धर्म बदला, घर में रैंप बनवाया... पर मोहब्बत नहीं छोड़ी, पढ़िए इन अनोखे जोड़ों की कहानियां

कहते हैं, मुहब्बत में महबूब के बोले दो अल्फाज भी कानों में घुल जाते हैं. उसकी आवाज सुनने के लिए घंटों का इंतजार होता है. एक झलक देखने के लिए प्रेम में पड़े लोग दौड़े चले जाते हैं. पर सोच‍िए, अगर कोई जो बोल या सुन न पाता हो, उसकी मुहब्बत कैसे रंग लाती होगी. इस सवाल का जवाब हमें उदयपुर में हुए अनोखे व‍िवाह समारोह में मिला. यहां यूं तो हर जोड़े की कहानी खास है, लेकिन आरती और गजेंद्र जैसा जोड़ा जो मूक-बधिर है, उसकी लव स्टोरी की खूब चर्चा हुई. यहां ऐसी ही प्रेम कहान‍ियों से हम आपको रूबरू करा रहे हैं.

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शब्दों से अलग इशारे बन गए दिल की जुबां (Photo Credit: Shankar Das Vaishnav) शब्दों से अलग इशारे बन गए दिल की जुबां (Photo Credit: Shankar Das Vaishnav)

मानसी मिश्रा

  • उदयपुर ,
  • 01 सितंबर 2025,
  • अपडेटेड 8:51 PM IST

'मुहब्बत की अपनी अलग जुबां होती है' गजेंद्र और आरती की प्रेम कहानी इस कहावत को पूरी तरह सच करती है. जन्म से मूक बध‍िर गजेंद्र को आरती का साथ क्या मिला, उनकी जिंदगी को नये मायने मिल गए. उदयपुर में हुए एक व‍िशाल सामूह‍िक व‍िवाह आयोजन में इस जोड़े ने शादी करके अपनी मुहब्बत को मुकम्मल कर दिया.

अपने बेटे और बहू को फेरे लेते देख गजेंद्र के पिता उदय सिंह चौहान भावुक हो रहे थे. aajtak.in के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि कैसे उनके बेटे के जीवन की यात्रा कठ‍िन रास्तों से गुजरते हुए आसान होती जा रही है. उदय स‍िंह बताते हैं ये मेरा पहली संतान है. इसके बाद मेरे दो बच्चे और हैं, दोनों बोल सुन सकते हैं. इसका जन्म उदयपुर में ही हुआ था, और ये काफी स्वस्थ और हंसमुख बच्चा था. लेकिन आज इसके बचपन की याद करके मुझे खुद की अज्ञानता भी याद आती है और दुख होता है.

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ये कुछ बोलता नहीं था

उदय बताते हैं कि‍ जब गजेंद्र पांच-छह साल का हुआ तो अक्सर इसे स्कूल में बच्चे परेशान करते थे. ये कुछ बोलता नहीं था, बस रोकर आता था. कई बार मैंने इस पर बहुत खीझ उतारी. मैं इस पर ही हाथ उठा देता था कि तुम बोलते क्यों नहीं हो किसी से. मुझे समझ नहीं आता था कि ये ऐसा क्यों करता है. फिर कुछ दिन बाद मेरी पत्नी इसे अपने मायके मध्यप्रदेश के नीमच शहर में छोड़ आई. वहां ये अपने नाना और मामा के साथ रहने लगा.

वहां नाना जब ताली बजाकर इसे बुलाते तो ये कोई रेसपांस नहीं करता. उन लोगों को शक हुआ तो हमने जाकर डॉक्टर को द‍िखाया तो इसकी दिव्यांगता का पता चला कि ये बोल-सुन नहीं सकता. खैर, नीमच में ही इसका स्कूल में दाखिला हो गया, उसी स्कूल में ये बच्ची आरती पढ़ती थी. ये करीब छह सात साल का था, तब आरती से इसकी दोस्ती हो गई. पूरे स्कूल या घर में भी जब कोई गजेंद्र की बात नहीं समझ पाता था तब सिर्फ आरती ही उसे समझती थी.

