क्यों बातचीत में बार-बार बीच में टोकते हैं कुछ लोग? मेंटल हेल्थ से जुड़ी हो सकती है वजह

एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों में दूसरों की बात सुनने और खुद के बोलने का तालमेल नहीं बन पाता. मई माह को बाई पोलर पर्सनैल‍िटी डिसऑर्डर अवेयरनेस मंथ के तौर पर मनाया जाता है. आइए जानते हैं इस ड‍िसऑर्डर के बारे में कुछ बातें... 

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Bipolar disorder (Representational Image by AI) Bipolar disorder (Representational Image by AI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 मई 2025,
  • अपडेटेड 8:39 PM IST

क्या आपने कभी किसी को बातचीत के दौरान बार-बार बीच में टोकते देखा है? आपने सोचा होगा कि शायद इसमें शालीनता नहीं है या ध्यान से आपकी बात नहीं सुनता. लेकिन ऐसा भी हो सकता है, मामला इससे कहीं गहरा हो. ये भी हो सकता है कि ये बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (BPD) का लक्षण हो. 

क्या होता है BPD के साथ जीने का मतलब 
बीपीडी से पीड़ित व्यक्ति अक्सर ड‍िनायल के तीव्र भय, आवेगपूर्ण व्यवहार, आत्महत्या की प्रवृत्ति, आत्म-हानि, क्रोध के अनियंत्रित विस्फोट, खालीपन की भावना, अस्थिर संबंधों, सेल्फ इमेज की चिंता और कभी-कभी भ्रम और अलगाव का अनुभव करते हैं. इन लक्षणों के कारण ही बीपीडी वाले लोग दूसरों को अप्रत्याशित या चालाक लग सकते हैं. उनके कार्यों को अक्सर उनकी पर्सनैल‍िटी के कारण गलत समझा जाता है, जबकि वे वास्तव में उनके लक्षण होते हैं. 

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BPD के मरीज बातचीत का 'टाइमिंग सिस्टम' नहीं पकड़ पाते

इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ पादोवा की रिसर्च कहती है कि बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों में बातचीत का सिंक्रोनाइज़ेशन यानी तालमेल बिगड़ा होता है. यानी जब सामने वाला बोल रहा हो, तब सुनना और फिर अपनी बारी पर बोलना. ये सिंपल सी बात भी इनके लिए चुनौती बन जाती है. 

क्या है Social Glue जो बिखर जाता है

रिसर्चर्स ने बातचीत के सिंक्रोनाइज़ेशन को "सोशल ग्लू" कहा है. यानी वो तत्व जो हमें एक-दूसरे से जोड़ता है. अगर ये टूट जाए, तो इंसान का व्यवहार असामान्य लगने लगता है. BPD वाले लोग अक्सर बातचीत में जल्दबाजी कर देते हैं, बात काट देते हैं या अपनी बात थोप देते हैं.असल में, उनका इमोशनल सिस्टम इतनी जल्दी रिएक्ट करता है कि वो दूसरों की बात खत्म होने तक रुक ही नहीं पाते. 

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टोकना उनकी मज़बूरी है, बदतमीज़ी नहीं

बाइपोलर डिसऑर्डर पर काम करने वाले मनो च‍िकित्सक डॉ अन‍िल शेखावत कहते हैं कि ये वो लोग हैं जिन्हें अक्सर दूसरों से यह सुनने को मिलता है  कि तुम मेरी बात काट क्यों देते हो? या तुम्हें बात करने की तमीज़ नहीं है? लेकिन सच ये है कि BPD के मरीजों को खुद पर कंट्रोल करना बेहद मुश्किल लगता है. उनकी सोच बार-बार उन्हें धोखा देती है कि सामने वाला उन्हें इग्नोर कर रहा है, या छोड़ देगा. ये डर उन्हें फौरन प्रतिक्रिया देने पर मजबूर करता है. 

रिसर्च में कैसे साबित हुआ ये तालमेल का टकराव

हाल ही में साइकोलॉजी टुडे में प्रकाश‍ित एक रिपोर्ट में एक स्टडी के बारे में बताया गया. इस स्टडी में 206 लोगों को एक सिंक्रोनाइज्ड फिंगर टैपिंग टास्क दिया गया, जिसमें उन्हें एक वर्चुअल पार्टनर के साथ एक ही रिदम पर उंगलियों से टैप करना था. लेकिन पार्टनर असली नहीं था, उसकी टाइमिंग को रिसर्चर्स कंट्रोल कर रहे थे. BPD वाले लोग इस सिंक्रोनाइज़ेशन को पकड़ नहीं पाए. उन्हें बार-बार लगा कि पार्टनर उनकी टाइमिंग पर ध्यान नहीं दे रहा. नतीजा यह हुआ कि उन्होंने खुद को अस्वीकृत महसूस किया जैसे अक्सर रियल लाइफ में भी होता है. 

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डॉ शेखावत कहते हैं कि जब एक आम इंसान बातचीत में मिसमैच महसूस करता है, तो वह झुंझलाता है, लेकिन जल्दी नार्मल हो जाता है. वहीं BPD वाला व्यक्ति उस पल में गहरे अस्वीकृति और असुरक्षा के एहसास में डूब जाता है. उसे लगता है कि सामने वाला उसकी इज्ज़त नहीं कर रहा या उसे छोड़ने वाला है. ये सोच उसे और असामान्य रिएक्शन की तरफ धकेलती है.

BPD मरीजों को कैसे मिल सकती है मदद

रिसर्चर्स का मानना है कि सिंक्रोनाइज़ेशन की प्रैक्टिस करवाकर इस स्थिति को सुधारा जा सकता है यानी वीडियो फीडबैक, रियल-टाइम सिमुलेशन, और कम खतरे वाले इंटरैक्शन से उन्हें यह सिखाया जा सकता है कि कब बोलना है और कब सुनना है. वैसे ये रिसर्च सिर्फ बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी वालों के लिए नहीं, हम सबके लिए भी जानना जरूरी है कि कैसे दूसरे की बात सुनना बहुत जरूरी है. आपको बता दें कि बीपीडी एक जटिल मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है लेकिन सही केयर और ट्रीटमेंट से बीपीडी वाले लोग पूर्ण जीवन जी सकते हैं. इसके लिए शिक्षा, सहानुभूति और समर्थन से उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं.

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