उत्तराखंड में भारी बारिश के बीच 'वैली ऑफ फ्लावर्स' पहुंची एक अकेली लड़की का अनुभव

मूसलाधार बारिश, टूटते पहाड़ और गिरते पेड़ों के बीच एक अकेली लड़की यात्रा पर निकलती है. यह दिल्ली से उसकी पहली सोलो ट्रिप है. रोमांच अकेले होने का है तो डर प्रकृति के प्रचंड तेवर का भी है. पढ़िए एक ऐसा ही यात्रा वृतांत.

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'वैली ऑफ फ्लावर्स' की रोमांचक यात्रा 'वैली ऑफ फ्लावर्स' की रोमांचक यात्रा

प्रज्ञा बाजपेयी

  • हरिद्वार,
  • 19 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 11:21 AM IST

सुबह के तीन बजे थे जब हमारी बस दिल्ली से ऋषिकेश पहुंची. इस बार मैं सोलो ट्रैवलर होने का रोमांच उठाना चाहती थी इसलिए घर से अकेले ही निकल आई थी.

बस से उतरते ही अंदाजा हो गया कि इस बार कुछ ज्यादा ही एडवेंचर होने वाला है. ऋषिकेश में तेज बारिश हो रही थी. मेरे पास ना रेनकोट था और ना छतरी, इसलिए भागकर एक टीनशेड के नीचे खड़ी हो गई. 

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ऋषिकेश से मुझे 'वैली ऑफ फ्लावर्स' यानी फूलों की घाटी जाना था, उसके बाद हेमकुंड साहिब और फिर बद्रीनाथ धाम. 

मैंने उत्तराखंड परिवहन की बद्रीनाथ जाने वाली बस का टिकट पहले ही बुक कर लिया था.

बद्रीनाथ जाने वाली बस के रूट में ही गोविन्दघाट पड़ता है, जहां से 'वैली ऑफ फ्लावर्स' ट्रेक की शुरुआत करनी थी. लेकिन मौसम ने तो मेरी अग्निपरीक्षा लेने की ठान ली थी. 

कुछ देर बाद पूछताछ काउंटर खुला तो पहला झटका लगा. पता चला कि जगह-जगह लैंडस्लाइड की वजह से बस ही कैंसल कर दी गई है. बारिश और अंधेरे में अकेले इधर-उधर भागते मैं दूसरी बस या टैक्सी देख रही थी और लोग मुझे.

कुछ लोग मदद के लिए आए और बताया कि एक प्राइवेट बस बद्रीनाथ तक जा रही है. मैं फटाफट से उस बस में बैठ गई. थोड़ी सांस ली ही थी कि एक लड़का आया और उसने कहा कि ये सीट तो उसने बुक की हुई है.

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तभी मेरे बगल में बैठी लड़की की आवाज आई- भैया आप आगे बैठ जाओ, दो लड़कियां साथ में बैठ जाएंगी. थोड़ा एडजस्ट कर लो.

मैं उस अनजान लड़की को हैरत से देखने लगी. उसने दूसरे की सीट पर मेरा कब्जा करवा दिया था. फिर हम दोनों की बातचीत शुरू हुई तो उसने बताया कि वह भी अकेले घूमने आई है और उसे बद्रीनाथ मंदिर जाना है.

खैर, बस चल पड़ी. कुछ देर बाद ही बस कंडक्टर ने कहा कि श्रीनगर वाला रास्ता खराब है, इसलिए बस टिहरी से होकर जाएगी.

ये रूट और भी ज्यादा लंबा था. बस मुश्किल से एक घंटे चली होगी कि रास्ते में लैंडस्लाइड ने हमें आगाह कर दिया.

इससे पहले मैंने सिर्फ खबरों में ही लैंडस्लाइड देखा था. यहां हमने करीब डेढ़-दो घंटे इंतजार किया और तब जाकर जेसीबी आई और रास्ता क्लियर किया.

बस फिर चली लेकिन सिर्फ 15 मिनट. आगे हमें दूसरा लैंडस्लाइड मिल गया. अब हमने अपना सिर पकड़ लिया.

यहां एक दूध और ब्रेड का ट्रक जा रहा था. लोगों ने दूध-ब्रेड लाकर खाना शुरू कर दिया. इसके अलावा, उस जगह पर कोई और विकल्प था भी नहीं. खैर, यहां हमें पहले वाले लैंडस्लाइड से कम इंतजार करना पड़ा.

