तमिल सही है या द्रविड़... तमिलों की जमीन से ही निकली है 'शुद्ध' पहचान की लड़ाई

तमिल और द्रविड़ शब्दों के बीच का विवाद दक्षिण भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान से जुड़ा है. द्रविड़ शब्द बाहरी नाम है जबकि तमिल स्वनाम है. इतिहास में द्रविड़ शब्द का उपयोग भौगोलिक संदर्भ में हुआ, लेकिन तमिल भाषा और सभ्यता प्राचीन और आत्मनिर्भर है.

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तमिल भाषा में लिखी गई है कंबन रामायण तमिल भाषा में लिखी गई है कंबन रामायण

टीआर जवाहर

  • नई दिल्ली,
  • 01 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:12 AM IST

कहते हैं कि नाम में क्या रखा है? अंग्रेजी साहित्य से निकला ये सवाल हमेशा मौजूं रहता है. वाकई नाम का महत्व तभी है जब उससे जुड़ी संज्ञा की खासियत में वजन हो. जब इस नाम से इतिहास, संस्कृति, सभ्यता जैसे शब्द जुड़ते हैं तो वजन बढ़ता जाता है. फिर यह शब्द ताकतवर भी होता जाता है और राजनीति भी जुड़ जाए तो गंभीर रूप से विस्फोटक भी. कुछ ऐसा ही हाल है भारत के दक्षिणी सिरे में बसने वाले तमिल समुदाय का, जिन्हें एक सांस्कृतिक शब्द 'द्रविड़' से पुकारा जाता है.

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‘द्रविड़’ शब्द आज किसी मानक नक्शे पर नहीं है, फिर भी उसके निशान मौजूद हैं और यह शब्द प्रासंगिक भी बना हुआ है. समय जब बहुत तेजी के साथ ईसा पूर्व से ईस्वी में बदल रहा था तो उसी दौर में कहीं इस शब्द की पैदाइश हुई. यानी पहली सहस्राब्दी में यह बीज से फूटा, दूसरी सहस्राब्दी में फैलता गया, उन्नीसवीं–बीसवीं सदी में राजनीतिक हथियार बना और इक्कीसवीं सदी में आते-आते इसकी जड़ें ऐसा जाल बन गईं जो कभी-कभी सोच में उलझनें पैदा करती हैं.

तमिल विद्वान एमएस. पूर्णलिंगम पिल्लई कहते हैं कि 'किसी समुदाय को दिया गया नाम हमेशा वही नहीं होता, जो वह समुदाय खुद को देता है.' इसी विचार के साथ आगे बढ़ें को द्रविड़ और तमिल के बीच साफ टकराहट दिख जाती है. तमिल विद्वान यूवी स्वामिनाथ अय्यर, कहते थे, 'तमिल सिर्फ एक भाषा नहीं है, यह एक प्राचीन सभ्यता की आत्मा है. इसकी पहचान को उधार के नामों से बदलना, उस आत्मा को कमजोर करना है.' यहीं से विवाद की जड़ निकलती है. सवाल यह नहीं कि ‘द्रविड़’ शब्द कहां से आया, बल्कि यह है कि क्या ‘तमिल’ जैसी आत्मनिर्भर पहचान को किसी बाहरी नाम की जरूरत थी?

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औपनिवेशिक सोच की उपज है ‘आर्य–द्रविड़’ का बंटवारा
‘आर्य–द्रविड़’ का बंटवारा मूल रूप से औपनिवेशिक सोच की उपज है. यूरोपीय भाषाविदों और ब्रिटिश शासक जब भारत की विविधता को समझ नहीं सके तो उन्होंने इसे अलग-अलग वर्गों में  डिवाइड करना शुरू कर दिया. उन्होंने नस्ल के आधार पर बांटा, भाषा और समाज के आधार पर भी बांटा, खान-पान और कल्चर के जरिये भी अलग-अलग किया, लेकिन सबसे पहले उन्होंने उत्तर-दक्षिण में बांट दिया. ये बंटवारा भले ही उनके प्रशासन के लिए सुविधाजनक रहा हो, लेकिन इसका बुरा नतीजा जो आज भी दिखता है कि उत्तर और दक्षिण अलग ही होते चले गए. आज भी यह उत्तर–दक्षिण की रेखा किसी न किसी रूप में मौजूद है.

हालांकि यह भी कहना होगा कि यह टकराव बाहर से नहीं आया, बल्कि तमिलकम की धरती से ही निकला. यह भाषा, पहचान और राजनीतिक स्वामित्व की लड़ाई रही. शुद्ध तमिल आंदोलन के जनक मरईमलाई अडिगल ने द्रविड़ पहचान को सिरे से खारिज कर दिया था. उनका साफ कहना था, 'सच्चा तमिल गौरव तभी संभव है, जब हम अपने शुद्ध नाम ‘तमिल’ को अपनाएं. ‘द्रविड़’ से इसे जोड़ना, हमारी खासियत को कमजोर करता है.' एसवी दामोदरम पिल्लई भी ऐसा ही कहते हैं. 'द्रविड़ का लेबल तमिल इतिहास को धुंधला करता है. जरूरी है कि तमिल अपनी विरासत के साथ अकेले खड़ा हो.'

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तमिल राष्ट्रवादियों को क्यों खटकता है द्रविड़ नाम?
अक्सर द्रविड़ और तमिल को एक ही मान लिया जाता है. यह बात तमिल राष्ट्रवादियों को सबसे ज्यादा खटकती है. उनके लिए यह सिर्फ भाषाई गलती नहीं, बल्कि पहचान के साथ धोखा है. इतिहास के पन्ने बताते हैं कि

तमिल एक स्वनाम (endonym) है. यानी लोग खुद को कहते हैं- 'हम तमिल हैं'.
जबकि द्रविड़ एक 'बाहरी नाम' (exonym) है. यानी बाहर वाले कहते हैं, 'ये द्रविड़ हैं'.