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प्यार में बदल गई दोस्ती

वक्त के साथ दोनों बड़े हुए तो गजेंद्र आकर जयपुर में पढ़ने लगा. लेकिन दोनों की दोस्ती अब भी बरकरार थी, दोनों फोन पर वीड‍ियो कॉल पर बात करते. ये दोस्ती धीरे धीरे प्रेम में बदल चुकी थी. उदय स‍िंह बताते हैं कि गजेंद्र ने जब हम घर वालों से बताया कि मुझे इसी लड़की से शादी करनी है तब मैं और मेरी पत्नी सोच में पड़ गए. तब हम सोचते थे कि बेटा पढ़-ल‍िख रहा है तो बहू बोलने वाली मिल जाएगी तो हमें एक सुकून रहेगा. वहीं आरती का धर्म भी हमसे अलग था, वो ईसाई धर्म से थी, लेकिन बेटे को ये सब समझा पाना मुश्क‍िल था.

धर्म की भी थी दीवार

उदय स‍िंह आगे बताते हैं‍ कि बेटा बोलकर तो हमें अपनी बात समझा नहीं सकता था. फिर वो हमें उदयपुर के नारायण सेवा संस्थान में लेकर आया जहां दिव्यांग जोड़ों की हर साल शादी कराई जाती है. इस साल भी 51 जोड़ों की शादी की जानी थी. यहां हमने देखा कि कैसे जाति धर्म से ऊपर द‍िव्यांगों को उनकी सहूल‍ियत के अनुसार शादी के बंधन में बांधने की कोश‍िशें की जा रही हैं.

हमें भी संस्था के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल और निदेशक वंदना अग्रवाल ने समझाया कि बच्चे अगर प्रेम करते हैं तो उनकी शादी कर देनी चाहिए. रविवार 31 अगस्त को दोनों ही अग्न‍ि के सात फेरे लेते हुए मंद मंद मुस्कुरा रहे थे. प्रशांत अग्रवाल कहते हैं कि हम इतनी बड़ी संख्या में दिव्यांग जोड़ों की शादी 24 साल से करा रहे हैं और ये 44वां दि‍व्यांग व निर्धन सामूहिक विवाह समारोह है. अब तक यहां 2510 जोड़ों की गृहस्थी बस चुकी है. इन जोड़ों को मिलाना और पर‍िवारों को तैयार करना बहुत बड़ा टास्क होता है, फिर इनका व‍िवाह यहां बड़े आयोजन में होता है जिसमें किसी भी पक्ष का कोई खर्च नहीं लगता.

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पत्नी के लिए घर पर बनवाया रैंप

इसी समारोह में निकिता और देवेंद्र की कहानी भी किसी फिल्मी किस्से से कम नहीं. तीन साल की उम्र में पोलियो ने निकिता के दोनों पैरों को जकड़ लिया था. गरीबी और तानों के बीच जिंदगी गुजरती रही, लेकिन उसने हार नहीं मानी. एक ही संस्था में निशुल्क इलाज हुआ, ऑपरेशन और कैलिपर्स से सहारा मिला. यहां सिलाई सीखी, आत्मनिर्भर बनी और अब यहीं काम भी करती हैं.

देवेंद्र भी पोलियो ग्रस्त हैं, लेकिन संस्थान में इलाज और प्रशिक्षण के बाद सिलाई का काम करने लगे. सात साल से मेहनत करके खड़े हैं और अब निकिता के जीवन साथी बन गए. देवेंद्र बताते हैं कि न‍िकिता दोनों पैरों से चल नहीं पाती थी. मैं एक पैर के सहारे से चलता हूं, जब मैंने निकिता से शादी का फैसला लिया तो मैंने घर में घुसने के लिए रैंप बनवाया ताकि वो मेरे घर में आसानी से जा सके. इसके अलावा घर में अब काफी सामान हटाया ताकि वो व्हीलचेयर से आसानी से चल फिर सके. अब दोनों की मुस्कुराहट बताती है कि मोहब्बत और हौसला अगर साथ हो तो जिंदगी की कोई भी कमी आड़े नहीं आती.