जेसीबी रास्ता साफ करते हुए आगे बढ़ रही थी. एक ने मजाक में कहा- जितने लैंडस्लाइड हैं रास्ते में, उसके हिसाब से तो बस के आगे एक जेसीबी चलनी ही चाहिए.

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ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे लैंडस्लाइड रास्ते भर दिखे. लंबा जाम लग रहा था. बारिश में खतरनाक पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए हम रात के 9 बजे जोशीमठ पहुंचे.

यहां पहुंचते ही ड्राइवर ने हाथ खड़े कर दिए. उसने कहा- अब बस आगे नहीं जाएगी. रात हो गई है और आगे लैंडस्लाइड का खतरा भी है. मैंने भी सोचा कि ठीक है, यहीं स्टे कर लेते हैं, सुबह निकल जाएंगे लेकिन कुछ यात्रियों ने दबाव बनाया और कहा कि ड्राइवर ने बस बहुत धीमे चलाई है.वो कम से कम गोविन्दघाट तक तो छोड़े.

लोगों ने कहा, जोशीमठ कौन सा सुरक्षित है, यहां तो लोग खुद घर खाली कर रहे हैं. सबके जिद करने पर बारिश के बीच बस फिर चल पड़ी. 

इस वक्त तक मुझे भी डर लगने लगा था. कभी भी कोई पहाड़ दरक कर नीचे आ सकता था. सड़क कहीं से भी गायब हो सकती थी. बस कहीं भी खाई में गिर सकती थी. मैं और वो लड़की शिवानी, अब तक जो खूब बातें कर रहे थे, एकदम दिल थामकर खामोश बैठे थे. बस अब डर बोल रहा था.

अचानक बस की हेडलाइट भी खराब हो गई. अब हम बीच रास्ते वो भी संकरे पहाड़ी रास्ते में फंस गए थे. कुछ देर तक सब बस में बैठे रहे. मेरा ब्लैडर फटा जा रहा था तो मैंने कंडक्टर से कहा कि मैं वॉशरूम होकर आती हूं. लेकिन जैसे ही नीचे उतरने लगी, बस की लाइट ठीक हो गई.

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अब मुझे फिर से वापस बैठना पड़ा क्योंकि उस वक्त कोई एक मिनट की देरी भी बर्दाश्त नहीं कर सकता था. जैसे-तैसे करके हम रात के 10.30 बजे गोविन्दघाट पहुंच गए. शिवानी भी मेरे ही साथ गोविन्दघाट उतर गई. उसने कहा कि वो भी मेरे साथ फूलों की घाटी ही जाएगी. उसके बाद बद्रीनाथ. 

हमें बस से उतरते ही जो पहला होटल दिखा, हम उसमें रुक गए. थकान इतनी थी कि बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई.

सुबह हमें 'वैली ऑफ फ्लावर्स' ट्रेक के लिए निकलना था. प्लान था सुबह 5 बजे निकलने का लेकिन लंबे और खतरनाक सफर ने बुरी तरह थका दिया था. 

सुबह 8 बजे हमने गोविन्दघाट से शेयरिंग टैक्सी ली और पुलना पहुंच गए. यहां से पहले घांघरिया तक 10 किमी का ट्रेक करना था. फिर 'वैली ऑफ फ्लावर्स' के अंदर 4 से 7 किमी का ट्रेक.

ट्रेक के रास्ते में अलकनंदा नदी का बहाव तेज हो गया था. 10 किमी. की ट्रेक के बाद शाम के 3-3.30 के करीब मैं घांघरिया पहुंच गई. वहां एक कैफे में बैठकर कॉफी पी और सैंडविच खाया लेकिन बिल उम्मीद से थोड़ा ज्यादा था. दुकान वाले से पूछा तो उसने कहा कि यहां खाने-पीने का सामान घोड़े पर लादकर ऊपर तक लाया जाता है इसलिए हम ज्यादा पैसे लेते हैं.

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मौसम खराब होने की वजह से टूरिस्ट कम थे इसलिए हमें होटल रूम 1000 रुपये में ही मिल गया.

दूसरे दिन सुबह 7 बजे के करीब वैली ऑफ फ्लावर्स की ट्रेक शुरू कर दी. वैली ऑफ फ्लावर्स सुबह 7 बजे ही खुलता है और 12 बजे के बाद किसी को एंट्री नहीं दी जाती है. वैली ऑफ फ्लावर्स से ट्रेक पूरा करके शाम 5 बजे तक बाहर भी निकलना होता है. घांघरिया के होटल से 4 किमी का ट्रेक करने के बाद 'वैली ऑफ फ्लावर्स' पहुंच गए.

