुआ, वहां हिंदी-इंग्लिश कमेंट्री को पहली बार अलग-अलग बॉक्स में दिया गया. वहां हमारे डायरेक्टर जनरल... शायद बरुआ साहब मौजूद थे (UL Baruah). उन्होंने आकर हमें शाबाशी दी कि पूरे ग्राउंड में सर्वे करके आया हूं, इंग्लिश कमेंट्री के दौरान दर्शक रेडियो सेट बंद कर देते हैं और हिंदी गूंज रही है (उन दिनों लोग ट्रांजिस्टर लेकर मैच देखने जाया करते थे). इसका फीडबैक हम खुद भी मैदान से मॉनिटर कर रहे थे पूछने की जरूरत नहीं थी... तब तक पासा पलट चुका था.'
बीबीसी के जॉन आर्लोट को सुनकर क्रिकेट के प्रति मोह जागा
मंजुल ने 1957 में आकाशवाणी में प्रवेश किया था. सरस कवि के तौर पर रेडियो में स्थान बनाने वाले मंजुल ने इस यात्रा के दौरान अपने नाटक और फीचर्स से पहचान बनाई थी. उस वक्त उनका खेलों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. हालांकि बचपन में उन्होंने अपने गृहनगर जोधपुर में स्थानीय स्तर पर मारवाड़ क्रिकेट क्लब से खुद को जोड़ा था. अचानक खेल (क्रिकेट) की ओर उनका ध्यान कैसे खिंचा, इस सवाल पर मंजुल कहते हैं, 'मैं जोधपुर से आता हूं, जहां क्रिकेट इतना लोकप्रिय नहीं था. लेकिन कुछ स्थानीय क्लब थे, मारवाड़ क्रिकेट क्लब उनमें से एक था. बीबीसी की कमेंट्री सुन-सुनकर चीजें सीखीं. जॉन आर्लोट (John Arlott) मेरे प्रिय कमेंटेटर रहे, जिन्हें मैं अपना आदर्श मानता हूं. क्रिकेट के प्रति मेरा मोह जागा और मैंने वहां वो क्लब ज्वाइन किया और खेल के प्रति प्रगाढ़ता बढ़ती गई. रेडियो में आने के बाद जब हिंदी में आकाशवाणी से खास तौर पर क्रिकेट का प्रसारण शुरू हुआ तो वही प्रगाढ़ता काम आई.'
आकाशवाणी में रहते हुए कैसे कमेंट्री का जिम्मा संभाला?
बात उन दिनों की है, जब मंजुल का 1966 में आकाशवाणी पटना से जयपुर ट्रांसफर हुआ और उन्हें खेल कवरेज का जिम्मा सौंपा गया. कमेंट्री के माइक्रोफोन तक पहुंचने की उनकी कहानी काफी दिलचस्प है. मंजुल कहते हैं, 'तत्कालीन केंद्र निदेशक के सामने रणजी मैच की रनिंग कमेंट्री कराने का प्रस्ताव मैंने रखा. उन्होंने तुरंत मंजूरी दे दी. शायद वह राजस्थान और विदर्भ के बीच मैच था जो चौगान स्टेडियम की मैटिंग विकेट पर खेला जाना था. सारी व्यवस्था मैंने पूरी की थी. दिल्ली से एक अंग्रेजी और हिंदी कमेंटेटर को बुलवा लिया. उन तीन दिनों में मैंने देखा कि हिंदी कमेंटेटर के सामने क्रिकेट फील्ड के दो चार्ट रखें है- पहला दाएं हाथ की बल्लेबाजी और दूसरा बाएं हाथ की बल्लेबाजी का. उसी से मुझे पता चल गया कि ये कमेंटेटर क्रिकेट में एकदम कोरे हैं. खेल का तकनीकी पक्ष से वे अनभिज्ञ जान पड़े. टर्न, स्विंग, गुड लेंथ, ओवर पिच, शॉर्ट ऑफ लेंथ के अलावा हुक, पुल, कट जैसे शॉट उनकी डिक्शनरी में नहीं थे.'
कमेंट्री में आने के लिए ऐसे अपना नाम आगे किया
आखिरकार मंजुल को लगा कि क्यों न मैं खुद इस जिम्मेदारी को निभाऊं. उस शुरुआती दौर को याद करते हुए मंजुल कहते हैं, 'उनके इस अंदाज ने मेरी आंखें खोल दीं. जिस कमेंट्री को मैं अब तक हौवा समझ बैठा था, मुझे लगा यह काम तो मैं खुद बेहतर कर सकता हूं. क्रिकेट का बेसिक ज्ञान और उसकी बारीकियों से मैं पूरी तौर पर वाकिफ था. फिर क्या था... इसी आत्मविश्वास ने मुझे अपनी आवाज में कमेंट्री की रिकॉर्डिंग स्क्रीनिंग कमेटी को भेजने को प्रेरित किया. कमेटी में एक नुमाइंदा आकाशवाणी महानिदेशालय का और दो भूतपूर्व खिलाड़ी होते थे. मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब कुछ ही महीने में मेरे नाम को स्क्रीनिंग कमेटी ने पास कर दिया. 1966 से 1972 के बीच रणजी ट्रॉफी मैचों का आँखों देखा हाल सुनाता रहा. 1972 में बाकायदा क्रिकेट कमेंटरी के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पैनल में आ गया.'
