सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है...

गुस्से का गाली से पुराना रिश्ता है. गालियां भाषाओं और बोलियों जितनी पुरानी हैं. लेकिन संसार और सोच भले ही आगे बढ़े हों, गालियां अभी भी दैहिक, लैंगिक और घटिया बनी हुई हैं.

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गाली कोई नेता दे या कार्यकर्ता, उसे खारिज किया जाना चाहिए. गाली कोई नेता दे या कार्यकर्ता, उसे खारिज किया जाना चाहिए.

पाणिनि आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 03 सितंबर 2025,
  • अपडेटेड 1:57 PM IST

ज़ेहरा निगाह की एक खासी मशहूर नज़्म है- सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है. इंसानों से मुखातिब इस ऩज्म को समझिए. ये ऩज्म दरअसल बता रही है कि दस्तूर अब जंगलों का ही बचा है. हमने दस्तूरों को बदस्तूर तोड़ा है. इंसान कोशिश करता रहा है कि एक आदर्श मानवीय आचरण की स्थापना की जाए और लोग उसी को समाजी दस्तूर मानें. लेकिन भावना को दुर्भावना में बदलते देर नहीं लगती. असहमतियां धैर्य को चुग लेती हैं. जिह्वा विषाक्त बनकर पीड़ा पहुंचाने लगती है.

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गालियों का इतिहास भाषाओं के इतिहास जितना पुराना है. ऋग्वेद में असुर या मलेच्छ जैसे शब्द शत्रु को अपमानित करने के लिए प्रयुक्त हुए. यह क्रम अब भी है. ज्यादा खाने वाले को या बुली करने वाले को राक्षस कह दिया जाता है. 3000 वर्ष ईसापूर्व मेसोपोटामिया की सभ्यता के अभिलेखों में यानी अब से तकरीबन पांच हज़ार साल पहले भी गालियों का उल्लेख मिलता है. भाषा इतिहास के जानकार बताते हैं कि लैंगिक या यौनिक गालियों का प्रयोग मध्यकाल और विक्टोरियन पीरियड की देन है. किसी भी भाषा में या किसी भी समाज के सांस्कृतिक वजूद में गाली मिल ही जाती है. आज भाषाएं और संवाद के माध्यम बढ़े हैं. और इन्हीं के साथ बढ़ा है गालियों का दायरा, तरीका और नई गालियां. अन्य भाषाओं से आयातित गालियां भी अब अक्सर सुनने को मिलती हैं. हाल ही में एक डिबेट के दौरान एक गेस्ट अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए एक हिंदी गाली का प्रयोग करती दिखीं. हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के लोग अंग्रेज़ी गाली देकर ज्यादा उग्रोत्साहित महसूस करते हैं.

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मनोविज्ञान कहता है कि गाली एक प्रकार की अभिव्यक्ति है. हिंसा या हानि की भौतिक अभिव्यक्ति करने से पहले व्यक्ति एक दूसरे को ठेस पहुंचाने के लिए अप्रिय, अशोभनीय और निंदाकरणीय शब्दों का प्रयोग करते हैं. हताशा, क्रोध, ईर्ष्या, हार, दुख और नफरत जैसी नकारात्मक परिस्थितियां व्यक्ति से ऐसे शब्दों की अभिव्यक्ति कराती हैं. मकसद है ठेस पहुंचाना. जिसे गाली दी गई हैं, वो विचलित हो, दुखी हो, भावनात्मक रूप से आहत हो, उसे कष्ट पहुंचे, ये गाली का मंतव्य है. गाली बकने वाला अपनी बात के प्रभाव या अपनी नकारात्मक स्थिति के अनुरूप गाली का स्तर तय करता है. जितना बड़ा गुस्सा, हताशा या क्षोभ, उतनी ही बड़ी गाली. गाली केवल वहीं तक सीमित नहीं रही जहां भाषा समझी या सुनी जा सकती थी, मच्छर, मौसम, मवेशी, तार, कंकड़, रास्ते, अंधेरा, अस्वस्थता और उम्र, कोई भी इसका निशाना बनता रहा.

