गुजरात विद्यापीठ में इस समय उथल-पुथल देखने को मिल रही है. यहां राज्यपाल आचार्य देवव्रत के चांसलर बनते ही ट्रस्टियों के इस्तीफों की झड़ी लग गई. आज 8 ट्रस्टियों ने पद से इस्तीफा दे दिया है. यहां देवव्रत की नियुक्त का विरोध किया जा रहा है. राज्यपाल को कुलाधिपति पद की जिम्मेदारी संभालने का निमंत्रण दिया गया था. विद्यापीठ में कुल 22 ट्रस्टी हैं.
गुजरात विद्यापीठ की स्थापना महात्मा गांधी ने 18 अक्टूबर 1920 को की थी. इसे असहयोग आंदोलन के मद्देनजर राष्ट्रीय विद्यापीठ के रूप में शुरू किया गया था. अब देवव्रत के कुलाधिपति बनने के बाद कहा जा रहा है कि पहली बार कोई गांधीवादी कुलाधिपति की बजाय एक आरएसएस पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी दी गई है. इसी बात को मुद्दा बनाकर ट्रस्टियों ने विरोध करना शुरू किया है.
शक्तियों के दबाव में व्यक्तियों को नियुक्त नहीं कर सकते
देवव्रत की नियुक्ति का विरोध करने वाले ट्रस्टियों में नरसिंह हाथीला, मणिबेन पारिख, सुदर्शन अयंगर, कपिल शाह, माइकल मझगांवकर, चैतन्य भट्ट, नीता हार्डिकर और अनामिक शाह का नाम शामिल हैं. इन सभी ने ट्रस्टी के पद से इस्तीफा दे दिया है. इसे लेकर एक पत्र लिखा है. जिसमें कहा- 'ये नितांत आवश्यक है कि सभी शैक्षणिक संस्थान- भले ही उन्हें सरकारी अनुदान प्राप्त हो- स्वतंत्र रहें. सत्ता और राजनीति की उथल-पुथल से सुरक्षित रहें. उन्हें या तो आधिकारिक लाइन पर चलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है या शक्तियों के दबाव में व्यक्तियों को नियुक्त नहीं किया जा सकता है.'
ट्रस्टियों ने आगे कहा- सरकार के एम्प्लीफायर के रूप में कार्य करना समाज में सार्थक भूमिका की मौत की घंटी बजाने के समान होगा. ये अनिवार्य रूप से किसी राजनीतिक दल या धार्मिक व्यवस्था के वर्चस्व से मुक्त रहना चाहिए. विद्यापीठ ने उस दिशा में कड़ा कदम उठाया, जब 2007 में स्वर्गीय नारायण देसाई इसके कुलाधिपति बने. यह प्रकरण नारायणभाई द्वारा शुरू किए गए कार्यों को पूर्ववत करने का प्रयास करता है.
मैं खुद को भाग्यशाली महसूस करता हूं: राज्यपाल
बता दें कि राज्यपाल को गुजरात विद्यापीठ के 12वें चांसलर के रूप में कार्यभार संभालने के निमंत्रण दिया गया था, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है. राज्यपाल आचार्य ने एक बयान में कहा था कि 'आज कुलपति (राजेंद्र खिमानी) और रजिस्ट्रार (निखिल भट्ट) परिषद के कुछ अन्य प्रतिनिधियों के निमंत्रण के साथ आए. मैं महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तित्व द्वारा स्थापित संस्थान में शामिल होने के लिए भाग्यशाली और गौरवान्वित महसूस करता हूं. राज्यपाल ने आगे कहा था कि मैं गांधी के सिद्धांतों और विचारधारा को आगे बढ़ाने और मजबूत करने का मौका पाकर सम्मानित महसूस कर रहा हूं.'
गोपी घांघर