चपरासी बनने के लिए MA-BEd-बीटेक डिग्री वाले उमड़े, भीड़ देख भर्ती स्थगित

चपरासी बनने की चाहत में ऐसी भीड़ उमड़ी कि प्रशासन के हाथ पैर फूल गए. जी-ईएसआई हेल्थ केयर हरियाणा में डीसी रेट पर निकली चतुर्थ श्रेणी के 70 पदों पर भर्ती के लिए राज्य भर से युवाओं की भीड़ उमड़ पड़ीं.

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10 हजार से ज्यादा युवाओं की उमड़ी भीड़ 10 हजार से ज्यादा युवाओं की उमड़ी भीड़

अमित कुमार दुबे / चंद्र प्रकाश

  • करनाल,
  • 17 जनवरी 2018,
  • अपडेटेड 12:11 AM IST

चपरासी बनने की चाहत में ऐसी भीड़ उमड़ी कि प्रशासन के हाथ पैर फूल गए. जी-ईएसआई हेल्थ केयर हरियाणा में डीसी रेट पर निकली चतुर्थ श्रेणी के 70 पदों पर भर्ती के लिए राज्य भर से युवाओं की भीड़ उमड़ पड़ीं. चपरासी पद के लिए योग्यता आठवीं पास थी पर एमए-बीएड-बीटेक डिग्री धारी दस हजार से ज्यादा युवा यहां पहुंच गए. लेकिन भीड़ देखकर घबराए प्रशासन ने भर्ती स्थगित कर डाली.

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यह हरियाणा का हाल है, जहां सूबे के मुख्यमंत्री को पद्मावत पर पाबंदी की ज्यादा चिंता है, अलबत्ता राज्य के युवा कैसे चपरासी बनने तक को उतावले हैं, इसकी कोई परवाह नहीं. क्योंकि सवाल सिर्फ करनाल में उमड़ी भीड़ का नहीं है. जींद की कोर्ट में चपरासी की 9 पोस्ट के लिए 15 हजार आवेदक इंटरव्यू देने पहुंच गए थे. चंद दिनों पहले महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी में चपरासी के 92 पदों के लिए करीब 22 हजार आवेदन आए थे.

यानी पेट भरने के लिए नौकरी चाहिए और नौकरी चपरासी की भी मिले तो किसी को कोई गुरेज नहीं क्योंकि नौकरी है नहीं. और हाल सिर्फ हरियाणा का खराब है-ऐसा भी नहीं है. एक पखवाड़े पहले राजस्थान विधानसभा सचिवालय में चपरासी की जॉब के लिए जिन 12,453 लोगों का इंटरव्यू लिया गया, उनमें 129 इंजीनियर, 23 वकील, एक चार्टड एकाउंटेंट और 393 पोस्ट ग्रेजुएट थे.

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हद यह कि जॉब मिली तो उनमें विधायक का बेटा शामिल था, यानी विधायक का बेटा भी अब चपरासी बनने को तैयार है. या कहें कि नौकरी है नहीं तो जुगाड़ के आसरे ही सही विधायक के बेटे को चपरासी की नौकरी में गुरेज नहीं.

ऐसे में सवाल देश में साढ़े चार करोड़ से ज्यादा रजिस्टर्ड बेरोजगार हैं, और पढ़े लिखे युवा चपरासी तक बनने को बेकरार हैं तो फिर सरकार की रोजगार नीति का मतलब है क्या? क्योंकि सच तो यही है कि सरकार यह मानने को तैयार ही नहीं कि देश में रोजगार का संकट है.

बीजेपी के आला नेता कहीं मुद्रा योजना के आसरे देश में बेरोजगारी के संकट को खारिज करते हैं तो प्रधानमंत्री यह कहने से नहीं हिचकते कि बेरोजगारी की बातें बेमानी हैं, और अब दलालों को रोजगार का संकट है.

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