हालांकि गाली का व्यवहार संसार वहीं तक सीमित नहीं रहा. गालियों की ठेस को हिंसात्मक प्रतिक्रिया में बदलने से रोकने के लिए समाज ने गाली का सामान्यीकरण तक कर डाला. आम बोलचाल में गाली वाले शब्दों का प्रयोग बातों में हास्य, प्रभाव, भंगिमा और पन पैदा करने के लिए भी किया जाने लगा. इससे बातचीत की भाषा फूहड़ और निचले स्तर की हुई और लोग इससे आहत होने की जगह इसकी फूहड़ता का प्रमोद पाने लगे.

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समाज ने गालियों के इर्दगिर्द एक सांस्कृतिक संरचना तैयार की. शादियों में गाली, लोकगीतों में गाली, सिनेमा में गाली, होली के फाग में गाली, चुहल में गाली, मजे में गाली, मौज में गाली, तारीफ में गाली, उत्साह में गाली, अभिव्यक्ति में गाली. गाली भाषा में सामान्यीकृत होकर संवाद का योजक तत्व बना ली गई.

हरियाणा, पंजाब, यूपी, बिहार का नाम लेकर गाली के सामान्यीकरण का परिसीमन नहीं किया जा सकता. सभी राज्य और सभी देश, सभी भाषाएं और सभी लोग इससे ग्रस्त और सांस्कृतिक रूप से अभ्यस्त हैं. मसला है प्रयोग का. सामाजिक दायरे में मनुष्य ने बहुत से नियम बनाए जिनके पालन से समाज में एक शिष्टता और संतुलन बना रहे. कपड़े पहनना, चोरी न करना, परिवार बनाना, विवाह करना, अपने श्रम और अपनी संपत्ति से ही जीविका चलाना, टीम या झुंड बनाना, एकत्र होना, किसी को अकारण कष्ट नहीं देना, दूसरे के अस्तित्व की इज्जत करना ऐसे ही कुछ नियम हैं. भविष्य में इन्हीं के विस्तार से कानून बने, संविधान बने, राजकाज, कामकाज और लोकलाज के कायदे बने. 

लेकिन विज्ञान, अनुसंधान और समाजी सोच भले ही दायरे के बाद दायरा बढ़ाती चली हो, क्रोध, कुंठा, ईर्ष्या और हार की अवस्था में इंसान अभी भी जंगली जानवर बनने में देरी नहीं करता. हाथ-पैर चलाने या प्रकट हिंसा करने से पहले वो गाली को अपना हथियार बना लेता है और दनादन हमले करने लगता है. सभ्य होने के सारे सबक और संविधान, विधान, संवाद के सारे नियम इस समय व्यक्ति भूलने लगता है. आपराधिक वृत्ति उसके दिमाग को नियंत्रित करने लगती है और वो गाली देकर इसे अभिव्यक्त करने लगता है. सबसे दुखद है इन गालियों में स्त्री का केंद्रीकरण. गालियों के संसार में सबसे बड़ी गालियां स्त्री केंद्रित हैं. पुरुषों को उनके रिश्ते की किसी भी स्त्री के प्रति यौनिक बातें बोलकर आहत करने की शब्दावली हर भाषा में मौजूद है.

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ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि समाज ने शादी की संस्था बनाई तो स्त्रियां दान की वस्तु बना दी गईं. इससे पहले भी स्त्रियां पुरुषों के शारीरिक बल के आधार पर अर्जित की जाती रहीं. सभ्यताओं के बनने के क्रम में पुरुषों द्वारा स्त्रियों को पत्नियां बनाकर उन्हें धन की श्रेणी में रखा गया. इस धन पर उनका एकाधिकार हुआ. और इस धन के हरण को इज्जत से जोड़ा गया. धन की चोरी यानी बेज्जती होना. और अपने धन को वापस अर्जित करने की वृत्ति को बदला कहा गया. स्त्रियों, गायों, बकरियों, फसलों, धातुओं या जीवन की अन्य ज़रूर अथवा मूल्यवान सामग्रियों के लिए पुरुष हथियार, लाठी, डंडा, बंदूक उठाते रहे. इन्हीं पत्नियों ने एकाधिकार की संपदाओं के लिए उत्तराधिकारी जने. वंशावली देने वाली ये स्त्री इसलिए भी पुरुषों के समाज की सबसे मूल्यवान और महत्वपूर्ण कड़ी बनीं. यौन व्यवहार और जनन उसके मूल दायित्व बने. इसलिए भी गाली ने जब इज्जत को निशाना बनाया तो सबसे गहरी चोट स्त्री पर की. मां, बहन, पत्नी, बेटी और स्त्री के साथ पुरुष का हर रिश्ता गालियों के शब्दकोश को भरता गया.

