गोलगप्पे वाले का बेटा बना पायलट, कई बार नाकाम हुआ, पर नहीं मानी हार, अब उड़ाएगा फाइटर प्लेन

मध्य प्रदेश के नीमच जिले में गोलगप्पे बेचने वाले का बेटा भारतीय वायुसेना में पायलट बना है. नीमच जिले के रविकांत ने एनडीए की परीक्षा पास की है. रविकांत की कामयाबी से माता-पिता बेहद खुश हैं. उनका कहना है कि बेटे ने बहुत मेहनत की है, जिसका उसे फल मिला है. शहर के लोग और जनप्रतिनिधि उसे बधाई दे रहे हैं, सम्मानित कर रहे हैं.

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पानीपुरी वाले का बेटा बना पायलट. पानीपुरी वाले का बेटा बना पायलट.

आकाश चौहान

  • नीमच,
  • 15 दिसंबर 2022,
  • अपडेटेड 6:57 PM IST

कहते हैं कि लगन, मेहनत और जुनून एक साथ मिल जाए तो विपरीत हालात भी सफल होने से रोक नहीं सकते. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है मध्य प्रदेश के नीमच जिले के रहने वाले रविकांत ने. गोलगप्पे बेचने वाले देवेंद्र चौधरी के बेटे रविकांत ने अपने हौसले और जुनून के दम पर आसमान में उड़ान भरने का ख्वाब पूरा कर लिया है. 

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दरअसल, मनासा कस्बे की द्वारिकापुरी धर्मशाला के पास देवेंद्र चौधरी बरसों से पानीपुरी का ठेला लगा रहे हैं. उनके परिवार की आजीविका का यही साधन था. देवेंद्र का बेटा रविकांत भी पानीपुरी के ठेले पर पिता के काम में हाथ बंटाता था, लेकिन रविकांत का सपना आसमान में उड़ान भरने का था.

पानीपुरी बेचते रविकांत के पिता देवेंद्र चौधरी.

रविकांत ने मेहनत की और अपने सपने को पूरा कर दिखाया. उसके माता-पिता ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. आज रविकांत ने भारतीय वायुसेना में फ्लाइंग ऑफिसर की परीक्षा पास कर ली है.

हैदराबाद में अगले प्रशिक्षण के लिए जैसे ही रविकांत के घर लेटर पहुंचा तो परिवार ही नहीं पड़ोसियों की भी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. नगर के जनप्रतिनिधि भी बधाई दे रहे हैं. जगह-जगह रविकांत और उसके माता पिता का सम्मान किया जा रहा है.

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दसवीं क्लास से ही मन में था देश सेवा का जज्बा

रविकांत का कहना है कि उसके मन में दसवीं क्लास से ही देश सेवा का जज्बा था. जिले में सीआरपीएफ का प्रशिक्षण केंद्र है, यहां जब जवानों को देखता था तो लगता था कि मैं भी कुछ ऐसा ही करूं. इसके बाद जानकारी करता रहा और पढ़ाई के साथ-साथ तैयारी शुरू कर दी. इस बीच एयर फोर्स में जाने का मन बनाया. 

रविकांत ने बताया कि जब बारहवीं की परीक्षा पास कर ली तो एनडीए का एग्जाम दिया. हालांकि इसमें नाकामी मिली, लेकिन इसके बावजूद हिम्मत बरकरार रखी. इसमें माता-पिता ने हौसला दिया. उन्होंने पूरा सपोर्ट किया और फिर बेहतर ढंग से तैयारी करने लगा. इसकी तैयारी के लिए कोचिंग नहीं की. इंटरनेट की मदद ली. चार वर्ष तक तैयारी के बाद जब परीक्षा दी तो चयन हो गया.

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