वैली ऑफ फ्लावर्स का सुंदर नजारा

चारों तरफ खूबसूरत फूल, बिना पंख के हवा के सहारे उड़ते बादल और पहाड़ों की हरियाली के बीच दूध की तरह सफेद पुष्पावती नदी को देखकर मन खुशी से उछल पड़ा. सारी थकान और मुश्किलें फूलों की घाटी में समा गई.

हर एक जगह फोटो खींचने लायक लग रही थी. कैमरे से ज्यादा यहां के दृश्य मन में कैद होने लगे. मेरा फोन जल्द ही ऑफ हो गया. लेकिन हम जिसे महसूस कर सकते हैं, उनके लिए कैमरे की जरूरत नहीं पड़ती. 

हम 'वैली ऑफ फ्लावर्स' के तीन किमी और अंदर गए और फिर दिखी अपनी धुन में बहती पुष्पावती नदी. ऐसा लग रहा था मानो पुष्पावती नदी के पानी में पुष्प के सफेद रंग घुले हुए हैं.

ज्यादातर लोग यहां तक नहीं आ पाते. कुछ थकान की वजह से और कुछ सुबह देर से ट्रेक शुरू करने की वजह से. अगर 'वैली ऑफ फ्लावर्स' जा रहे हैं तो इस पॉइंट तक जरूर जाना चाहिए. इस नदी तक पहुंचे बिना 'वैली ऑफ फ्लावर्स' का अहसास अधूरा रह जाता है.

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वैली ऑफ फ्लावर्स से शाम 5 बजे तक बाहर निकलना था इसलिए भारी मन से इस प्यारी सी जगह को अलविदा कहना पड़ा.

फूलों की घाटी में होने की वजह से इस नदी का नाम पुष्पावती है

अब बारिश शुरू हो गई थी. बारिश धीरे-धीरे तेज होने लगी और रास्ता फिसलन वाला हो गया था. उतरने का काम भी अब मुश्किल हो चला था. लोग संभल-संभल कर सीढ़ियों से उतर रहे थे.

बारिश के कारण शांत पुष्पावदी नदी अब पूरे उफान पर थी. पुष्पावती नदी किसी समंदर से प्रतिस्पर्धा करती मालूम पड़ने लगी. 

प्रकृति का सौंदर्य कब करवट बदल खौफ में बदल जाता है, पता भी नहीं चलता. उत्तराखंड प्रकृति की गोद में बैठा प्रदेश है तो आपदा की दहलीज पर भी खड़ा दिखता है. 

ये सब सोचते हुए 'वैली ऑफ फ्लावर्स' से निकल घांघरिया में अपने होटल पहुंच गए. रेनकोट पहनने के बावजूद मैं भीग चुकी थी. जूते पूरी तरह गीले हो चुके थे. इसलिए 400 रुपये में एक रूम हीटर किराए पर लिया. मेरे एक पैर में थोड़ी चोट भी आ गई थी इसलिए सफर में मेरी दोस्त बन चुकी शिवानी गुरुद्वारे से दवा और गरम पट्टी लेकर आई.

अगले दिन हेमकुंड साहिब की चढ़ाई करनी थी, जिसके बारे में पहले से ही पढ़ा था कि वो एकदम स्टीप (खड़ी चढ़ाई) है.

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सबने कहा कि तुम कल घोड़ा कर लेना, रिस्क मत लेना. मैंने उस वक्त कुछ नहीं कहा लेकिन मन में सोच लिया था कि जाऊंगी तो पैदल ही, वरना नहीं जाऊंगी.

सुबह 6 बजे हेमकुंड साहिब की चढ़ाई के लिए निकल पड़े. पैर की चोट को लेकर डर तो लग रहा था लेकिन भगवान का नाम लेकर हेमकुंड साहिब का 6 किमी का ट्रेक शुरू कर दिया.

पूरी रात बारिश हुई थी और उस वक्त भी हो रही थी. काफी देर चलने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मेरी चोट एकदम से गायब हो गई है. फिर तो मैं लगातार चलती गई और सिर्फ 3 घंटे में ही हेमकुंड साहिब की खड़ी चढ़ाई पूरी कर ली. लेकिन बारिश एक मिनट के लिए भी नहीं रुकी. हेमकुंड साहिब का पूरा नजारा बादलों ने अपनी कैद में रख लिया था.