गालियों की बीमारी सभ्यताओं के विकास के साथ खत्म, कमज़ोर या संवर्धित होने के बजाय मजबूत होती गई. सच यह है कि जैसे हिंसा और अपराध कानून की वजह से कम हैं, वैसे ही गाली भी कानून की वजह से कम है. एक अराजक व्यक्ति या समाज अधिक गाली देता है. हिंसा करता है. क्योंकि वहां व्यवस्था नहीं है. नियम नहीं है. जो है, उसे तोड़ना ही अराजकता है. संकट यह है कि भाषा, साहित्य को संवर्धित करने के लिए साहित्यकार थे, कवि थे, भाषा-वैज्ञानिक और समाजशास्त्री थे. लेकिन गालियों का पिता कोई नहीं बना. किसी ने उसके अभिभावक होने का जिम्मा नहीं लिया. इसलिए वो कभी बदली नहीं. वो और विकृत, कुरूप और यौनिक होती गईं. समाज, जिसे इन्हें रोकना था, गालियों में नए शब्द जोड़कर ठिठोली करता रहा. उसे यह विकृति मनोरंजन देती रही. संचार, पलायन और परिवहन ने गालियों के शब्दकोश को और व्यापक बनाया.

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सवाल यह है कि हम एक समाज के तौर पर कबतक गालियों को बोलते-सुनते हुए भी उन्हें अनदेखा करते रहेंगे. बात सिर्फ यह नहीं है कि गाली कौन दे रहा है, उससे भी बड़ी चिंता है कि गाली कौन सी दी जा रही है. गालियों का पूरा संसार ही स्त्री विरोधी है और इसे व्यवस्थित, आधुनिक और प्रगतिशील समाज में कतई और कैसे भी स्वीकारा नहीं जाना चाहिए. समाज अपनी नकारात्मक और हिंसक अभिव्यक्ति के लिए कड़वे शब्दों का प्रयोग बंद कर देगा, ऐसा संभव नहीं है. लेकिन उन कड़े शब्दों की मर्यादा तय होनी चाहिए. हमारा समाज सबसे ज्यादा नेताओं, अभिनेताओं और धर्मोपदेशकों का अनुसरण करता है. ऐसे मेँ इन लोगों को विशेष तौर पर इसकी चिंता करनी पड़ेगी. पीड़ा यह है कि तीनों ही इस मामले में बार-बार फिसलते रहे हैं.

गाली कोई नेता दे या कार्यकर्ता, उसे खारिज किया जाना चाहिए. गाली किसी ने दी है इसलिए उसे पलटकर गाली दी जा सकती है, इसे कतई सही नहीं ठहराया जाना चाहिए. धर्म, जाति, पेशे, लैंगिकता, दिव्यांगता या क्षेत्रीयता के आधार पर गाली देना तो और भी बुरा है क्योंकि इससे आप केवल एक व्यक्ति विशेष को नहीं, उस संज्ञा के पीछे के पूरे समाज और रिश्तों को गाली दे रहे हैं. अपने जातीय, संख्यात्मक, धार्मिक, लैंगिक या क्षेत्रीय वर्चस्व में अंधे होकर गाली देना उससे भी बुरा है. संविधान इन्हीं गैर-बारबरियों से समाज को निकालने के लिए बनाया गया था. जेहन से ये गैर-बराबरी क्यों नहीं हटाई जा रही. यह अपेक्षा असंभव सी है कि आदमी गाली देना बंद कर दे. लेकिन समाज अपनी गालियों के बारे में भी सोचे. इसके पुराने शब्दकोश और कमजोर पर निशाना वाली आदत को बदले. आइए, जला दें हम गालियों के पुराने शब्दकोश.

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