... आखिर कौन बना मंजुल का मददगार?
मंजुल से पहले तक क्रिकेट कमेंट्री पैनल पर रेडियो का नियमित सरकारी कर्मचारी कोई नहीं था. सिर्फ स्टाफ के तौर पर जसदेव सिंह थे. यह वही जसदेव सिंह हैं जो मंजुल के मददगार बनकर सामने आए. मंजुल कहते हैं, 'मुझे यह स्वीकारने में कोई हिचक नहीं कि क्रिकेट कमेंटेटर पैनल तक ले जाने में मेरा वह मित्र मददगार रहा.' जसदेव सिंह क्रिकेट-हॉकी सहित विभिन्न खेलों का आंखों देखा हाल सुनाने वाले देश के बेहद लोकप्रिय कमेंटेटर रहे. उन्होंने 1955 में जयपुर में ऑल इंडिया रेडियो में काम करना शुरू किया और आठ साल बाद वह दिल्ली आ गए थे. 2018 में 87 साल की उम्र में उनका निधन हुआ.
मंजुल ने माना, 'हम दोनों के अलावा क्रिकेट कमेंट्री से अंग्रेजी के वर्चस्व को हटाने के लिए इंदौर के सुशील दोशी (आज भी हिंदी कमेंट्री की शान बने हुए हैं) ने भी बीड़ा उठाया था. उससे पहले जोगा राव जरूर थे, लेकिन विशुद्ध रूप से वह हिंदी भाषाई नहीं थे.'
जब रेडियो पाकिस्तान के कमेंटेटर बने मंजुल के मुरीद
आकाशवाणी की रेडियो कमेंट्री के समानांतर पाकिस्तान रेडियो की उर्दू कमेंट्री भी उभर चुकी थी. उस दौरान उर्दू कमेंट्री की आवाज भारत में भी गूंजती थी. एक दिन ऐसा भी आया जब पाकिस्तान दौरे पर गई भारतीय कमेंट्री टीम में शामिल मुरली मनोहर मंजुल की प्रस्तुति सराही गई. खुद उर्दू कमेंटेटर्स ने मंजुल से कमेंट्री की गुणवत्ता को उनसे हासिल करने की कोशिश की थी. मंजुल कहते हैं, '1978 में भारत का पाकिस्तान दौरा हुआ था (जिसमें कपिल देव ने अपना डेब्यू किया था), 17 साल बाद दोनों टीमें आमने-सामने थीं, उस वक्त पहला टेस्ट फैसलाबाद में खेला गया था. तब पाकिस्तान में उर्दू कमेंट्री अपने प्रारंभिक दौर में थी. वहां अंग्रेजी में अनंत शेतलवाड (Anant Setalvad) और हिंदी में मैं था. यह आत्मप्रशंसा नहीं है... हकीकत यह थी कि उर्दू में कमेंट्री करने वाले हमारी चीजों का अनुसरण करने लगे. दरअसल, हमने कमेंट्री में जान-बूझकर उर्दू की मलाई डाली, जो इतनी क्लिक हुई की वहां के कमेंटेटर हमारी कमेंट्री पर नजर रखने लगे.'
डेब्यू कर रहे कपिल को कमेंट्री बॉक्स तक खींच लाया
कमेंट्री के दौरान मंजुल का उत्साह देखते ही बनता था. फैसलाबाद (1978) में टेस्ट करियर का आगाज कर रहे 19 साल के कपिल देव को श्रोताओं से रू-ब-रू कराने के लिए मंजुल कामयाब रहे थे. वह कहते हैं, 'कपिल देव ने अपने डेब्यू मैच में ओपनर सादिक मोहम्मद का विकेट चटकाया था. कपिल से ब्रेक के टाइम में ऊपर कमेंट्री बॉक्स में आने का आग्रह किया था. उनसे कहा कि आपसे थोड़ी बात करेंगे, ज्यादा नहीं करेंगे.. वो बड़े बेमन से तैयार हुए. मैंने कपिल से वहां के दर्शक और उनके क्रिकेट की समझ के बार में पूछा तो उनका जवाब था- क्रिकेट की सेंस की बारे में पूछते हो तो ये यहां दिखता नहीं. अच्छी फील्डिंग पर खूब तालियां पीट देते हैं और अच्छे शॉट पर चुप रहते हैं. ये बोला था कपिल ने... और मैंने वहीं उन्हें रोक दिया था. मुझे लगा कि यह खतरनाक मोड़ है.'
