‘एक सूरज स्याह सा’- बकौल सविता सिंह ये उनका पहला प्रकाशित कहानी संकलन है, लेकिन इसे पढ़कर ऐसा लगता नहीं है, इसमें सुधी पाठक के लिए एक मंजे हुए लेखन का रसास्वादन है. इसे समय की परिपाटी के खांचों में जिस तरह से फिट किया गया और तारतम्यता के साथ पिरोया, वह प्रशंसा योग्य है. यह पुस्तक नारीवाद के क्षेत्र में एक विचारोत्तेजक और ज्ञानवर्धक यात्रा का दर्शन है, जो पाठकों को समकालीन समाज में इसके महत्व की व्यापक समझ प्रदान करती है.
कहानियां 60 या 70 के दशकों से लेकर आज के आधुनिक परिवेश के इर्द-गिर्द लिखी गईं है, लेकिन इनमें मौलिकता के साथ नएपन का पुट बराबर मिलता है. हर किरदार को इस बखूबी से उकेरा गया है कि पाठक को सजीव चित्रण का आभास हो जाता है. गोया यह नारी के दृष्टिकोण को विस्तार देते हुए पढ़ने वाले को नई दृष्टि के प्रति बाध्य करता है.
इस संकलन की कहानियां स्त्री विमर्श आधारित हैं, इसमें अपने अंदर-ही-अंदर विचारों के झंझावातों से जूझती-समानता के संघर्षों की गहराई में जाने आतुर स्त्री है, उसका संकुचन है, अंर्तद्वंद है, विवशता है, संवेदना है, मुखरता है.
लेखिका ने अलग-अलग संस्कृतियों, नस्लों और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की महिलाओं पात्रों को चित्रित करते हुए वास्तविक जीवन में घटने वाले किस्सों को कुशलता से जोड़ने का दुरूह काम बखूबी अंजाम दिया है. साथ ही लेखिका ने एहतियातन कहीं भी नारी सुलभ प्रकृति को स्वाभाविकता से डिगने नहीं दिया.
इसमें इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर लेखिका का विशेष आग्रह देखने को मिलता है. हर कहानी में उसके देशकाल के अनुसार बोली जाने वाली बोली का समावेश करते हुए न्याय दिया गया है. जो लेखिका के प्रगाढ़ अनुभव और विशाल शब्दकोश से परिपूर्णता का परिचायक है. हर कहानी के पीछे की सूक्ष्म शोध लेखन में जीवंतता फूंकने का सफल प्रयास है.
यह कहानी संकलन जिस परिपूर्णता के साथ प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुंचा है, यह नि:संदेह ही इसका परिष्कृत स्वरूप है. इसे कई उत्कृष्ट मापदंडों की परीक्षा से न जानें कितनी बार गुजारा गया होगा, क्योंकि ऐसा लेखन अथक प्रयासों से ही संभव है.
बतौर लेखिका सविता सिंह की यात्रा कई साल पहले शुरू हो चुकी थी और ये पुस्तक इस यात्रा का एक पड़ाव मात्र है. आशा है कि उनकी लिखित दूसरी रचना पाठकों को पुस्तक के रूप में जल्द ही पढ़ने को मिलेगी. सविता सिंह की मानें तो वे पिछले चार-पांच दशकों से लिख रही हैं, लेकिन बात कभी प्रकाशन तक नहीं पहुंची. लेकिन अब बात पहुंची है तो दूर तलक जाएगी.
इस पुस्तक को प्रकाशित किया है द फ्री पेन प्रकाशन ने. कुल 206 पृष्ठ वाले इस 10 कहानी संकलन का मूल्य 450 रुपए है.
राहुल झारिया