'Gyanvapi Mosque में Namaz पर लगे रोक, पूजा की जाए शुरू', Hindu Organisation की Supreme Court से गुहार

हिंदू संगठन हिंदू सिंह वाहिनी सेना ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर ज्ञानवापी में जारी नमाज पर रोक लगाने की मांग की है. पत्र में ASI सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि रिपोर्ट साफ-साफ कहती है कि वहां भव्य हिंदू मंदिर था.

Advertisement
ज्ञानवापी परिसर (File Photo) ज्ञानवापी परिसर (File Photo)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 31 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 6:50 AM IST

वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट सामने आने के बाद हिंदू संगठनों ने वहां नमाज का विरोध शुरू कर दिया है. हिंदू संगठन एक याचिका  लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं, जिसमें ज्ञानवापी में नमाज पर रोक लगाने के साथ-साथ पूजा-पाठ शुरू कराने की गुहार लगाई गई है.

हिंदू संगठन हिंदू सिंह वाहिनी सेना ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा है. पत्र में ASI सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि काशी के ज्ञानवापी परिसर में नमाज पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए. याचिका में वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए गुहार लगाई गई है.

Advertisement

हिंदू सिंह वाहिनी सेना की मांग

हिंदू संगठन के वकील विनीत जिंदल ने हिंदू सिंह वाहिनी सेना के महासचिव की हैसियत से चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के नाम पत्र लिखा है. पत्र में कहा गया है कि रिपोर्ट साफ-साफ कहती है कि वहां भव्य हिंदू मंदिर था. तस्वीरें और शिलालेख भी इसकी तस्दीक करते हैं. इसके हिंदू मंदिर होने में अब कोई शक नहीं है, लिहाजा यहां होने वाली नमाज पर अविलंब रोक लगाई जानी चाहिए.

ASI की रिपोर्ट का दिया हवाला

पत्र में नमाज पर रोक लगाने और उसी स्थान पर हिंदुओं को अपने आराध्य देव की पूजा-अर्चना करने के अधिकार की बहाली का आदेश देने की गुहार लगाई गई है. एएसआई सर्वेक्षण की ये रिपोर्ट 25 जनवरी को सार्वजनिक की गई, जिसमें कई प्रमाण के साथ मस्जिद स्थल का निर्माण भव्य हिंदू मंदिर तोड़कर किए जाने की बात कही गई है. इसके समर्थन में एएसआई के विशेषज्ञों ने मौके से मिले कई तथ्य, तस्वीरें और शिलालेखों का हवाला दिया है.

Advertisement

रिपोर्ट ने खींचा हर किसी का ध्यान

वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट ने हर किसी का ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि यह उत्तर-दक्षिण विभाजन के बारे में लंबे समय से चली आ रही धारणाओं को खारिज करती है. सर्वे में साइट पर मौजूदा और पहले से मौजूद संरचनाओं की जांच करने पर 12वीं से 17वीं शताब्दी के बीच के संस्कृत और द्रविड़ दोनों भाषाओं में शिलालेख मिले, जो विभाजन के बजाय संस्कृतियों के एकीकरण का संकेत देते हैं. साइट पर संस्कृत और द्रविड़ दोनों शिलालेखों की मौजूदगी से पता चलता है कि यह आध्यात्मिक संबंध किसी भी राजनीतिक या भौगोलिक विभाजन से पहले का है, जो भारतीय इतिहास को समझने में इसके महत्व और प्रासंगिकता को मजबूत करता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement