मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पानी से लोगों की जान बचाई जा सकती थी. भागीरथपुरा इलाके में अगर समय रहते गंदे पानी की समस्या से जुड़ी पाइपलाइन परियोजना पर जिम्मेदार अधिकारियों ने फाइलों पर साइन कर दिए होते तो उन 10 लोगों की जान बचाई जा सकती जिनकी मौत दूषित पानी पीने से हो गई.
दरअसल नगर निगम को जुलाई 2022 में ही यहां दूषित पानी की जानकारी मिल चुकी थी और समाधान के लिए नई पाइपलाइन बिछाने का टेंडर भी जारी कर दिया गया था, लेकिन सरकारी लेटलतीफी ने काम को ऐसे उलझाया कि पाइपलाइन आज तक पूरी नहीं बिछ सकी.
रिकॉर्ड बताते हैं कि जुलाई 2022 में भागीरथपुरा में 2,31,01,351 रुपये की लागत से नई पानी की पाइपलाइन बिछाने का टेंडर निकाला गया. इसके बाद 23 सितंबर 2022 को टेंडर स्वीकृति के लिए निगम आयुक्त की ओर से फाइल जलकार्य समिति को भेजी गई.
29 सितंबर 2022 को इस पर विचार हुआ, फिर 25 नवंबर 2022 को महापौर परिषद ने प्रस्ताव को मंजूरी दी. इसके बावजूद फाइल आगे बढ़ने में अटकती रही. 30 जनवरी 2023 को निगम आयुक्त के साइन हुए, 3 फरवरी 2023 को (लगभग ढाई महीने बाद) अपर आयुक्त ने इस पर किया और 6 फरवरी 2023 को मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने फाइल पर हस्ताक्षर किए.
यानी जिस समस्या की जानकारी निगम को जुलाई 2022 में थी, उसकी फाइल फरवरी 2023 तक अधिकारियों से लेकर मेयर के केबिन तक भटकती रही. इसके बाद वर्क ऑर्डर तो हुआ, लेकिन पाइपलाइन का काम समय पर पूरा नहीं हुआ और इसी बीच यह हादसा हो गया. सवाल यह है कि अगर निर्णय-प्रक्रिया में यह देरी न होती, तो क्या स्थिति अलग हो सकती थी?
हाई कोर्ट की फटकार के बाद भागीरथपुरा निवासियों को जिन वाटर टैंकरों से पानी सप्लाई हो रही है उनकी हालत भी चिंताजनक है. टैंकरों के भीतर काई और जंग जमी हुई है, बाहर भी हर जगह जंग और गंदगी दिखती है. इससे साफ है कि आपात व्यवस्था भी सुरक्षित नहीं है.
स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब इंदौर नगर निगम के पास समय रहते जानकारी थी, तो फाइलों की रफ्तार क्यों नहीं बढ़ाई गई? जिम्मेदारी तय किए बिना ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना मुश्किल है.
पीयूष मिश्रा