जब कुदरत नाराज होती है, टूटते हैं ग्लेशियर, दरक जाते हैं पहाड़, खिसक जाती है जमीन

मौत और ज़िंदगी कुदरत की ज़रूरत है. लेकिन जिस तरह की मौत पिछले दिनों हमारी वादियों में हमने देखी. वो क़ुदरती नहीं थी. हम देख पा रहे हैं कि उस तबाही का असर कहां कहां तक है. क्या कन्याकुमारी और क्या कश्मीर. हमारे जिस्म का हर हिस्सा कराह रहा है.

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उत्तराखंड में इस त्रासदी से भारी तबाही हुई है उत्तराखंड में इस त्रासदी से भारी तबाही हुई है

शम्स ताहिर खान

  • चमोली,
  • 09 फरवरी 2021,
  • अपडेटेड 8:10 AM IST
  • दरकते पहाड़ों की कहानी
  • कुदरत के कहर की खौफनाक दास्तान

जिंदगी और मौत. दोनों क़ुदरत की वो सच्चाई हैं जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता. ज़िंदगी मौत में बदल जाती है और मौत ज़िंदगी में. सबको लगता है कि हम पहाड़ कभी नहीं मरते. लेकिन ये झूठ है. हम भी मरते हैं. बस हमारी पूरी ज़िंदगी कई पीढ़ियों में भी इंसान नहीं देख पाता. बस उसे लगता है कि हम मरते ही नहीं. हमने सोचा कि क्यों न पहाड़ों के पास ही चला जाय. वो पहाड़ जो सदियों से जिंदगी का ये तमाशा देख रहे हैं. इस काल चक्र के ये सबसे बूढ़े गवाह हैं. हमारा अंदाज़ा सही निकला. थोड़ी ख़ामोशी के बाद पहाड़ों ने गहरे दुख के साथ हमें अपनी कहानी बताई.

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पहाड़ ने कहा कि मौत और ज़िंदगी कुदरत की ज़रूरत है. लेकिन जिस तरह की मौत पिछले दिनों हमारी वादियों में हमने देखी. वो क़ुदरती नहीं थी. हम देख पा रहे हैं कि उस तबाही का असर कहां कहां तक है. क्या कन्याकुमारी और क्या कश्मीर. हमारे जिस्म का हर हिस्सा कराह रहा है. किसी का घर लुट गया तो किसी कि ज़िंदगी. किसी के ख़्वाब लुट गये तो किसी की आस्था. ये सब देख कर बड़ा दुख और अफ़सोस होता है. क्योंकि हमें पता है कि हक़ीक़त क्या है. सच क्या है.

हम पहाड़ों से यही तो सुनना चाह रहे थे. जैसे ही उन्होंने कहा कि हमें पता है कि सच और हक़ीक़त क्या है. हमने फ़ैसला कर लिया कि हम अब यहां से तभी उठेंगे जब पूरा हाल सुन लेंगे. हम बिना कुछ कहे ख़ामोश उनके क़दमों में बैठे रहे. हमें अचानक अपने पूर्वजों के. अपने पुरखों के न जाने कितने क़िस्से याद आ गये जो वो पहाड़ों की ज़ुबानी हमें बताया करते थे. 

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देखते ही देखते सब पानी पानी हो गया. घर, सड़क, पुल, पावर स्टेशन, दुकानें. यानी जिनके सहारे ज़िंदगी क़ुदरत को क़रीब से देखने का हौसला कर पाती है... वो सारे सहारे. पानी-पानी हो गए. सब के सब हैरत में हैं कि अचानक ये क्या हो गया. ग्लेशियर का टूटना. पहाड़ों का दरकना. ज़मीन का खिसकना. ये वो हादसे हैं जो चमोली के दामन में हमेशा से होती आई हैं. कोई नई बात नहीं थी इसमें. कोई नई बात नहीं है इनमें. लेकिन जान और माल का इतना नुक़सान? पल भर में चमन. वीरान हो गया. ऐसा तो तिलिस्मी दुनिया की कहानियों में पढ़ा था. सरकार कुछ कहती है. प्रशासन कुछ और कहता है. और जिनपर बीता उनकी आपबीती कुछ और इशारा करती है.