गावस्कर के 10,000 रन पूरे होने पर मंजुल थे कमेंटेटर
मंजुल के सबसे चहेते क्रिकेटर सुनील गावस्कर ही रहे. वह कहते हैं, 'एक ने हिंदी कमेंट्री तो दूसरे ने क्रिकेट को पॉपुलर बनाने में साथ-साथ कदम बढ़ाए.' गावस्कर ने 1987 में पाकिस्तान के खिलाफ अहमदाबाद टेस्ट में खेलते हुए अपने करियर के 10,000 रन पूरे किए थे, उस ऐतिहासिक मौके पर मंजुल वहां कमेंटेटर के तौर पर मौजूद थे. मंजुल ने कहा, 'मैंने गावस्कर को कमेंट्री बॉक्स में बुलाया था. उन्हें बधाई दी. उन्होंने कहा था कि यह लोगों का प्यार है... गावस्कर से लगातार बातें होती थीं... वह मैच के बारे में कम ही बात करते थे, जनरल बातें ज्यादा करते थे.'
आखिर मंजुल की कमेंट्री में क्या कुछ अलग दिखा..?
मंजुल जब कमेंट्री कर रहे होते थे तो उनका ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपने श्रोताओं पर होता था कि वह कैसे उन्हें अपनी धाराप्रवाह कमेंट्री से बांध सकें, वह कहते हैं,' एकाग्रता पहली जरूरत होती है कमेंटेटर की, औरों से हटकर कैसे की जाए कमेंट्री ये मेरी कोशिश रही. मैंने कमेंट्री के मुहावरेदार भाषा का इस्तेमाल किया. सटीक बोलने की कोशिश की. भाषा के माध्यम से मैंने श्रोताओं की नब्ज पकड़ने का प्रयास किय़ा.' अब आकाशवाणी की ज्यादातर कमेंट्री स्टूडियो से हो रही है, इस पर मंजुल कहते हैं, 'कमेंट्री सजीव होनी चाहिए और मैदान से जुड़ी होनी चाहिए, इस दिशा में गंभीरता से सोचने वाले कोई नहीं है.'
कमेंट्री के दिनों का अपना ये मलाल बयां कर गए मंजुल
मंजुल को आज भी इस बात का मलाल है कि उनके साथ सौतेला व्यवहार किया गया. वह कहते हैं, 'क्रिकेट कमेंट्री करने वाला रेडियो का मैं पहला नियमित सरकारी सेवक था इसलिए यह बात मेरे कई मुंशी-मित्रों और अधिकारियों को रास नहीं आई. आकाशवाणी महानिदेशालय की स्पोर्ट्स सेल पर वे लोग दबाव बनाते रहे कि मंजुल को कम से कम मैच मिले. एक बार भारतीय टीम के साथ पाकिस्तान चला तो गया, मगर मुझे बीच दौरे से वापस बुलाने की खिचड़ी दिल्ली में पकती रही. अगर तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री एनकेपी साल्वे ने दखल न दिया होता तो दिल्ली के मित्र मनचाही करके छोड़ते. वैसे दो बार ऐन वक्त पर मेरा नाम इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के दौरे से हटाया जा चुका था.'
... आखिरकार 2004 में मंजुल ने अधूरे मन से छोड़ दी कमेंट्री
आखिरकार मंजुल ने 2004 में अधूरे मन से कमेंट्री की दुनिया से खुद को अलग कर लिया. आकाशवाणी से अपनी पीड़ा को साझा किए बगैर उन्होंने अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कमेंट्री से संन्यास ले लिया. मंजुल अपनी रचनाओं को माध्यम से भी छाए रहे. उनकी रचना 'आखों देखा हाल' को 1987 में भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार मिला. उनकी 2009 में लिखित 'आकाशवाणी की अंतर्कथा' को काफी प्रसिद्धि मिली. इसके अलावा मंजुल अपनी कविताओं और गीतों से पाठकों को लुभाते रहे.
अंत में उनके ये शब्द निश्चित तौर पर ध्यान खींचते हैं -
'अतिशयोक्ति नहीं, हिंदी की क्रिकेट कमेंटरी 'किचन से कमोड' तक पहुंच गई. आज टेलीविजन जिस तरह बढ़-चढ़ कर क्रिकेट कमेंट्री का ब्याज खा रहा है, कौन नहीं जानता... उसके पीछे रेडियो के गहन परिश्रम का मूलधन लगा हुआ है.'
विश्व मोहन मिश्र