समलैंगिक विवाह पर आज सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना रहा है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों वाली बेंच का फैसला बंटा हुआ है. सर्वोच्च अदालत के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने सबसे पहले अपना फैसला सुनाते हुए समलैंगिक शादी को मान्यता देने से इनकार कर दिया है. सीजेआई ने कहा है कि ये संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला है. हालांकि सीजेआई ने समलैंगिक जोड़े को बच्चा गोद लेने की वकालत की है. 2018 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था. आइए आपको बताते हैं कि भारत में समलैंगिकता की लड़ाई लड़ रहे 5 प्रमुख चेहरे कौन से हैं.
नाज फाउंडेशन
द नाज फाउंडेशन ट्रस्ट ही धारा 377 को कानूनी चुनौती देने वाली सबसे अहम याचिकाकर्ता है. अंजलि गोपालन इस फाउंडेशन की संस्थापक और कार्यकारी निदेश हैं. समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की कानूनी लड़ाई में सबसे आगे अंजलि गोपालन का ही नाम रहा है. गोपालन की नाज फाउंडेशन 2001 में 377 को खत्म करने वाली मूल याचिकाकर्ता बन गई थी. अंजलि गोपालन ने तब कहा था कि धारा 377 सहमति से संबंध बनाने वाले लेस्बियन, गे, बायसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर लोगों के साथ बड़ा अन्याय है. इस लड़ाई में आनंद ग्रोवर का नाम भी शामिल है, जिन्होंने 2009 में नाज फाउंडेशन का कानूनी तौर पर नेतृत्व किया था.
एडवोकेट अरुंधति काटजू और मेनका गुरुस्वामी
एलजीबीटी समुदाय की लड़ाई लड़ने में एडवोकेट अरुंधति काटजू और मेनका गुरुस्वामी की अहम भूमिका रही है. अरुंधति काटजू सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू की भतीजी हैं, जबकि मेनका गुरुस्वामी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक सलाहकार मोहन गुरुस्वामी की बेटी हैं. दोनों को टाइम मैग्जीन ने दुनिया के सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में दर्ज किया था. दोनों ने करीब 5 साल पहले कपल होने की बात स्वीकार की थी. तब मेनका गुरुस्वामी ने कहा था कि 2013 में एक वकील और देश के नागरिक के तौर पर नुकसान हुआ था. वो पर्सनल लॉस था. एक वकील जो कोर्ट में कई दूसरे सामाजिक मुद्दों पर बहस कर रहा है, उसे अपराधी का दर्जा मिलने पर खुशी नहीं होगी. दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2009 में समलैंगिक सबंधों को अपराध के दायरे से हटा दिया था. हालांकि, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया था.
सेलिना जेटली
बॉलीवुड एक्ट्रेस सेलिना जेटली हमेशा LGBT कम्युनिटी के हक में बोलती रही हैं. उन्होंने एक बार कहा था कि LGBT के अधिकारों के लिए लड़ने की वजह से से उनके सहकर्मियों, दोस्तों और परिवार ने उनका साथ छोड़ दिया था. लेकिन वह इससे घबराई नहीं और आगे बढ़ती गईं. सेलिना ने कहा था कि सच्चे देशभक्त के रूप में हमेशा से मेरा एक सिद्धांत था कि मैं भेदभाव स्वीकार नहीं करूंगी. किसी भी संस्कृति के हिस्से के रूप में हिंसा को बढ़ावा नहीं देना चाहिए.
जस्टिस अजीत प्रकाश शाह और जस्टिस एस मुरलीधर
दिल्ली हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एपी शाह और जस्टिस एस मुरलीधर ने 2 जुलाई 2009 को पहली बार समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था. 105 पेज के अपने ऐतिहासिक फैसले में जस्टिस शाह और जस्टिस मुरलीधर ने IPC की धारा 377 को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव) का उल्लंघन घोषित किया था. यह केस नाज फाउंडेशन बनाम एनसीटी दिल्ली सरकार के बीच था. फैसले में कहा गया था कि वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक यौन संबंध को अपराध मानना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.
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