चमोली के रैणी गांव के ठीक ऊपर रविवार सुबह एक ग्लेशियर टूटता है. जो तबाही सबसे पहले रैणी गांव के लोगों ने ही देखी. ग्लेशियर टूटने की वजह से रैणी गांव के नज़दीक ऋषिगंगा और धौलागंगा घाटी में सैलाब आ चुका था. जो लोगों को तिनकों की तरह बहा कर ले गया. रैणी गांव के लोगों ने जब ऋषिगंगा में बड़े बड़े पेड़ और मलबों को बहता देखा, तो अफरातफरी मच गई. हालांकि रैणी गांव नदी से ऊपर होने की वजह से तबाही से बच गया. लेकिन जब मलबे का सैलाब ऋषिगंगा और धौली के संगम पर पहुंचा, तो तबाही मच गई. 

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ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट का काम चल रहा था. चालीस से ज़्यादा मजदूर और  कर्मचारी साइट पर मौजूद थे. अचानक आए सैलाब ने उन्हें टनल में फंसा दिया. हालांकि टनल में फंसे 16 लोगों को तो बचा लिया गया, लेकिन अब भी बहुत से लोग टनल के अंदर फंसे हुए हैं. ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट पूरी तरह से तबाह हो चुका है। वैसे ये वही ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट है, जिसका रैणी गांव के लोग पिछले 16 सालों से विरोध कर रहे थे. इस प्रोजेक्ट का काम 2005 में शुरू हो गया था. प्रोजेक्ट के लिए पहाड़ों पर स्टोन क्रशिंग और ब्लास्टिंग की वजह से आस-पास के जंगली जानवर तब गांव में घुस आए थे. रैणी गांव के लोगों में 2019 में ऋषि गंगा प्रोजेक्ट के खिलाफ़ उत्तराखंड हाई कोर्ट में भी अपनी आवाज उठाई थी. तब कोर्ट ने सच्चाई का पता लगाने का आदेश भी दिया था, लेकिन उसके बाद कुछ नहीं हुआ.

पूरे उत्तराखंड में पर्यावरण के साथ किस हद कर खिलवाड़ हो रहा है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां तमाम छोटी बड़ी कंपनियों के 60 से ज़्यादा बिजली परियोजनाएं चल रही हैं. अकेले 29 पनबिजली योजनाओं से ही करीब 4 हज़ार मेगावाट बिजली उत्पादन होता है यहां. यूजेवीएनएल ने अकेले पहाड़ों की नदियों पर 32 पनबिजली योजनाएं चालू की हुई हैं. यानी कुल मिलाकर उत्तराखंड की नदियों पर बिजली परियोजनाओं का जाल फैला हुआ है. जो ना सिर्फ़ नदियों का रुख मोड़ रही हैं, बल्कि पहाड़ों के दामन को लगातार कमज़ोर कर रही हैं. नतीजा कभी 2013 तो कभी 2021 की शक्ल में हमारे सामने है. इतना ही नहीं दर्जन भर से ज़्यादा ऐसी बिजली परियोजनाएँ तो सुप्रीम कोर्ट तक में अटकी पड़ी हैं. और ये सबकुछ हो रहा है, इंसानी तरक्की और विकास के नाम पर.

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तरक्की के नाम पर इंसानों की इस हरकत को देखते हुए शायद कुदरत ने भी उस इंसान को चुनौती देने की ठान ली जो घमंडी हो चुका है. जिसे लगता है कि क़ुदरत के दिन और रात भी उसकी बनाई सरकारों के ग़ुलाम हैं. मौसम उसके ही अध्यादेशों का पालन करते हैं. सूरज, चांद, बादल, हवाएं सब आगे बढ़ने से पहले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, चीफ़ इंजीनियर और सरकारी बाबू से इजाज़त लेकर और बेलगाम ठेकेदारों को कुछ खिला-पिलाकर आगे बढ़ते हैं। पर इस बार अचानक इन नदियों ने फ़ैसला कर लिया कि वह तरक्की के नाम पर की जा रही इस गैरकानूनी छेड़छाड़ से अपनी ज़मीन को पाक करेंगे.

और फिर कुदरत ने अपना दामन साफ़ करना शुरू किया. विकास के नाम पर जिस तरह ज़िदगी देने वाली इन नदियों और पहाड़ों को बांधा जा रहा है, जिस तरह इन पहाड़ों में, जिनसे लिपटकर ये नदियां मैदान पर उतरती हैं, इन भागीरथी जटाओं में, सेंध लगाकर अनगिनत सुरंगे खोदी जा रही हैं, उनके ख़िलाफ़ क़ुदरत का ये ग़ुस्सा भी है और चेतावनी भी.

 

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