क्रिकेट का वो काला दिन… एक तीखा इशारा और बॉलर ने स्टंप उखाड़कर बल्लेबाज को दौड़ाया

भारतीय क्रिकेट का इतिहास सिर्फ जीत और रिकॉर्ड की कहानी नहीं है... इसमें कुछ ऐसे काले दिन भी शामिल हैं जो खेल की मर्यादा पर सवाल उठाते हैं. 1991 के दलीप ट्रॉफी फाइनल में बड़ौदा के तेज गेंदबाज राशिद पटेल के गुस्से का शिकार बनते हुए लांबा पर स्टंप उखाड़कर हमला किया गया और उन्हें मैदान में दौड़ाया गया, जिससे मैच का माहौल पूरी तरह बर्बाद हो गया...

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गुस्साए राशिद पटेल ने स्टंप उठाकर दिलीप ट्रॉफी के मैच में रमण लांबा का पीछा किया. गुस्साए राशिद पटेल ने स्टंप उठाकर दिलीप ट्रॉफी के मैच में रमण लांबा का पीछा किया.

विश्व मोहन मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 02 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:18 AM IST

भारतीय क्रिकेट का इतिहास सिर्फ जीत, रिकॉर्ड और ट्रॉफियों की कहानी नहीं है. इसके पन्नों में कुछ ऐसी घटनाएं भी दर्ज हैं, जो आज भी खेल की आत्मा को बेचैन कर देती हैं. रमण लांबा की कहानी ऐसी ही है- जहां प्रतिभा, टकराव और त्रासदी एक ही धागे में बंधे नजर आते हैं.

2 जनवरी 1960 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे रमण लांबा दाएं हाथ के आक्रामक सलामी बल्लेबाज थे. उन्होंने भारत के लिए भले ही चार टेस्ट मैच खेले हों, लेकिन घरेलू क्रिकेट में अपनी अलग पहचान बनाई थी. चयनकर्ताओं की नजर में वे भरोसेमंद ओपनर माने जाते थे- लेकिन लांबा की पहचान सिर्फ उनके रन या टेस्ट कैप तक सीमित नहीं रह सकी.

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उनके करियर के साथ एक ऐसा वाकया हमेशा के लिए जुड़ गया, जिसने भारतीय घरेलू क्रिकेट के इतिहास पर गहरा दाग छोड़ दिया. और यहीं से उनकी कहानी एक ऐसे खिलाड़ी से टकराती है, जिसका नाम भले ही आंकड़ों में खो गया हो, लेकिन 'एक दिन' की वजह से हमेशा याद रखा गया. वह खिलाड़ी थे- बड़ौदा के तेज गेंदबाज राशिद पटेल.

ऐसे कई खिलाड़ी भारतीय टेस्ट टीम तक तो पहुंचे, लेकिन पदार्पण के बाद दोबारा राष्ट्रीय जर्सी पहनने का मौका नहीं मिला. राशिद पटेल भी उन्हीं में से एक थे. नवंबर 1988 में न्यूजीलैंड के खिलाफ मुंबई टेस्ट में उन्हें आजमाया गया, मगर गेंदबाजी में वह असरदार नहीं दिखे. उसी एक मैच के साथ उनका अंतरराष्ट्रीय करियर थम गया.

आंकड़ों में उनका नाम भले ही फीका पड़े, लेकिन रमण लांबा के करियर से जुड़ा एक दिन ऐसा है, जिसने राशिद पटेल को भारतीय क्रिकेट के सबसे काले अध्यायों में स्थायी जगह दिला दी.

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दलीप ट्रॉफी फाइनल 1991: जब क्रिकेट शर्मसार हुआ

25 से 29 जनवरी 1991, वेन्यू- जमशेदपुर का कीनन स्टेडियम.
दिलीप ट्रॉफी फाइनल में आमने-सामने थीं कपिल देव की कप्तानी वाली नॉर्थ जोन और रवि शास्त्री की अगुवाई में वेस्ट जोन.

नॉर्थ जोन ने 729/9 रन बनाकर पारी घोषित की. जवाब में वेस्ट जोन 561 रनों पर ऑल आउट हो गई. चार दिन का खेल बीत चुका था और नतीजा लगभग तय था. पांचवें और आखिरी दिन नॉर्थ जोन ने बचे हुए समय में दूसरी पारी शुरू की.

सलामी बल्लेबाज थे अजय जडेजा और पहली पारी में 180 रन बना चुके रमण लांबा. स्कोर 9.5 ओवरों में 59/0 तक पहुंच चुका था. सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन तभी माहौल बदलने लगा.

राशिद पटेल और रमण लांबा.

... गुस्से में बीमर से स्टंप तक

राशिद पटेल गुस्से में राउंड द विकेट आकर गेंदबाजी कर रहे थे. गेंदें खतरनाक एरिया में पड़ रही थीं. लांबा ने बैट का हैंडल दिखाकर नाराजगी जताई. यही वह पल था, जब संयम पूरी तरह टूट गया.

राशिद ने लगभग आधी पिच पर आकर लांबा की ओर बीमर फेंकी. लांबा का सिर बाल-बाल बचा. इसके बाद राशिद ने स्टंप उखाड़ा और लांबा पर हमला करने के इरादे से उनकी ओर दौड़ पड़े. थर्ड मैन तक यह पीछा चला. लांबा खुद को बचाते रहे और स्टेडियम में मौजूद हर दर्शक अवाक रह गया.

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मामला यहीं नहीं रुका. दर्शकों का गुस्सा भी फूट पड़ा. पत्थर फेंके गए. बाउंड्री पर फील्डिंग कर रहे विनोद कांबली को चोट लगी. हालात इतने बिगड़ गए कि खिलाड़ियों को पवेलियन में भेजना पड़ा और ट्रॉफी अंदर ही विजेता कप्तान को सौंप दी गई.

इस शर्मनाक घटना के बाद राशिद पटेल पर 13 महीने का प्रतिबंध लगाया गया, जबकि रमण लांबा को भी 10 महीने का बैन झेलना पड़ा. लांबा पूरी तरह निर्दोष नहीं थे- मैच के दौरान हुई छींटाकशी ने आग में घी डाला था. लेकिन हिंसा ने क्रिकेट की मर्यादा को जिस तरह तोड़ा, उसने खेल की आत्मा को गहरी चोट पहुंचाई.

मैदान पर ही छूटीं सांसें

रमण लांबा की कहानी यहीं खत्म नहीं होती- बल्कि यहीं से यह और दर्दनाक हो जाती है. 1998 में वे बांग्लादेश में क्लब क्रिकेट खेल रहे थे. ढाका में एक मैच के दौरान वे शॉर्ट लेग पर फील्डिंग कर रहे थे, बिना हेलमेट के.

बल्लेबाज मेहराब हुसैन ने जोरदार शॉट खेला और गेंद सीधे लांबा के सिर पर जा लगी. वह मैदान पर गिर पड़े. हालात बेहद गंभीर थे. दिल्ली से न्यूरोसर्जन को बुलाया गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद लांबा को बचाया नहीं जा सका. महज 38 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

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रमण लांबा उन चुनिंदा क्रिकेटरों में शामिल हो गए, जिनकी मौत मैदान पर हुई- इंग्लैंड के एंडी डकेट और विल्फ स्लैक की तरह. लांबा की मौत ने शॉर्ट लेग पर फील्डिंग के दौरान सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए और हेलमेट को लेकर बहस को नई धार दी.उनकी कहानी आज भी यह याद दिलाती है कि क्रिकेट चाहे कितना ही बड़ा खेल क्यों न हो- खिलाड़ी की जान से बड़ा कुछ नहीं.

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