संस्कृत ग्रंथों- रामायण, महाभारत, पुराण, मनुस्मृति, जैन-बौद्ध साहित्य में ‘द्रविड़’ शब्द दक्षिण दिशा या क्षेत्र के लिए इस्तेमाल होता है. यह कोई सांस्कृतिक आत्म-परिभाषा नहीं है, बल्कि एक भौगोलिक संकेत मात्र है. असल में ‘द्रविड़’ शब्द, तमिल के ही पुराने रूप ‘तमिऴि/दमिळि’ का संस्कृत रूपांतरण है. यानी शब्द बाहर गया, संस्कृत की प्रयोगशाला में ढला और फिर बदले रूप में वापस लौटा.

प्राचीन साक्ष्य बताते हैं कि तमिल, द्रविड़ से कहीं पुराना है- शब्द में भी और चेतना में भी. ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दी के शिलालेख, गुफाएं, मिट्टी के बर्तन, धातु पर खुदे अक्षर- सभी 'तमिल-ब्राह्मी लिपि' में हैं. विद्वानों ने इसे ‘तमिऴि’ या ‘दमिळि’ कहा है. कीलाड़ी, शिवगलाई, आदिचनल्लूर, पोरुनथल जैसे स्थलों पर 2014 से 2025 तक चल रही खुदाइयों ने तमिल सभ्यता की समय-रेखा को और पीछे धकेल दिया है. अब यह मानना मुश्किल होता जा रहा है कि तमिल संस्कृति अशोक के बाद की है.

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यह कोई आदिवासी बोली नहीं थी, बल्कि एक साक्षर, संगठित और आत्म-जागरूक समाज की भाषा थी और इस पूरी साहित्यिक दुनिया में ‘द्रविड़’ शब्द है ही नहीं.

तमिल भाषा में लिखे गए द्रविड़ साहित्य
संगम साहित्य में ‘द्रविड़’ कहीं नहीं मिलता. वहां सिर्फ तमिल है. विद्वान टीपी मीनाक्षीसुंदरम लिखते हैं, “तमिल सिर्फ भाषा नहीं थी, वह सभ्यता की आत्मा थी. बाहरी नाम कभी जड़ नहीं जमा सके, क्योंकि उनमें वह गहराई नहीं थी.' कुछ विद्वानों ने संगम ग्रंथों में द्रविड़ खोजने की कोशिश की, लेकिन ठोस प्रमाण नहीं मिले. पुरनानूरु की एक पंक्ति या शिलप्पदिकारम में द्रविड़ राजाओं का उल्लेख, ये सब साहित्यिक शैली में किए गए प्रयोग भर हैं.

यह बड़ा सवाल है. आज दिल्ली से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक तमिल राजनीति को ‘द्रविड़ राजनीति’ कह दिया जाता है. तमिल शब्द तभी याद आता है, जब हिंदी विरोध या चुनाव हो. यह सरलीकरण तमिल लोगों को चुभता है. उनके लिए यह सांस्कृतिक अपमान की तरह है.

महेंद्रवर्मन प्रथम (600–630 ई.) खुद को ‘द्रविड़ राजा’ कहते हैं. नरसिंहवर्मन प्रथम को ‘द्रविड़ों का सिंह’ कहा गया. चोल राजाओं, राजराजा और राजेंद्र ने ‘द्रविड़ साम्राज्य’ और ‘द्रविड़ मंडल’ जैसे शब्दों को संस्थागत किया. यह वह दौर था, जब उत्तर–दक्षिण का संपर्क बढ़ रहा था. युद्ध, तीर्थ, व्यापार, मंदिर निर्माण. द्रविड़ एक राजनीतिक बैनर बन गया. संस्कृत शिक्षित ब्राह्मणों ने द्रविड़ शब्द को सामान्य बनाया. कुमारिल भट्ट ने ‘द्रविड़ भाष्य’ कहा. पांच द्रविड़ ब्राह्मण, यह वर्गीकरण भी यहीं से आया, लेकिन आज के राजनीतिक माहौल में तमिलों को ‘द्रविड़ ब्राह्मण’ शब्द एक विडंबना लगता है.

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भक्ति साहित्य में भी तमिल भाषा
आलवार और नयनमार संतों ने शुद्ध तमिल में भक्ति साहित्य रचा. कंबन रामायण में भी द्रविड़ नहीं है, लेकिन संस्कृत के बराबर धार्मिक दर्जा दिलाने के लिए तमिल ग्रंथों को ‘द्रविड़ वेद’ कहा जाने लगा. उद्देश्य अच्छा था- तमिल को पवित्र, अखिल-भारतीय मान्यता दिलाना. लेकिन यहीं से नई बेचैनी जन्मी- क्या तमिल को मान्यता के लिए द्रविड़ का सहारा चाहिए था?

आज शुद्ध तमिल समर्थकों की लड़ाई संस्कृत के खिलाफ नहीं, बल्कि 'द्रविड़ से मुक्ति' की है. उनका मानना है कि द्रविड़ ने तमिल की खासियत को नुकसान पहुंचाया है. इसने ऐसा डेंट दिया है कि तमिल शब्द की इमेज धुंधली पड़ गई है. यह पूरा सफर बताता है कि शब्द कितने ताकतवर होते हैं. 

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