51 जोड़ों ने की शादी, प्र‍िया और लक्ष्मण बने दो आंखें... 

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इस सामूहिक विवाह में गजेंद्र आरती जैसे ही 51 दिव्यांग और न‍िर्धन जोड़ों ने पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूसरे का हाथ थामा. विवाह में कई ऐसे जोड़े भी थे जिनमें वधू या वर पैरों से दिव्यांग, कोई एक पैर से तो उसका साथी हाथ से, एक दिव्यांग तो दूसरा दृष्टिबाधित था.

कई ऐसे भी जोड़े थे जो घुटनों के बल या घिसटकर चलते हैं, लेकिन अब ये सभी एक-दूसरे की ताकत बनकर खुशनुमा गृहस्थी के सपनों को साकार करेंगे. इनमें से ज्यादातर को संस्थान की ओर से आत्मनिर्भरता के लिए सिलाई, मोबाइल सुधारना और कंप्यूटर आद‍ि के कोर्स कराए गए हैं. ऐसा ही एक जोड़ा था लक्ष्मण और प्र‍िया का. लक्ष्मण के पिता लालूराम ने बताया कि दोनों दर‍ियाबाद में मिले थे जहां एक दूसरे को पसंद करने लगे. लक्ष्मण को जहां दाह‍िनी आंख से नहीं द‍िखता तो वहीं प्रि‍या बाई आंख से नहीं देख पाते. लक्ष्मण ने कहा कि मुझे प्रिया से मिलने के बाद लगा कि मैं और प्रि‍या अब कंपलीट हो जाएंगे. हम अब दो आंखें हो गए हैं और अब पूरी दुनिया देख पाएंगे.

लक्ष्मण और प्र‍िया की जोड़ी

कैसे हुआ आयोजन

पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे सभी 51 जोड़े बैंड बाजों के साथ बारात लेकर आए. नाचते बारातियों के साथ बड़ी संख्या में देश भर से आए मेहमान थे जो इस अनोखे उत्सव में शामिल होने आए थे. अब तोरण रस्म के बाद वरमाला हुई. यहां एक ही मंच पर बैठे दूल्हा- दुल्हनों को संस्थान संस्थापक पद्मश्री कैलाश 'मानव' व उनकी पत्नी कमला देवी ने आशीर्वाद द‍िया.

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यहां शादी कर चुके जोड़े भी पहुंचे, मिले तोहफे

यहां वो खुशहाल दिव्यांग जोड़े भी पहुंचे थे जिनका विवाह सफल रहा. मुम्बई के सचिन व पद्मा दिव्यांग दंपति हैं, उन्होंने बताया कि साल 2020 में सामूह‍िक व‍िवाह समारोह में ही उनकी शादी यहां हुई थी. आज एक साल के बच्चें के साथ खुशहाल गृहस्थी है. यहां से उन्हें नई गृहस्थी बसाने के लिए जरूरी सामान भी मिला था. इनमें बर्तन, गैस, चूल्हा, संदूक, क्राकरी, डिनर सेट, स्टील कोठी, पलंग, बिस्तर, पंखा, दीवार घड़ी सहित अन्य सामान थे. वहीं कन्यादानियों व अतिथियों की ओर से हर जोड़े को मंगलसूत्र, चूड़ियां, चैन, कर्णफूल, नाक की बाली, बिछिया, पायल, अंगूठी व सौंदर्य प्रसाधन सामग्री उपहार स्वरूप इस साल भी दी गईं.

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