लेकिन बादल और आप एक ही रास्ते पर चलें तो इससे अच्छा क्या हो सकता है. बादल हमारा हमसफर बन चुका था. कभी बादल को छूने की कोशिश करती तो कभी सांस के जरिए मन में भर लेने की. 

हेमकुंड साहिब 15000 फीट की ऊंचाई पर है लेकिन कई बुजुर्ग सिख तीर्थयात्री भी वहां पहुंचे हुए थे.

67 साल के एक बुजुर्ग ने बताया कि वह 10वीं बार ये यात्रा कर रहे हैं. उनके साथ उनके पिंड (गांव) के कई लोग थे. मैंने उनके साथ एक तस्वीर खिंचवाई तो उन्होंने अपना नंबर देते हुए कहा कि ये मुझे व्हाट्सऐप कर देना, अपने बच्चों को दिखाऊंगा कि एक लड़की अकेले आई हुई थी और तुम लोग घर से निकलते ही नहीं. मैंने हंसते हुए हामी भर दी.

हेमकुंड साहिब में भीगे हुए यात्री ठंड से कांप रहे थे इसलिए गुरुद्वारे में अंदर सबको कंबल दिए जा रहे थे. मैंने भी एक कंबल लिया और अंदर बैठ गई. 

हेमकुंड साहिब में लाउडस्पीकर पर अनाउंस किया जा रहा था कि यात्री दर्शन करने के बाद ज्यादा देर तक ना रुकें. ऑक्सीजन की कमी है और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है. हमने लंगर खाया और पास के लक्ष्मण मंदिर में दर्शन किए और फिर वापस घांघरिया की ओर चल पड़े. अगले दिन गोविन्दघाट लौटना था और फिर बद्रीनाथ दर्शन भी करना था.

लोगों ने बताया कि रास्ता टूटने की वजह से चारधाम यात्रा बंद कर दी गई है. ये खबर सुनकर हम थोड़ा सा मायूस हो गए लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ी. घांघरिया में ही पता चला कि अब वैली ऑफ फ्लावर्स के अंदर भी नहीं जाने दिया जा रहा है क्योंकि वहां एक पुल टूट गया है. हम अब मन ही मन खुद को खुशनसीब मान रहे थे.

अगले दिन सुबह 8 बजे के बाद बारिश धीमी हुई तो हमने उतरना शुरू कर दिया. दोपहर को ही हम गोविन्दघाट पहुंच गए. यहां उस वक्त हल्की धूप निकली हुई थी. यहां से एक गाड़ी किराए पर की और बद्रीनाथ के लिए निकल गए. बद्रीनाथ धाम यात्रा ऋषिकेश की तरफ से आने वालों के लिए बंद थी लेकिन हम गोविन्दघाट में थे. यहां से लोगों को जाने दिया जा रहा था. बद्रीनाथ का रास्ता भी काफी खतरनाक था, जगह-जगह सड़क पर पत्थर गिरे हुए थे. जब हम मंदिर पहुंचे तो कपाट बंद थे इसलिए हमने पास का माणा गांव भी घूम लिया.

हिंदुस्तान का पहला गांव माणा

इसे पहले 'हिंदुस्तान का आखिरी गांव' कहा जाता था लेकिन अब इसे 'हिंदुस्तान का पहला गांव' कर दिया गया है.

इस गांव से तिब्बत का बॉर्डर लगता है. पिछले साल अक्टूबर में चमोली की यात्रा के दौरान जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी माणा गांव गए थे, उस समय उन्होंने इसे आखिरी गांव कहने की बजाय पहला गांव कहने पर मुहर लगाई थी.

पीएम मोदी ने कहा था कि उनके लिए सीमाओं पर बसा हर गांव देश का पहला गांव ही है. उन्होंने कहा था, पहले जिन इलाकों को देश की सीमाओं का अंत मानकर नजरअंदाज किया जाता था, हमने वहां से देश की समृद्धि का आरंभ माना है. 

उस दिन 15 अगस्त था तो हमने फौजियों के साथ कुछ तस्वीरें भी खिंचवाईं. इससे बढ़िया स्वतंत्रता दिवस नहीं मन सकता था.

इसके बाद हमें बड़ी आसानी से बद्रीनाथ के दर्शन भी हो गए. वहां बिल्कुल भीड़ नहीं थी.

अब तक इस पूरे सफर में मैं करीब 50 किलोमीटर का ट्रेक पूरा कर चुकी थी. खराब मौसम और तमाम चुनौतियों के बावजूद मैं हर वो जगह जा पाई जहां जाने का प्लान था.

अब हम बहुत खुश थे लेकिन लौटेंगे कैसे, ये सोचकर चिंता हो रही थी. गोविन्दघाट में जब इंटरनेट चला तो तबाही के वीडियो देख हम डर गए. हमसे पहले जो कुछ साथी ऋषिकेश के लिए निकले थे, वो वहां से फोटो और वीडियो भेज रहे थे. सब कहीं ना कहीं रास्ते में ही फंसे हुए थे. लोग टैक्सी वालों को 500 की जगह 10,000  रुपये भी देने को तैयार थे.

चमोली में पीपलकोटी के पास सड़क टूटकर बिल्कुल गायब हो गई थी. लोग हैरान थे कि इतने अच्छे हाईवे की इतनी बुरी हालत हो चुकी है. लेकिन प्रकृति जब तेवर में होती है तो मजबूत से मजबूत हाईवे तबाह हो जाते हैं.  

गोविन्दघाट से कोई भी वाहन सीधे ऋषिकेश तक नहीं जा रहा था. पहले हम शेयरिंग टैक्सी से जोशीमठ पहुंचे, फिर वहां से दूसरी टैक्सी लेकर पीपलकोटी पहुंचे, जहां सड़क टूटकर खाई में गिर चुकी थी.

एक तरफ ऋषिकेश की ओर से आए टूरिस्ट खड़े थे और दूसरी तरफ हम. यहां ना कहीं खड़े होने की सुरक्षित जगह थी और ना बैठने की. हमारे पैरों तले जमीन वाकई खिसकी हुई थी. हमारे सामने ही छोटे-छोटे पत्थर ऊपर से गिर रहे थे. पुलिस लगातार भीड़ को सावधान कर रही थी.

पीपलकोटी के पास भूस्खलन से सड़क ही गायब हो गई

जेसीबी की तीन-तीन मशीनें काम पर लगी थीं. पत्थर इतने बड़े कि जेसीबी चलाने वाले को भी ब्रेक लेने पड़ रहे थे.

ऐसे ही एक ब्रेक के बीच में टूटी सड़क के कोने-कोने से लोगों को गुजरने दिया जा रहा था. आर्मी के जवान भी वहां मौजूद थे. पहाड़ के संकरे किनारे से लोग सामान लादकर चढ़ रहे थे. कोई एक गिरता तो सब गिरते. डरते-डरते हमने उसे पार किया और दूसरी तरफ पहुंचे.

वहां से हमने दूसरी टैक्सी पकड़ी. टैक्सी वाले ने मजबूरी का फायदा उठाते हुए हमसे दो-दो हजार रुपये लिए. हमें लगा था कि इस रास्ते के बाद सब ठीक होगा लेकिन तमाम जगहों पर सड़कों पर लैंडस्लाइड और दरारें दिखीं. कई लोगों के घर और दुकानें अब मलबा बन चुकी थी. 

तबाही के दृश्यों से नजरें चुराते हुए शाम के 5 बजे के करीब हम ऋषिकेश पहुंचे तो राहत की सांस ली. ऋषिकेश से रात 10.30 बजे की दिल्ली की बस की टिकट बुक की और सुबह 4 बजे मैं घर पहुंची. यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं सुरक्षित घर लौट आई हूं. ये सफर मेरी जिंदगी का अब तक का सबसे खतरनाक और रोमांचक सफर था. लेकिन ये रिस्क लेने लायक था.

जिंदगी एक यात्रा है तो यात्रा हमेशा सुविधाओं से लैस नहीं होती. यात्रा हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त करती है और श्रेष्ठता की ग्रंथियों से बाहर निकालती है. ऊंचे पर्वतों और नदियों के उफान को देखते हुए अहसास-ए-कमतरी घेर लेती है. लेकिन यही अहसास हमें अगली यात्रा के लिए प्रेरित करता है. यात्राओं का थम जाना जीवन के थमने जैसा है. लड़कियों के लिए अकेले यात्रा पर निकलना उनके आत्मविश्वास को विस्तार देने जैसा होता है. कई बार लड़कियों को बैग समेटकर दुनिया अपनी नजरों से देखने निकल जाना चाहिए. जहां किसी पिता, पति या प्रेमी का पहरा ना हो. 

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